दशम स्कन्ध
दशम स्कन्ध
श्रीकृष्ण जन्म से लेकर वृन्दावन-लीला, कंस वध, द्वारका स्थापन एवं रुक्मिणी-विवाह तक — सम्पूर्ण कृष्ण-चरित्र, भागवत का हृदय।
कंस का अत्याचार और देवकी-विवाह
दशम स्कन्ध, भागवत पुराण का सर्वाधिक प्रिय, विस्तृत और भक्तों के हृदय में सर्वाधिक स्थान रखने वाला भाग, मथुरा के अत्याचारी राजा कंस के भय से आरम्भ होता है। कंस, अपनी बहन देवकी से अत्यंत स्नेह रखते हुए, उनके विवाह के अवसर पर स्वयं उनका रथ हाँकते हुए ससुराल पहुँचा रहे थे।
मार्ग में, अचानक एक आकाशवाणी गूँजी, जिसने कंस को स्पष्ट शब्दों में चेताया कि इसी देवकी की आठवीं संतान उनकी मृत्यु का कारण बनेगी। भयभीत और क्रोधित कंस ने तुरन्त अपनी तलवार निकाली, अपनी ही बहन का वध करने के लिए, किंतु वसुदेव के अनुनय-विनय पर, यह वचन लेकर कि प्रत्येक नवजात संतान उन्हें सौंप दी जाएगी, कंस ने अपना क्रोध शांत किया।
कुछ ही समय पश्चात्, कंस का विश्वास पुनः भंग हो गया, और उन्होंने देवकी तथा वसुदेव को कारागार में बंद कर दिया, और उसके पश्चात् जन्मे प्रत्येक नवजात शिशु की निर्ममतापूर्वक हत्या करने लगे, एक-एक कर छह पुत्रों को इस प्रकार खो देने का असहनीय शोक देवकी और वसुदेव को सहना पड़ा।
इस अध्याय की शिक्षा
भय और अत्याचार से भाग्य को टाला नहीं जा सकता — कंस का प्रत्येक क्रूर प्रयास, अनजाने में ही, उसी भावी विनाश को और निकट लाता गया जिससे वह बचना चाहता था।
देवगणों की प्रार्थना
इसी काल में, पृथ्वी, कंस और अन्य अनेक अत्याचारी, अधर्मी राजाओं के असहनीय भार से पीड़ित होकर, एक गाय का रूप धारण कर, अश्रुपूरित नेत्रों से, ब्रह्माजी की शरण में गई और अपनी व्यथा उनके समक्ष प्रकट की।
ब्रह्माजी, शिव और अन्य समस्त देवताओं के साथ, क्षीरसागर के तट पर गए, जहाँ उन्होंने भगवान विष्णु की गहन स्तुति की और पृथ्वी को इस असहनीय भार से मुक्त करने की प्रार्थना की।
भगवान ने, देवताओं की इस करुण प्रार्थना को सुनकर, अपने केश से दो बाल — एक श्वेत, एक श्याम — तोड़े, और वचन दिया कि वे स्वयं देवकी के गर्भ से अवतरित होकर कंस का वध करेंगे, तथा धर्म की पुनर्स्थापना करेंगे, इस प्रकार देवताओं को आश्वस्त कर उन्हें अपने-अपने लोकों को लौटने का निर्देश दिया।
इस अध्याय की शिक्षा
जब अधर्म असहनीय सीमा तक बढ़ जाए, पृथ्वी और धर्म स्वयं भगवान की शरण में जाते हैं — और भगवान अपने वचन को अवश्य पूर्ण करते हैं।
कृष्ण का जन्म
भाद्रपद मास की अंधकारमय अष्टमी की रात्रि, ठीक मध्यरात्रि में, जब आकाश में तारे शांत थे और सम्पूर्ण प्रकृति एक असाधारण शांति में डूबी थी, देवकी के गर्भ से भगवान पहले अपने चतुर्भुज, दिव्य विष्णु-रूप में प्रकट हुए, शंख-चक्र-गदा-पद्म धारण किए हुए।
वसुदेव और देवकी, इस अलौकिक दर्शन से चकित होकर, हाथ जोड़कर भगवान की गहन स्तुति करने लगे, उन्हें परब्रह्म, परमात्मा के रूप में पहचानते हुए, किंतु साथ ही यह भी प्रार्थना की कि वे कंस के भय से, इस दिव्य रूप को समेटकर एक साधारण शिशु का रूप धारण करें, ताकि उन्हें सुरक्षित रूप से यहाँ से ले जाया जा सके।
भगवान के इच्छानुसार शिशु-रूप धारण करते ही, कारागार की जंजीरें स्वयं टूट गईं, द्वार अपने-आप खुल गए, और समस्त प्रहरी अलौकिक, गहन निद्रा में डूब गए। वसुदेव ने तत्काल नवजात शिशु को एक टोकरी में रखा और आधी रात्रि में उफनती, प्रचंड यमुना नदी को पार करने का साहसिक प्रयास किया।
यमुना, भगवान के स्पर्श को पहचानते हुए, स्वयं मार्ग देने के लिए अपना जल-स्तर नीचे कर लिया, और स्वयं शेषनाग ने अपने विशाल फणों को छत्र के समान फैलाकर मूसलाधार वर्षा से शिशु की रक्षा की। वसुदेव, गोकुल पहुँचकर, यशोदा के पास सोई हुई नवजात कन्या (स्वयं योगमाया) से अपने पुत्र को बदल लाए, और उसी अलौकिक निद्रा के प्रभाव में, बिना किसी को कुछ आभास हुए, पुनः कारागार लौट आए।
इस अध्याय की शिक्षा
भगवान का प्राकट्य, चाहे कारागार जैसे सबसे अंधकारमय स्थान में ही क्यों न हो, स्वयं में सबसे बड़ी सुरक्षा और आशा का प्रतीक है।
कंस द्वारा योगमाया का प्रयास और विफलता
जब कंस को सूचना मिली कि देवकी ने पुनः संतान को जन्म दिया है, वे तत्काल कारागार की ओर दौड़े, इस विश्वास के साथ कि यही वह आठवीं संतान है जो उनकी मृत्यु का कारण बनेगी, और उस नवजात कन्या को नष्ट करने के लिए उसे बलपूर्वक उठा लिया।
किंतु ज्यों ही कंस ने उसे पत्थर पर पटकने के लिए हाथ उठाया, वह कन्या उनके हाथों से फिसलकर आकाश में उठ गई और वहाँ देवी योगमाया के अष्टभुजी, तेजस्वी रूप में प्रकट हुई, अपने समस्त आभूषणों और अस्त्रों सहित।
योगमाया ने कंस को स्पष्ट, गंभीर शब्दों में घोषित किया कि उनका सच्चा शत्रु, जो उनकी मृत्यु का कारण बनेगा, पहले से ही कहीं और, सुरक्षित रूप से, बड़ा हो रहा है, और कंस का यह क्रूर प्रयास पूर्णतः व्यर्थ है — यह कहकर वह अदृश्य हो गई, कंस को भय और असमंजस में छोड़ते हुए, जिससे उनकी क्रूरता और भी अधिक बढ़ गई।
इस अध्याय की शिक्षा
भगवान की अपनी योजना को कोई भी सांसारिक शक्ति विफल नहीं कर सकती — क्रूरतम प्रयास भी अंततः दैवीय इच्छा के समक्ष निष्फल हो जाते हैं।
गोकुल में उत्सव
उधर गोकुल में, नंद बाबा और यशोदा माता के घर, इस अनजाने में दिव्य बालक के जन्म पर, सम्पूर्ण गोपालक-समुदाय हर्षोल्लास में डूब गया — घरों को तोरण और पुष्पों से सजाया गया, दही-घी का वितरण हुआ, और वादक-गायक मंगल-गीत गाने लगे।
नंद बाबा ने ब्राह्मणों को प्रचुर दान दिया, गौओं का पूजन किया, और सम्पूर्ण व्रजभूमि में उत्सव की धूम मच गई, प्रत्येक गोपी और ग्वाला अपने प्रिय नंद के घर आनंद मनाने के लिए उमड़ पड़ा, बिना यह जाने कि जिस बालक के जन्म का वे उत्सव मना रहे हैं, वह स्वयं समस्त सृष्टि का पालनकर्ता है।
इस अध्याय की शिक्षा
भगवान का साधारण, प्रेमपूर्ण आगमन भी सम्पूर्ण समुदाय के लिए उत्सव और आनंद का कारण बनता है, चाहे वह उनकी सच्ची पहचान से अनजान ही क्यों न हो।
पूतना वध
कंस, यह जान चुके थे कि शिशु कहीं वृंदावन क्षेत्र में ही सुरक्षित है, उन्होंने सभी संभावित नवजात शिशुओं का वध करने हेतु राक्षसी पूतना को भेजा, जो एक सुंदर, स्नेहमयी नारी का रूप धारण कर अपने स्तनों में घातक विष लेपकर गोकुल में घूमने लगी।
पूतना, यशोदा के घर पहुँचकर, बालक कृष्ण को अपनी गोद में लेकर स्तनपान कराने लगी, यह सोचते हुए कि विष स्वयं ही उसके प्राण हर लेगा। किंतु कृष्ण ने, अपनी दिव्य शक्ति से, न केवल विष को निष्प्रभावी किया, अपितु इतने वेग से दूध पीना आरम्भ किया कि उसके साथ-साथ पूतना के प्राण भी खिंचने लगे।
पूतना अपने वास्तविक, विशालकाय राक्षसी रूप में परिवर्तित होकर धराशायी हो गई, और उसका शरीर योजनों तक फैला रहा, जिसे गोपालकों ने काटकर जला दिया, जिसकी सुगंध, विष से भरी होते हुए भी, भगवान के स्पर्श के कारण, चंदन के समान मधुर थी — इस प्रकार उसकी हत्या की कुत्सित चेष्टा भी, भगवान के शरीर को अर्पित किए जाने के कारण, उसकी अपनी मुक्ति में बदल गई, क्योंकि छद्म वात्सल्य भी, भगवान को अर्पित हो तो, मुक्तिदायक होता है।
इस अध्याय की शिक्षा
छद्म, विषाक्त स्नेह भी, यदि वह भगवान को अर्पित हो, मुक्तिदायक बन सकता है — भगवद्-सम्बन्ध ही किसी भी कर्म का वास्तविक फल निर्धारित करता है।
शकटासुर और तृणावर्त का वध
कुछ ही समय पश्चात्, एक बार जब बालक कृष्ण एक बड़ी गाड़ी के नीचे पालने में लेटे हुए थे, और भूख से रोने लगे, तो उन्होंने अपने कोमल पैर की एक ही ठोकर से उस विशाल गाड़ी को पलट दिया — गाड़ी के भीतर वास्तव में शकटासुर नामक एक राक्षस छिपा हुआ था, जो इस आघात से चूर-चूर होकर नष्ट हो गया, गाड़ी पर रखे बर्तन और खिलौने दूर तक बिखर गए।
इसके कुछ समय पश्चात्, कंस द्वारा भेजा गया एक और राक्षस, तृणावर्त, एक प्रचंड बवंडर का रूप धारण कर वृंदावन में आया और खेलते हुए बालक कृष्ण को धूल-भरे तूफान में लपेटकर आकाश में बहुत ऊँचा उठा ले गया, यशोदा और सम्पूर्ण गोकुल को भय और विलाप में डुबोते हुए।
कृष्ण ने, आकाश में ही, अपने शरीर को अकस्मात् इतना भारी कर लिया कि तृणावर्त का वेग रुक गया, और वह राक्षस, अपनी ही शक्ति से थककर, बालक के भार तले पृथ्वी पर गिर पड़ा और अपने वास्तविक रूप में मृत्यु को प्राप्त हुआ — कृष्ण, बिना किसी क्षति के, राक्षस के शव के ऊपर सुरक्षित, मुस्कुराते हुए बैठे मिले, जिससे गोपियों ने चकित होकर उन्हें उठा लिया।
इस अध्याय की शिक्षा
भगवान की रक्षा उन्हें किसी बड़े प्रयास की आवश्यकता नहीं होती — एक साधारण ठोकर या भार बदलना ही असाधारण संकटों को टालने के लिए पर्याप्त है।
नामकरण संस्कार और विश्वरूप दर्शन
कुछ समय पश्चात्, महान ज्योतिषी और कुल-पुरोहित गर्ग मुनि गुप्त रूप से नंद के घर पधारे, और नंद के अनुरोध पर, उन्होंने दोनों बालकों — बलराम और कृष्ण — का गुप्त नामकरण संस्कार सम्पन्न किया, यह भविष्यवाणी भी करते हुए कि यह श्याम-वर्ण बालक असाधारण, अलौकिक कार्य करेगा।
एक दिन, जब यशोदा ने देखा कि बालक कृष्ण मिट्टी खा रहे हैं, तो उन्होंने स्नेहपूर्वक डाँटते हुए उनका मुँह खोलकर देखने को कहा, यह पुष्टि करने के लिए कि उन्होंने वास्तव में मिट्टी खाई है या नहीं।
जैसे ही कृष्ण ने अपना मुँह खोला, यशोदा ने उसके भीतर, विस्मयकारी रूप से, सम्पूर्ण ब्रह्मांड को देखा — प्रत्येक तारा, प्रत्येक ग्रह, पर्वत, समुद्र, समस्त लोक, यहाँ तक कि वृंदावन और स्वयं यशोदा को भी अपने ही पुत्र को गोद में लिए हुए। यह विराट, अकल्पनीय दृश्य क्षण भर के लिए धारण किया गया, इससे पूर्व कि भगवान ने अपनी योगमाया से यशोदा के मन पर पुनः मातृ-स्नेह का पर्दा डाल दिया, जिससे वह इस दिव्य दर्शन को पूर्णतः भूल गईं और अपने पुत्र को पूर्ववत् स्नेह से गले लगा लिया।
इस अध्याय की शिक्षा
भगवान की सर्वव्यापी, विराट प्रकृति की एक झलक भी हृदय को चकित कर सकती है, फिर भी मातृ-स्नेह जैसा शुद्ध प्रेम इस विस्मय से भी अधिक मूल्यवान है।
यशोदा द्वारा कृष्ण को बाँधना (दामोदर लीला)
एक दिन, यशोदा स्वयं दही मथ रही थीं, जब बालक कृष्ण ने आकर स्तनपान की इच्छा प्रकट की। यशोदा ने उन्हें तुरन्त गोद में उठा लिया, किंतु तभी उन्होंने देखा कि चूल्हे पर रखा दूध उफनकर बह रहा है, अतः वे कृष्ण को छोड़कर दूध बचाने दौड़ीं।
क्रोधित कृष्ण ने एक पत्थर उठाकर मथानी का पात्र फोड़ डाला, और भीतर के कक्ष में जाकर ताज़ा मक्खन खाने और बंदरों को बाँटने लगे। यशोदा, लौटकर टूटा पात्र देखकर, कृष्ण को खोजते हुए भीतर गईं और उन्हें उलटी ओखली पर खड़े होकर, ऊपर लटके मक्खन के मटके से मक्खन चुराते हुए पाया।
कृष्ण, माता को देखते ही भागने लगे, और यशोदा ने कुछ दूर पीछा कर उन्हें पकड़ लिया। उन्होंने निश्चय किया कि इस बार वे कृष्ण को ओखली से रस्सी द्वारा बाँध देंगी, किंतु आश्चर्यजनक रूप से, रस्सी हमेशा दो अंगुल छोटी पड़ जाती — यशोदा ने एक और रस्सी जोड़ी, फिर भी वह दो अंगुल छोटी रही, यह क्रम बार-बार दोहराया गया, उनकी अनंत, असीम प्रकृति को उस बचकाने, प्रेमपूर्ण क्षण में भी प्रकट करते हुए, जब तक कि अंततः, अपनी माता के प्रेम और थकान से द्रवित होकर, कृष्ण ने स्वयं ही बंधने की अनुमति दे दी।
इस अध्याय की शिक्षा
भगवान की अनंत प्रकृति उनके सबसे बचकाने, प्रेमपूर्ण क्षणों में भी प्रकट होती है — प्रेम की सादगी ही सबसे गहन सत्य को धारण कर सकती है।
नलकूबर और मणिग्रीव की मुक्ति
ओखली से बंधे हुए, कृष्ण ने धीरे-धीरे रेंगते हुए यशोदा के आँगन में खड़े दो विशाल यमलार्जुन वृक्षों की ओर बढ़े, और ओखली को उनके बीच से इस प्रकार घसीटा कि दोनों वृक्ष जड़ से उखड़कर भूमि पर गिर पड़े, भीषण गर्जना के साथ।
वृक्षों के गिरते ही, उनसे दो अत्यंत तेजस्वी, दिव्य पुरुष प्रकट हुए — ये वास्तव में नलकूबर और मणिग्रीव नामक कुबेर के पुत्र, यक्षगण थे, जिन्हें एक बार मदमस्त होकर नग्न अवस्था में जल-क्रीड़ा करते समय देवर्षि नारद का अनादर करने के कारण, वृक्ष बन जाने का शाप मिला था।
नारद ने, अपने शाप में ही करुणावश यह भी वरदान दिया था कि वे स्वयं भगवान कृष्ण के बाल-हाथों से स्पर्श पाकर मुक्त होंगे। अब, इस शाप से मुक्त होकर, दोनों यक्षों ने कृष्ण की भावपूर्ण स्तुति की और कृतज्ञतापूर्वक अपने धाम को लौट गए, इस घटना ने सम्पूर्ण वृंदावन में कृष्ण की असाधारण, अलौकिक प्रकृति के प्रति विस्मय और भी गहरा कर दिया।
इस अध्याय की शिक्षा
एक बार किया गया अपराध, चाहे कितने युगों पूर्व हुआ हो, भगवान के स्पर्श मात्र से क्षमा और मुक्ति में बदल सकता है।
वृंदावन में बाल-लीलाएँ
पूतना, शकटासुर, तृणावर्त और अब वृक्षों के गिरने जैसी बार-बार होने वाली असाधारण, भयावह घटनाओं से चिंतित होकर, नंद और उपानंद सहित समस्त गोकुलवासियों ने यह निर्णय लिया कि गोकुल अब सुरक्षित स्थान नहीं रहा, और उन्होंने सामूहिक रूप से वृंदावन की ओर स्थानांतरित होने का निश्चय किया।
वृंदावन में बसने के पश्चात्, कृष्ण और बलराम, जैसे-जैसे बड़े हुए, रेंगने से चलने और फिर दौड़ने लगे, अपने सम-आयु ग्वाल-बालों के साथ खेलते, गायों के छोटे बछड़ों की देखभाल करते, और अपनी निश्छल बाल-लीलाओं से सम्पूर्ण व्रजभूमि को आनंदित करते रहे।
इसी अवधि में उनकी असाधारण शक्ति, चंचलता और सौंदर्य ने सम्पूर्ण गोपालक-समुदाय के हृदय को मोह लिया, यद्यपि अधिकांश निवासी अभी भी यह नहीं जान पाए थे कि यह प्रिय बालक वास्तव में कौन है, और आगामी अध्यायों में उनकी अनेक और भी अद्भुत लीलाओं का वर्णन किया गया है।
इस अध्याय की शिक्षा
बार-बार होने वाले संकट भी, यदि सही ढंग से समझे जाएँ, नए, सुरक्षित और समृद्ध जीवन की दिशा में आगे बढ़ने का संकेत हो सकते हैं।
अघासुर वध
एक दिन, कृष्ण और उनके ग्वाल-मित्र वन में गायें चराते हुए खेल रहे थे, तभी कंस द्वारा भेजा गया एक अत्यंत विशालकाय राक्षस अघासुर (पूतना और बकासुर का भाई) एक योजनों लंबे, पर्वत-सम अजगर का रूप धारण कर उनके मार्ग में लेट गया, अपना विशाल मुख गुफा के समान खोले हुए।
ग्वाल-बालक, इसे एक असाधारण वन-गुफा समझकर, कुतूहलवश उसके भीतर प्रवेश करने लगे, बिना यह जाने कि यह साक्षात् मृत्यु का मुख है। कृष्ण ने, अपने सखाओं को इस भीषण संकट में देखकर, स्वयं भी उस मुख में प्रवेश किया।
राक्षस ने तुरन्त अपना मुख बंद कर सबको निगलने का प्रयास किया, किंतु कृष्ण ने अपने भीतर ही अपने शरीर का इतना विस्तार किया कि राक्षस का कंठ अवरुद्ध हो गया, और उसके प्राण घुटकर उसी के मुख में ही निकल गए — कृष्ण ने फिर अपनी दिव्य दृष्टि से समस्त सखाओं को पुनर्जीवित कर, बिना किसी क्षति के, राक्षस के मुख से बाहर निकाला, इस घटना पर स्वयं देवताओं ने आकाश से पुष्पवर्षा की।
इस अध्याय की शिक्षा
भगवान अपने ही भक्तों को संकट से बचाने के लिए किसी भी सीमा तक, यहाँ तक कि राक्षस के मुख के भीतर से भी, कार्य कर सकते हैं।
ब्रह्मा का भ्रम
अघासुर-वध के पश्चात्, ब्रह्माजी, कृष्ण की इस असाधारण शक्ति को देखकर, अपनी माया-शक्ति की सीमा और कृष्ण की वास्तविक पहचान की परीक्षा लेने की इच्छा से प्रेरित हुए। जब कृष्ण और उनके सखा वन में भोजन कर रहे थे, ब्रह्माजी ने चुपके से समस्त गायों, बछड़ों और ग्वाल-बालों को हर लिया और उन्हें एक गुफा में सुला दिया, स्वयं भी इस माया-जाल में उलझते हुए।
कृष्ण, अपनी सर्वज्ञता से तुरन्त इस घटना को पहचान गए, और बिना किसी को कुछ बताए, स्वयं ही उन समस्त गायों, बछड़ों और ग्वाल-बालों के रूप में विस्तारित हो गए, प्रत्येक विवरण में बिल्कुल समान — इतना सटीक कि स्वयं उनके माता-पिता और गोपियाँ भी इस अंतर को नहीं पहचान सकीं।
एक सम्पूर्ण वर्ष तक, कृष्ण स्वयं ही इन सबके रूप में वृंदावन में रहे, वही सारी बाल-लीलाएँ करते रहे, यह प्रदर्शित करते हुए कि वे स्वयं सृष्टि के सृष्टिकर्ता ब्रह्मा से भी बड़े और श्रेष्ठ हैं, क्योंकि वे उनकी माया को भी अपनी माया से पूर्णतः निष्प्रभावी कर सकते हैं।
इस अध्याय की शिक्षा
स्वयं सृष्टिकर्ता भी, यदि अहंकारवश भगवान की परीक्षा लेने का प्रयास करे, तो अंततः यही सीखता है कि भगवान उससे भी बड़े और श्रेष्ठ हैं।
ब्रह्मा की स्तुति
एक वर्ष पश्चात्, जब ब्रह्माजी लौटे और यह देखा कि वृंदावन में सब कुछ बिल्कुल पूर्ववत्, बिना किसी परिवर्तन के चल रहा है — गायें, बछड़े और ग्वाल-बालक अभी भी वहीं खेल रहे हैं, जिन्हें उन्होंने स्वयं एक वर्ष पूर्व चुराया था — वे गहन विस्मय में डूब गए और अपनी ही माया-शक्ति पर संदेह करने लगे।
अपनी योग-दृष्टि से सत्य को पहचानकर, ब्रह्माजी अत्यंत लज्जित और विनम्र हुए, और कृष्ण के समक्ष आकाश से उतरकर साष्टांग प्रणाम किया, अपनी भूल स्वीकार करते हुए। उन्होंने कृष्ण की एक अत्यंत गहन, दार्शनिक स्तुति अर्पित की, उन्हें समस्त सृष्टि के मूल कारण, परब्रह्म और परम भगवान के रूप में स्वीकार करते हुए।
कृष्ण ने ब्रह्माजी को क्षमा किया और स्नेहपूर्वक विदा किया, और फिर समस्त गायों, बछड़ों और ग्वाल-बालों को उनके मूल स्थान पर, उसी क्षण, बिना किसी को इस एक वर्ष के व्यतीत होने का तनिक भी आभास हुए, पुनःस्थापित कर दिया — इस प्रकार समय के उस सम्पूर्ण चक्र को भी अपनी इच्छानुसार मोड़ते हुए।
इस अध्याय की शिक्षा
भूल स्वीकार कर विनम्रतापूर्वक क्षमा माँगना ही सच्ची बुद्धिमत्ता है, चाहे भूल करने वाला कितना भी महान क्यों न हो।
धेनुकासुर वध
वृंदावन के निकट एक ताड़ के वन में मीठे, पके फल प्रचुरता से उगते थे, किंतु यह वन धेनुकासुर नामक एक भयंकर राक्षस द्वारा सुरक्षित था, जिसने गधे का रूप धारण कर रखा था, और जो किसी को भी उस वन में प्रवेश करने पर अपनी पिछली टाँगों से भीषण प्रहार कर मार डालता था।
बलराम, अपने मित्रों की फल खाने की इच्छा पूर्ण करने हेतु, एक ताड़ वृक्ष को हिलाकर फल गिराने लगे, जिससे क्रोधित होकर धेनुकासुर दहाड़ते हुए बलराम पर पिछले पैरों से प्रहार करने दौड़ा।
बलराम ने, बिना विचलित हुए, राक्षस के पिछले पैर पकड़कर उसे एक ही झटके में एक ताड़ वृक्ष के ऊपर दे मारा, जिससे वह तत्क्षण प्राणहीन हो गया। उसके अन्य साथी गधों ने भी जब आक्रमण किया, कृष्ण और बलराम ने उन्हें भी उसी प्रकार वृक्षों पर पटककर समाप्त कर दिया, इस प्रकार ग्वाल-बालों को उस मीठे वन के फलों का निर्भय आनंद लेने का मार्ग प्रशस्त हुआ।
भाग १ समाप्त (अध्याय १-१५) — भाग २ में अध्याय १६-३० जारी रहेगा
इस अध्याय की शिक्षा
जो भी बाधा साझा वन-संपदा और सामान्य कल्याण के मार्ग में खड़ी हो, उसे निर्भीकता से दूर करना ही समुदाय के प्रति उत्तरदायित्व है।
कालिय नाग का दमन
धेनुकासुर के वध के पश्चात्, एक ग्रीष्म ऋतु में, कृष्ण ने देखा कि यमुना नदी का जल एक स्थान पर, कालिय नामक एक अत्यंत विषैले, बहु-फणी सर्प के निवास के कारण, इतना विषाक्त हो चुका है कि उसे पीने वाले पक्षी और पशु तत्काल मृत्यु को प्राप्त हो जाते हैं, और उस जल के धुएँ से ऊपर उड़ते पक्षी भी गिर पड़ते हैं।
एक दिन, एक गेंद उसी विषैले जल में जा गिरी, और उसे लेने के बहाने, कृष्ण ने स्वयं उस भयंकर कुंड में छलांग लगा दी। कालिय, अपने क्षेत्र में इस आक्रमण से क्रोधित होकर, अपने विशाल फणों से कृष्ण को जकड़ लिया, जिससे किनारे पर खड़े गोपालक और स्वयं नंद बाबा भय से मूर्च्छित होने लगे।
कृष्ण ने, क्षण भर पश्चात्, अपने शरीर को इतना भारी कर लिया कि कालिय स्वयं थककर शिथिल पड़ गया, और तब कृष्ण उसके सबसे बड़े फण पर चढ़कर, अपने कोमल किंतु दिव्य पैरों से नृत्य करने लगे, प्रत्येक थिरकन के साथ सर्प की शक्ति क्षीण होती गई, जब तक कि वह रक्त वमन करते हुए, प्राणों की भीख माँगने को विवश न हो गया।
इस अध्याय की शिक्षा
जब कोई अपने ही क्षेत्र को विष से भर दे, चाहे वह कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, भगवान की उपस्थिति उस विष को भी शुद्धता में बदल सकती है।
कालिय की पत्नियों की प्रार्थना
कालिय की पत्नियाँ, अपने पति को मृत्यु के कगार पर देखकर, अत्यंत भयभीत और व्याकुल होकर कृष्ण के समक्ष उपस्थित हुईं, हाथ जोड़कर, गद्गद कंठ से, उनके पति के प्राणों की रक्षा की करुण प्रार्थना करने लगीं, यह स्वीकार करते हुए कि वे स्वयं भगवान के इस अपराध को न पहचान सकीं।
उन्होंने कृष्ण की गहन स्तुति की, यह कहते हुए कि यह दंड उनके पति के लिए वास्तव में एक कृपा ही है, क्योंकि स्वयं भगवान के चरण-स्पर्श ने उसे अनेक जन्मों के पाप से मुक्त कर दिया है।
कृष्ण, इस विनम्र प्रार्थना से द्रवित होकर, कालिय को क्षमा कर दिया, किंतु उसे तत्काल यमुना छोड़कर रमणक द्वीप नामक समुद्र में स्थायी रूप से चले जाने का आदेश दिया, यह आश्वासन देते हुए कि उनके चरण-चिह्न सदा उसके फणों पर अंकित रहेंगे, जिससे कोई भी अन्य प्राणी उस पर आक्रमण करने का साहस नहीं करेगा — इस प्रकार यमुना का जल पुनः शुद्ध, स्वच्छ हो गया, और गोपालकों में हर्ष की लहर दौड़ गई।
इस अध्याय की शिक्षा
सच्चा पश्चाताप और करुणामयी प्रार्थना क्रूरतम दंड को भी क्षमा में बदल सकती है — भगवान सदैव सुधार का अवसर देते हैं, पूर्ण विनाश नहीं चाहते।
प्रलंबासुर वध
कुछ समय पश्चात्, एक अन्य राक्षस, प्रलंबासुर, कंस द्वारा भेजा गया, एक ग्वाल-बालक का छद्म वेश धारण कर कृष्ण और बलराम के साथ खेलने में सम्मिलित हो गया, यह अवसर खोजते हुए कि कब वह इन दोनों बालकों का हरण कर सके।
एक खेल में, जिसमें हारने वाले को जीतने वाले को अपने कंधों पर उठाना होता था, प्रलंबासुर ने बलराम को कंधे पर उठाया और तीव्रता से वन की ओर भागने लगा, धीरे-धीरे अपना वास्तविक, विशालकाय राक्षसी रूप प्रकट करते हुए।
बलराम, यह देखकर कि वे किसी राक्षस की पीठ पर बैठे हैं, बिना भय के, अपनी वज्र-सम मुट्ठी से उसके सिर पर एक ही प्रहार किया, जिससे प्रलंबासुर का सिर चूर-चूर होकर वह तत्काल प्राणहीन होकर भूमि पर गिर पड़ा, और उपस्थित सभी ग्वाल-बालों ने बलराम की इस वीरता की भूरि-भूरि प्रशंसा की।
इस अध्याय की शिक्षा
छद्म वेश में किया गया छल कितना भी चतुर क्यों न हो, अंततः प्रकट होकर उचित दंड पाता है।
दावाग्नि से रक्षा
एक अन्य अवसर पर, जब कृष्ण, बलराम और ग्वाल-बालक वन में गायें चराते हुए विश्राम कर रहे थे, अचानक चरने गई गायों ने सूखी घास खाते हुए एक स्थान पर आग लगा दी, और तेज हवा के कारण यह भीषण दावाग्नि शीघ्र ही सम्पूर्ण वन को अपनी चपेट में लेते हुए, गोपालकों को चारों ओर से घेरने लगी।
भयभीत ग्वाल-बालक, चारों ओर से उठती लपटों को देखकर, त्राहि-त्राहि करते हुए कृष्ण की शरण में दौड़े, यह विश्वास करते हुए कि केवल वे ही इस असंभव संकट से उन्हें बचा सकते हैं।
कृष्ण ने, अपने सखाओं को आँखें बंद करने का निर्देश देकर, स्वयं उस सम्पूर्ण भीषण अग्नि को अपने ही मुख में समेट कर निगल लिया, अपनी असीम, अलौकिक शक्ति का यह प्रदर्शन एक साधारण, स्नेहपूर्ण कृत्य के रूप में करते हुए — आँखें खोलने पर, ग्वाल-बालकों ने स्वयं को पूर्णतः सुरक्षित, बिना किसी क्षति के पाया, मानो कुछ हुआ ही न हो।
इस अध्याय की शिक्षा
भगवान अपने भक्तों की रक्षा के लिए असीम शक्ति का प्रयोग भी इतनी सहजता से करते हैं मानो यह एक साधारण, प्रेमपूर्ण कार्य हो।
शरद ऋतु का वर्णन
इस अध्याय में शरद ऋतु के आगमन का एक अत्यंत सुंदर, काव्यात्मक वर्णन है, जब वर्षा ऋतु के बादल छँट जाते हैं, आकाश स्वच्छ, नीला हो जाता है, सरोवर कमलों से भर उठते हैं, और वृंदावन का सम्पूर्ण प्राकृतिक सौंदर्य अपने चरम पर पहुँच जाता है।
शुकदेव ने वर्णन किया कि कैसे यह ऋतु स्वयं भगवान के सौंदर्य और गुणों का एक प्रतिबिंब प्रतीत होती है, स्वच्छ चांदनी रातें, सुगंधित पवन, और खिले हुए कुमुद-कमल — यह सब मिलकर एक ऐसा वातावरण रचते हैं जो गोपियों के हृदय में कृष्ण के प्रति उनके प्रेम को और भी गहन, और भी तीव्र बना देता है, आगामी रास-लीला की भावभूमि तैयार करते हुए।
इस अध्याय की शिक्षा
प्रकृति का सौंदर्य भी हृदय को भगवद्-प्रेम की गहनता की ओर उन्मुख करने का एक माध्यम बन सकता है।
वेणु-गीत: गोपियों का विरह-गान
शरद की इन मनोहर रात्रियों में, कृष्ण, अपने ग्वाल-मित्रों के साथ गायें चराते हुए, अपनी वंशी की अलौकिक, मधुर धुन बजाने लगे, जिसकी ध्वनि सम्पूर्ण वृंदावन में गूँज उठी, वृक्षों, लताओं, नदियों और पशु-पक्षियों तक को भी मंत्रमुग्ध करते हुए।
गोपियाँ, इस वंशी-ध्वनि को सुनते ही, अपने समस्त घरेलू कार्यों को अधूरा छोड़कर, अपने पतियों और परिवार की भी परवाह किए बिना, अनायास ही कृष्ण की ओर आकर्षित हो उठीं। इस अध्याय में उनका एक हृदयस्पर्शी "वेणु-गीत" वर्णित है, जिसमें वे कृष्ण की वंशी को संबोधित करते हुए अपने प्रेम, विरह और लालसा को व्यक्त करती हैं।
यह गीत भागवत साहित्य में भक्ति के सर्वोच्च, शुद्धतम रूप — प्रेम-लक्षणा भक्ति — का प्रतीक माना जाता है, जिसमें गोपियों का यह प्रेम किसी सांसारिक आकर्षण का प्रतीक नहीं, अपितु प्रत्येक आत्मा की परमात्मा के प्रति स्वाभाविक, शाश्वत लालसा का सर्वोच्च, शुद्धतम रूपक है।
इस अध्याय की शिक्षा
आत्मा की परमात्मा के प्रति लालसा इतनी स्वाभाविक और प्रबल होती है कि वह प्रत्येक सांसारिक बंधन को भुला सकती है।
गोपियों के वस्त्रों का हरण
मार्गशीर्ष मास में, वृंदावन की अविवाहित युवा गोपकन्याएँ, कृष्ण को अपने पति के रूप में प्राप्त करने की कामना से, प्रतिदिन भोर में यमुना में स्नान कर, देवी कात्यायनी की विशेष पूजा और व्रत करने लगीं, अपने वस्त्र तट पर छोड़कर जल में मंत्रोच्चार करते हुए स्नान करती थीं।
एक दिन, कृष्ण ने चुपके से आकर उनके सभी वस्त्र उठा लिए और निकट के एक कदंब वृक्ष पर चढ़कर बैठ गए, हँसते हुए उन्हें एक-एक कर, अपने वस्त्र लेने बाहर आने के लिए बुलाया। गोपकन्याएँ, लज्जा से जल में ही सिमटी रहीं, और क्रोध जताते हुए कंस से शिकायत करने की धमकी दी, किंतु शीत जल में ठिठुरती हुई, अंततः दोनों हाथों से अपने शरीर को ढँकते हुए बाहर आने को विवश हुईं।
कृष्ण ने उन्हें समझाया कि निर्वस्त्र होकर जल-देवताओं के समक्ष स्नान करना व्रत का उल्लंघन है, अतः उन्हें हाथ जोड़कर प्रणाम करना चाहिए — गोपकन्याओं ने ऐसा किया, और कृष्ण ने प्रसन्न होकर उनके वस्त्र लौटाए तथा उन्हें यह वरदान दिया कि उनकी हार्दिक इच्छा — कृष्ण को ही पति रूप में पाने की — अवश्य पूर्ण होगी, इस लीला को भक्तों द्वारा अहंकार के समस्त आवरणों को भगवान के समक्ष निःसंकोच त्यागने के गहन प्रतीक के रूप में समझा जाता है।
इस अध्याय की शिक्षा
अहंकार के समस्त आवरण, चाहे वे कितने भी सूक्ष्म क्यों न हों, भगवान के समक्ष निःसंकोच त्याग देने चाहिए — यही सच्ची शरणागति है।
ब्राह्मणों की पत्नियों को आशीर्वाद
एक बार, कृष्ण और उनके ग्वाल-मित्र, वन में क्रीड़ा करते हुए अत्यंत भूखे हो गए, और उन्होंने निकट ही एक विशाल यज्ञ कर रहे ब्राह्मणों के पास जाकर भोजन की याचना की। किंतु वे कर्मकांडी ब्राह्मण, यज्ञ-विधि में इतने व्यस्त और नियम-बद्ध थे कि उन्होंने बालकों की विनम्र प्रार्थना को पूर्णतः अनसुना कर दिया।
निराश होकर कृष्ण ने अपने मित्रों को उन्हीं ब्राह्मणों की पत्नियों के पास भेजा, यह जानते हुए कि स्त्रियों का हृदय स्वाभाविक रूप से अधिक कोमल और भक्तिपूर्ण होता है। ब्राह्मण-पत्नियाँ, कृष्ण का नाम सुनते ही अत्यंत हर्षित हुईं, और अपने पतियों की अनुमति की प्रतीक्षा किए बिना ही, प्रचुर मात्रा में स्वादिष्ट भोजन लेकर तुरन्त कृष्ण के पास दौड़ पड़ीं।
कृष्ण, इस निष्ठावान, निःसंकोच भक्ति से अत्यंत प्रसन्न होकर, इन ब्राह्मण-पत्नियों को अनंत, शाश्वत आशीर्वाद प्रदान किया, तथा बाद में उनके पतियों को भी, अपनी भूल का एहसास होने पर, क्षमा और दर्शन का सौभाग्य दिया — इस प्रकार यह कथा दर्शाती है कि शुष्क कर्मकांड से कहीं अधिक मूल्यवान है हृदय की सहज, निःस्वार्थ भक्ति।
इस अध्याय की शिक्षा
हृदय की सहज, निःस्वार्थ भक्ति शुष्क कर्मकांड और सामाजिक नियमों से कहीं अधिक मूल्यवान है।
गोवर्धन पूजा का उपदेश
शरद ऋतु के पश्चात्, जब वृंदावनवासी प्रतिवर्ष की भाँति इंद्र देव की पूजा हेतु यज्ञ की तैयारी करने लगे, कृष्ण ने अपने पिता नंद और अन्य वृद्ध गोपालकों से इस पूजा का औचित्य पूछा।
उन्होंने अत्यंत तर्कसंगत ढंग से समझाया कि प्रत्येक प्राणी अपने ही कर्मों का फल भोगता है, और इंद्र, जो केवल वर्षा की व्यवस्था का एक साधन मात्र हैं, उनकी पूजा से अधिक उपयुक्त है उस गोवर्धन पर्वत की पूजा, जो प्रत्यक्ष रूप से उन्हें चारागाह, जल और आश्रय प्रदान करता है।
कृष्ण के इस तर्क से प्रभावित होकर, समस्त वृंदावनवासियों ने, अपने परम्परागत इंद्र-यज्ञ को त्यागकर, इसके स्थान पर गोवर्धन पर्वत की भव्य पूजा-अर्चना की, अन्न के पर्वत-सम ढेर अर्पित किए, और कृष्ण ने स्वयं ही एक विशाल रूप धारण कर, गोवर्धन पर्वत के रूप में, यह समस्त भोग ग्रहण किया।
इस अध्याय की शिक्षा
जो प्रत्यक्ष रूप से हमारा पालन-पोषण करता है, उसके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना ही सच्चा, तर्कसंगत धर्म है, अंधानुकरण नहीं।
इंद्र का क्रोध और गोवर्धन धारण
इंद्र, अपनी पूजा में इस प्रकार व्यवधान पड़ने और अपने अपमान से अत्यंत क्रोधित हुए, उन्होंने तत्काल सांवर्तक नामक प्रलयंकारी मेघों को आदेश दिया कि वे वृंदावन पर ऐसी भीषण वर्षा और तूफान बरसाएँ जो सम्पूर्ण गोकुल को जलमग्न कर व्रजवासियों को उनके अहंकारपूर्ण कृत्य का दंड दे सकें।
सात दिनों और रात्रियों तक अनवरत मूसलाधार वर्षा होती रही, ओले गिरते रहे, और भयंकर शीतलहर चलती रही, गोपालक और उनके पशु भय और शीत से काँपने लगे, यह न समझते हुए कि इस विपत्ति से कैसे बचें, अपने प्रिय कृष्ण की ओर सहायता की आशा से देखते रहे।
कृष्ण ने, बिना किसी विशेष प्रयास के, अपनी सबसे छोटी उँगली पर सम्पूर्ण विशाल गोवर्धन पर्वत को उठा लिया, और उसे एक विशाल छतरी की भाँति धारण करते हुए, समस्त गोपालकों, उनके परिवारों और पशुओं को उसके नीचे सात दिनों तक पूर्णतः सुरक्षित आश्रय दिया, बिना स्वयं तनिक भी थकान या कठिनाई अनुभव किए, इस प्रकार अपनी असीम शक्ति और अपने भक्तों के प्रति अपनी अटूट रक्षा-प्रतिबद्धता दोनों प्रकट करते हुए।
इस अध्याय की शिक्षा
अहंकार और क्रोध के प्रकोप के समक्ष भी भगवान अपने भक्तों को पूर्ण, अटूट सुरक्षा प्रदान करते हैं, चाहे संकट कितना भी विशाल क्यों न हो।
नंद द्वारा कृष्ण की महिमा का वर्णन
पर्वत उठाने की इस अभूतपूर्व घटना के पश्चात्, नंद बाबा और अन्य वृद्ध गोपालक, अपने आपस के वार्तालाप में, कृष्ण की अनेक पूर्व असाधारण घटनाओं को स्मरण करने लगे — पूतना का वध, गाड़ी का पलटना, यमलार्जुन वृक्षों का गिरना, और अब यह गोवर्धन-धारण।
नंद ने विशेष रूप से यह स्मरण किया कि किस प्रकार महर्षि गर्ग ने बहुत पहले ही भविष्यवाणी की थी कि यह बालक असाधारण, अलौकिक कार्य करेगा, और अब, इन घटनाओं की श्रृंखला को देखकर, उन्हें धीरे-धीरे यह गहन आभास होने लगा कि उनका यह प्रिय पुत्र कोई साधारण मानव बालक नहीं, अपितु कोई असाधारण, दिव्य सत्ता है, यद्यपि पितृ-स्नेह के कारण वे इसे पूर्णतः स्वीकार करने में अभी भी हिचकिचा रहे थे।
इस अध्याय की शिक्षा
बार-बार के असाधारण अनुभव धीरे-धीरे यह प्रकट करते हैं कि जिसे हम साधारण समझते हैं, वह वास्तव में असाधारण, दिव्य हो सकता है।
इंद्र और सुरभि द्वारा कृष्ण की स्तुति
इंद्र, अपनी पराजय और अपने अहंकारपूर्ण क्रोध की व्यर्थता का एहसास होने पर, अत्यंत लज्जित और पश्चातापी होकर, स्वयं ऐरावत हाथी पर सवार होकर कृष्ण के समक्ष उपस्थित हुए, और साष्टांग प्रणाम कर अपने अपराध की क्षमा माँगी।
इंद्र ने कृष्ण की एक गहन, भावपूर्ण स्तुति अर्पित की, उन्हें परम भगवान के रूप में पहचानते हुए, और अपनी भूल स्वीकार करते हुए क्षमा-याचना की। इसी शुभ अवसर पर, दिव्य गौ सुरभि भी वहाँ प्रकट हुईं, और स्वर्ग की पवित्र गंगा नदी ने भी अपने जल से कृष्ण का अभिषेक किया।
इंद्र और सुरभि ने मिलकर, इस पवित्र जल से, कृष्ण का औपचारिक राज्याभिषेक "गोविंद" की उपाधि के साथ सम्पन्न किया — गोविंद, अर्थात् गायों तथा इंद्रियों दोनों के परम रक्षक और स्वामी — यह उपाधि आगे चलकर कृष्ण के सर्वाधिक प्रिय नामों में से एक बन गई।
इस अध्याय की शिक्षा
अहंकार और क्रोध के पश्चात् भी सच्ची क्षमा-याचना और विनम्रता सम्मान तथा आशीर्वाद पुनः प्राप्त करा सकती है।
नंद की वरुण-लोक से रक्षा और वैकुंठ-दर्शन
एक बार, नंद बाबा, एकादशी का व्रत रखते हुए, रात्रि में यमुना के तट पर स्नान करने गए, जहाँ वरुण देव के सेवकों ने उन्हें गलती से पकड़कर वरुण-लोक ले गए, यह समझते हुए कि रात्रि में जल में स्नान करना वरुण के अधिकार-क्षेत्र का उल्लंघन है।
जब कृष्ण को इसका पता चला, वे स्वयं वरुण-लोक गए, जहाँ वरुण देव ने उन्हें पहचानते ही अत्यंत श्रद्धा और लज्जा के साथ नंद को तुरन्त मुक्त कर, क्षमा-याचना करते हुए विदा किया।
इसी अवसर पर, कृष्ण ने अपने ग्वाल-मित्रों को भी वैकुण्ठ-धाम की एक अलौकिक झलक दिखाई, जिससे वे सभी विस्मित होकर यह अनुभव करने लगे कि उनका प्रिय सखा कृष्ण किसी असीम, दिव्य लोक से भी परे की सत्ता है — यह दर्शन उनके हृदय में कृष्ण के प्रति भक्ति और विस्मय को और भी गहरा कर गया।
इस अध्याय की शिक्षा
भगवान के परम भक्तों को भी, समय-समय पर, उनकी असीम दिव्यता की एक झलक प्रदान की जाती है, जिससे उनकी भक्ति और गहरी हो जाती है।
रास-लीला का आरम्भ
शरद पूर्णिमा की एक अत्यंत मनोहर रात्रि में, जब चंद्रमा अपनी पूर्ण, उज्ज्वल कांति से वृंदावन को स्नान करा रहा था, कृष्ण ने अपनी वंशी पर एक ऐसी अलौकिक, मंत्रमुग्ध कर देने वाली धुन बजाई, जिसे सुनते ही गोपियों के हृदय प्रेम से व्याकुल हो उठे।
गोपियाँ, अपने समस्त घरेलू कार्यों, पति और परिवार की भी परवाह किए बिना, जो कुछ भी कर रही थीं उसे तत्काल छोड़कर, कुछ तो दूध दुहते-दुहते ही, कुछ भोजन बनाते-बनाते ही, वन की ओर दौड़ पड़ीं, यह प्रतीकात्मक रूप से आत्मा की परमात्मा के प्रति उस शुद्धतम, सर्वस्व-त्यागी लालसा को दर्शाता है जो सांसारिक कर्तव्यों और बंधनों से भी ऊपर उठ जाती है।
कृष्ण ने, प्रारम्भ में, कुछ गोपियों को यह कहते हुए घर लौटने का आग्रह किया कि विवाहित स्त्रियों को रात्रि में इस प्रकार वन में आना उचित नहीं, किंतु गोपियों ने अपने प्रेम की गहनता और निश्छलता से यह स्पष्ट कर दिया कि उनका यह प्रेम किसी सांसारिक इच्छा से प्रेरित नहीं, अपितु शुद्ध, निष्काम भक्ति है, जिसे देखकर कृष्ण प्रसन्न हुए और उनके साथ रास-लीला आरम्भ की।
इस अध्याय की शिक्षा
सच्चा प्रेम सांसारिक कर्तव्यों और बंधनों से भी ऊपर उठ सकता है, जब वह पूर्णतः निष्काम और भगवद्-केंद्रित हो।
गोपियों की कृष्ण की खोज
रास-लीला के मध्य, जब गोपियों को कृष्ण के प्रति अपने विशेष, व्यक्तिगत आकर्षण पर कुछ अभिमान होने लगा — प्रत्येक यह सोचने लगी कि कृष्ण विशेष रूप से केवल उसी के प्रति अधिक स्नेह रखते हैं — कृष्ण, उनके इस सूक्ष्म अहंकार को शांत करने हेतु, अचानक उनके समक्ष से अदृश्य हो गए।
गोपियाँ, कृष्ण की अनुपस्थिति से असहनीय विरह-वेदना में डूब गईं, और गहन व्याकुलता में वन में इधर-उधर उन्हें खोजने लगीं, अपने प्रियतम के विषय में वृक्षों, लताओं, फूलों और यहाँ तक कि हिरणों तथा मयूरों से भी पूछती हुईं कि क्या उन्होंने उनके श्यामसुंदर को इस मार्ग से जाते देखा है।
इस खोज में, गोपियाँ स्वयं को कृष्ण की विभिन्न लीलाओं में इतना तल्लीन कर बैठीं कि वे स्वयं कृष्ण की चेष्टाओं का अभिनय करने लगीं — यह गहन विरह-दशा भक्ति के उस उच्चतम स्तर को दर्शाती है जहाँ भक्त, प्रियतम की अनुपस्थिति में भी, निरंतर उन्हीं का चिंतन करते हुए, स्वयं को उनसे कभी पृथक् अनुभव नहीं करता।
भाग २ समाप्त (अध्याय १६-३०) — भाग ३ में अध्याय ३१-४५ जारी रहेगा
इस अध्याय की शिक्षा
प्रियतम की अनुपस्थिति में भी उन्हीं का सतत चिंतन करना, और उन्हें हर जगह खोजना, भक्ति की गहनतम, शुद्धतम अवस्था है।
गोपी-गीत: विरह का गान
अपनी व्याकुल खोज के दौरान, गोपियों ने मिलकर एक अत्यंत हृदयस्पर्शी, मार्मिक सामूहिक गीत गाया — गोपी-गीत — जिसमें उन्होंने कृष्ण के अनंत गुणों, उनके मनमोहक रूप, उनकी मधुर मुस्कान, और उनकी अनुपस्थिति से उत्पन्न असहनीय विरह-पीड़ा का अत्यंत मार्मिक वर्णन किया।
इस गीत में गोपियों ने कृष्ण से यह भी शिकायत की कि उन्होंने अपनी मुस्कान और मधुर वचनों से पहले तो उनके हृदय को पूर्णतः मोह लिया, और अब उन्हें इस प्रकार अकेला, विरही छोड़ दिया — यह गीत वैष्णव भक्ति-साहित्य में विरह-भाव की सर्वोच्च, सर्वाधिक प्रिय अभिव्यक्तियों में से एक माना जाता है, जो प्रत्येक साधक की भगवद्-विरह की पीड़ा को शब्द देता है।
इस अध्याय की शिक्षा
विरह में भी की गई सच्ची स्तुति और गहन प्रेम-पीड़ा की अभिव्यक्ति स्वयं में एक शुद्धिकारी, भक्तिपूर्ण साधना बन जाती है।
कृष्ण का पुनः प्रकट होना
गोपियों की इस सच्ची, अटूट, निष्काम भक्ति और उनके गहन विरह-गान से अत्यंत प्रसन्न होकर, कृष्ण अंततः अपनी मनमोहक मुस्कान के साथ पुनः उनके समक्ष प्रकट हुए, पीत वस्त्र और वनमाला धारण किए, ठीक उसी प्रकार जैसे कोई अभिनेता रंगमंच पर प्रकट होता है।
गोपियाँ, कृष्ण को पुनः देखते ही, अपनी सम्पूर्ण विरह-पीड़ा को क्षण भर में भूल गईं, उनका हृदय असीम आनंद से भर उठा, और कुछ ने तो प्रेमातिरेक में उनका हाथ पकड़ लिया, कुछ उनके समीप बैठ गईं, प्रत्येक अपने-अपने ढंग से इस पुनर्मिलन के आनंद को व्यक्त करते हुए, कृष्ण ने भी उन्हें स्नेहपूर्वक सांत्वना दी।
इस अध्याय की शिक्षा
सच्ची, अटूट भक्ति और विरह-वेदना कभी व्यर्थ नहीं जाती — प्रियतम, चाहे कितनी भी देर से ही सही, अंततः लौट आते हैं।
रास-नृत्य का वर्णन
इसके पश्चात् वह अलौकिक, विश्वप्रसिद्ध रास-नृत्य आरम्भ हुआ, जिसमें कृष्ण ने अपनी योग-शक्ति से स्वयं को उतने ही रूपों में विस्तारित किया जितनी गोपियाँ उपस्थित थीं, प्रत्येक गोपी के दोनों ओर स्वयं कृष्ण खड़े होकर नृत्य करने लगे, जिससे प्रत्येक गोपी को यह अनुभव हुआ कि कृष्ण केवल उसी के साथ, अकेले नृत्य कर रहे हैं।
वृत्ताकार रूप में घूमते हुए इस दिव्य नृत्य में, वंशी की मधुर धुन, नूपुरों की झंकार, और गोपियों के मधुर गायन ने मिलकर ऐसा अलौकिक वातावरण रचा कि स्वयं देवगण भी आकाश से यह दृश्य देखने के लिए विमानों में एकत्रित हो गए और पुष्पवर्षा करने लगे।
शुकदेव ने राजा परीक्षित को विशेष रूप से यह चेतावनी दी कि इस रास-लीला को कभी भी सामान्य सांसारिक प्रेम या इंद्रिय-भोग की दृष्टि से नहीं देखना चाहिए, अपितु यह आत्मा और परमात्मा के मध्य होने वाले उस पूर्णतम, शुद्धतम, दिव्य मिलन का सर्वोच्च प्रतीक है, जिसे केवल पूर्ण भक्ति और श्रद्धा के साथ ही समझा जा सकता है, अन्यथा इसका अनुकरण करने का प्रयास स्वयं के लिए विनाशकारी सिद्ध होता है।
इस अध्याय की शिक्षा
भगवान का प्रेम प्रत्येक भक्त के लिए व्यक्तिगत और सम्पूर्ण होता है — वे स्वयं को विस्तारित कर प्रत्येक हृदय को समान, पूर्ण स्नेह देने में सक्षम हैं।
शंखचूड़ और अरिष्टासुर वध
रास-लीला की इस दिव्य रात्रि के पश्चात्, एक अवसर पर, शंखचूड़ नामक एक कुबेर-सेवक यक्ष, गोपियों को अकेला देखकर, उनका अपहरण करने का प्रयास करने लगा, अपनी शक्ति के अभिमान में उन्हें बलपूर्वक हरने का दुस्साहस करते हुए।
बलराम, गोपियों की पुकार सुनकर तुरन्त वहाँ पहुँचे और शंखचूड़ का पीछा कर, उसे पकड़कर, अपने ही बल से उसका सिर धड़ से अलग कर दिया, और उसके मस्तक पर सुशोभित एक अत्यंत मूल्यवान मणि कृष्ण को भेंट स्वरूप अर्पित की।
इसके कुछ समय पश्चात्, कंस द्वारा भेजा गया एक अन्य राक्षस, अरिष्टासुर, एक विशालकाय, क्रोधित वृषभ का रूप धारण कर वृंदावन में उत्पात मचाने लगा, अपने खुरों से भूमि खोदते और गर्जना से सबको भयभीत करते हुए — कृष्ण ने निर्भीकता से आगे बढ़कर, उसके सींग पकड़कर उसे भूमि पर पटक दिया, और अपने पैर से उसे कुचलकर सदा के लिए शांत कर दिया।
इस अध्याय की शिक्षा
जो कोई भी निर्दोष, असहाय पर आक्रमण करने का प्रयास करता है, उसे भगवान के भक्तों और रक्षकों से अंततः उचित दंड मिलता ही है।
गोपियों के गीत
इस अध्याय में गोपियों के कुछ और सुंदर, हृदयस्पर्शी गीत वर्णित हैं, जो उन्होंने कृष्ण और बलराम को प्रतिदिन प्रातःकाल गायों को चराने वन की ओर जाते देखकर गाए, उनकी वंशी की मधुर ध्वनि, उनके चलने की मनोहर चाल, और उनके असीम सौंदर्य का वर्णन करते हुए।
इन गीतों में गोपियों ने यह भी व्यक्त किया कि किस प्रकार वन के पशु-पक्षी, यहाँ तक कि वृक्ष और नदियाँ भी, कृष्ण की वंशी-ध्वनि सुनकर स्तब्ध और मंत्रमुग्ध हो जाते हैं, और कैसे स्वयं गोपियों के लिए यह क्षण, जब कृष्ण धूल-धूसरित होकर, कंधे पर बाँसुरी रखे वन की ओर प्रस्थान करते हैं, दिन का सर्वाधिक मूल्यवान और प्रतीक्षित क्षण होता है।
इस अध्याय की शिक्षा
प्रतिदिन की साधारण दिनचर्या भी, यदि भगवद्-स्मरण से युक्त हो, गहन भक्ति और आनंद का स्रोत बन सकती है।
केशी और व्योमासुर वध
कंस, कृष्ण को नष्ट करने के अपने सभी पूर्व प्रयासों की असफलता से क्रोधित होकर, अब एक अत्यंत शक्तिशाली राक्षस केशी को भेजा, जिसने एक विशाल, उन्मत्त अश्व का रूप धारण कर वृंदावन में भीषण उत्पात मचाना आरम्भ किया।
कृष्ण, बिना भय के, केशी के समक्ष खड़े हुए, और जब उस अश्व ने अपना विशाल मुख खोलकर कृष्ण को निगलने का प्रयास किया, कृष्ण ने अपनी भुजा को ही उसके मुख में डाल दिया, और उसे इतना विस्तारित किया कि केशी का गला अवरुद्ध हो गया, जिससे वह दम घुटकर तत्काल प्राणहीन होकर गिर पड़ा।
इसके पश्चात्, व्योमासुर नामक एक अन्य राक्षस, मायावी शक्ति से एक ग्वाल-बालक का वेश धारण कर, खेल के दौरान एक-एक कर अनेक ग्वाल-बालों का अपहरण कर उन्हें एक पर्वत-गुफा में बंद करने लगा — कृष्ण ने, इसे समय रहते पहचानकर, व्योमासुर का पीछा किया, उसे पकड़कर उसका वध किया, और अपने समस्त सखाओं को सुरक्षित मुक्त कराया।
इस अध्याय की शिक्षा
भगवान अपने अनंत सामर्थ्य से किसी भी राक्षस या मायावी शक्ति को, चाहे वह कितनी भी शक्तिशाली प्रतीत हो, सरलता से निष्प्रभावी कर सकते हैं।
नारद का कंस के पास आगमन
इसी काल में, देवर्षि नारद मुनि, स्वयं मथुरा में कंस के दरबार में पधारे, और उन्हें विस्तार से यह गोपनीय, चौंका देने वाला सत्य प्रकट किया कि जिन कृष्ण और बलराम को कंस अब तक केवल वृंदावन के साधारण ग्वाल-बालक समझ रहे थे, वे वास्तव में देवकी और वसुदेव के ही आठवें और सातवें पुत्र हैं, जिन्हें योगमाया की सहायता से गुप्त रूप से गोकुल भेजा गया था।
यह सुनते ही कंस अत्यंत भयभीत, क्रोधित और असमंजस में डूब गया, यह अनुभव करते हुए कि जिस मृत्यु से बचने के लिए उसने अपनी बहन के छह पुत्रों की हत्या की, वह मृत्यु फिर भी उससे बच नहीं सकी, और अब वह इस भय से और भी अधिक व्याकुल होकर, कृष्ण और बलराम को नष्ट करने की एक अंतिम, निर्णायक योजना बनाने लगा।
इस अध्याय की शिक्षा
सत्य, चाहे कितने भी समय तक छिपा रहे, अंततः प्रकट होता ही है — और यह प्रकटीकरण प्रायः सबसे अप्रत्याशित क्षण में घटित होता है।
अक्रूर को व्रज भेजा जाना
कंस ने, अपने मंत्रियों के परामर्श पर, एक कुटिल योजना बनाई — उसने अपने ही चचेरे भाई, परम भक्त अक्रूर को, कृष्ण और बलराम को एक भव्य धनुष-यज्ञ के बहाने मथुरा आमंत्रित करने हेतु वृंदावन भेजा।
इस निमंत्रण के पीछे कंस का वास्तविक, कुटिल उद्देश्य यह था कि मथुरा पहुँचने पर, वह अपने शक्तिशाली पहलवानों चाणूर और मुष्टिक से उन्हें कुश्ती में मरवा डाले, या यदि वे बच निकलें, तो अपने मदमस्त हाथी कुवलयापीड़ से उन्हें कुचलवा दे।
अक्रूर, यद्यपि कंस के इस कुटिल षड्यंत्र से पूर्णतः अवगत थे, फिर भी अपने राजा की आज्ञा का पालन करते हुए, तथा साथ ही स्वयं कृष्ण के दर्शन की गहन लालसा से प्रेरित होकर, रथ पर सवार होकर वृंदावन की ओर प्रस्थान किया।
इस अध्याय की शिक्षा
एक कुटिल योजना का साधन बनने पर भी, यदि हृदय भक्ति और सत्य से परिपूर्ण हो, तो व्यक्ति उस योजना से ऊपर उठकर भगवद्-दर्शन का सौभाग्य पा सकता है।
अक्रूर की यात्रा और दिव्य दर्शन
वृंदावन से कृष्ण और बलराम को रथ पर बिठाकर मथुरा की ओर लौटते समय, अक्रूर ने मार्ग में यमुना नदी में स्नान हेतु विराम लिया, और जल में डुबकी लगाते ही, उन्हें एक अत्यंत अद्भुत, अलौकिक दर्शन प्राप्त हुआ — जल के भीतर उन्होंने स्वयं भगवान के विराट, सहस्र-फण शेषशायी रूप को साक्षात् देखा, ठीक वैसे ही जैसे रथ पर बैठे कृष्ण प्रत्यक्ष दिखाई दे रहे थे।
यह अद्भुत, चमत्कारिक दर्शन देखकर अक्रूर स्तब्ध रह गए, और तुरन्त जल से बाहर आकर यह देखा कि कृष्ण सामान्य रूप से रथ पर ही बैठे हैं — इस अनुभव ने उनके हृदय में यह अटूट निश्चय स्थापित कर दिया कि यह बालक कोई साधारण मानव नहीं, अपितु साक्षात् परब्रह्म, परम भगवान ही हैं, और वे भक्ति के अतिरेक में अश्रुपूरित हो उठे।
इस अध्याय की शिक्षा
भगवान का साक्षात् दर्शन, चाहे क्षण भर के लिए ही क्यों न हो, हृदय में ऐसा अटूट विश्वास स्थापित कर देता है जो कभी नहीं डगमगाता।
अक्रूर की स्तुति
इस असाधारण दर्शन से अभिभूत होकर, अक्रूर ने रथ रोककर, कृष्ण के चरणों में गिरकर, एक अत्यंत गहन, हृदयस्पर्शी और दार्शनिक स्तुति अर्पित की, उन्हें सृष्टि, स्थिति और संहार के परम कारण, समस्त अवतारों के मूल स्रोत के रूप में स्वीकार करते हुए।
उन्होंने कृष्ण से विनम्रतापूर्वक क्षमा माँगी कि वे कंस के दूत के रूप में, एक कुटिल उद्देश्य लेकर, उन्हें मथुरा ले जा रहे हैं, किंतु कृष्ण ने उन्हें स्नेहपूर्वक आश्वस्त किया कि वे इस सम्पूर्ण योजना से पूर्णतः अवगत हैं, और यह कि कंस-वध का समय अब निकट ही आ चुका है — इसके पश्चात् वे तीनों पुनः मथुरा की ओर प्रस्थान कर गए।
इस अध्याय की शिक्षा
अपने ही अनुचित उद्देश्य के साधन बनने पर भी, यदि हृदय सच्चा हो, भगवान स्वयं उसे क्षमा और स्नेह से भर देते हैं।
कृष्ण-बलराम का मथुरा प्रवेश
मथुरा नगरी में प्रवेश करते ही, कृष्ण और बलराम, अपने सुंदर, आकर्षक रूप से सम्पूर्ण नगरवासियों को मंत्रमुग्ध करते हुए, नगर की गलियों में भ्रमण करने लगे, जहाँ प्रत्येक स्त्री-पुरुष उन्हें देखने के लिए खिड़कियों और छतों पर उमड़ पड़े।
मार्ग में, उनकी भेंट कुब्जा नामक एक कुबड़ी दासी से हुई, जो कंस के लिए चंदन का लेप लेकर जा रही थी। कृष्ण ने स्नेहपूर्वक उससे चंदन माँगा, और वह, कृष्ण के असाधारण सौंदर्य से मुग्ध होकर, प्रसन्नतापूर्वक सारा चंदन उन्हें अर्पित कर दिया।
कृष्ण ने, उसकी इस निश्छल सेवा-भावना से प्रसन्न होकर, अपने पैर के अंगूठे से उसके पैर दबाए और अपनी उँगलियों से उसकी ठुड्डी उठाकर उसे ऊपर खींचा, जिससे वह कुबड़ी दासी, जो वर्षों से टेढ़ी पीठ के कारण कष्ट भोग रही थी, तत्काल एक सुंदर, सीधी, आकर्षक स्त्री में परिवर्तित हो गई, उसकी दीर्घकालिक शारीरिक पीड़ा सदा के लिए समाप्त हो गई।
इस अध्याय की शिक्षा
भगवान का साधारण भ्रमण भी सम्पूर्ण नगर के लिए उत्सव और वरदान का कारण बनता है, और उनकी कृपा सबसे उपेक्षित व्यक्ति तक भी पहुँचती है।
धनुष तोड़ना और धोबी का वध
आगे बढ़ते हुए, कृष्ण और बलराम एक ऐसे स्थान पर पहुँचे जहाँ कंस का विशाल, शक्तिशाली धनुष यज्ञ हेतु रखा गया था, जिसकी रक्षा कठोर प्रहरी कर रहे थे। कृष्ण ने सहजता से उस धनुष को उठाया और उसे चढ़ाने के प्रयास में ही, उसे दो टुकड़ों में तोड़ डाला, जिसकी गर्जना से सम्पूर्ण नगर काँप उठा।
धनुष की रक्षा में तैनात सैनिकों ने आक्रमण किया, किंतु कृष्ण और बलराम ने उन्हें सरलता से परास्त कर दिया। इसके पश्चात्, मार्ग में एक अभिमानी धोबी, जो कंस के लिए वस्त्र धो रहा था, से कृष्ण ने कुछ सुंदर वस्त्र माँगे, किंतु उस अहंकारी धोबी ने कठोरता से इनकार करते हुए उन्हें अपमानित किया।
क्रोधित कृष्ण ने अपने हाथ के एक ही प्रहार से उस धोबी का सिर धड़ से अलग कर दिया, और उसके सुंदर वस्त्र स्वयं तथा बलराम के लिए ले लिए — इसके विपरीत, एक विनम्र माली ने स्वेच्छा से उन्हें सुंदर पुष्पमालाएँ भेंट कीं, जिसके लिए कृष्ण ने उसे अनंत समृद्धि का आशीर्वाद दिया, यह दर्शाते हुए कि विनम्रता पुरस्कृत होती है जबकि अहंकार दंडित।
इस अध्याय की शिक्षा
अभिमान और कठोरता अंततः दंडित होते हैं, जबकि विनम्रता और सेवा-भावना उदार पुरस्कार पाती है — यह एक शाश्वत, न्यायपूर्ण नियम है।
कुवलयापीड़ हाथी का वध
कुश्ती के विशाल अखाड़े में प्रवेश करने से पूर्व, कंस ने अपने सबसे भयंकर अस्त्र के रूप में, मदमस्त, विशालकाय हाथी कुवलयापीड़ को द्वार पर खड़ा कर रखा था, जिसे विशेष रूप से कृष्ण और बलराम को कुचल डालने के लिए उकसाया गया था।
जैसे ही कृष्ण और बलराम द्वार के निकट पहुँचे, महावतों ने हाथी को उन पर झपटने का इशारा किया। हाथी ने अपनी सूँड़ से कृष्ण को पकड़ने का प्रयास किया, किंतु कृष्ण, फुर्ती से उसके पैरों के बीच से निकलकर, उसकी पूँछ पकड़कर उसे चारों ओर घुमाने लगे, हाथी को पूर्णतः असमंजस में डालते हुए।
अंततः, कृष्ण ने हाथी के दाँत उखाड़ लिए, और उन्हीं दाँतों से उसे तथा उसके महावतों को इतनी सरलता से मार डाला मानो कोई साधारण बालक-क्रीड़ा हो, तत्पश्चात् वे दोनों भाई, हाथी के रक्त से सने वे दाँत अपने कंधों पर लिए, विजयी भाव से कुश्ती-अखाड़े की ओर आगे बढ़े, जिससे सम्पूर्ण उपस्थित जनसमूह विस्मय और भय से स्तब्ध रह गया।
इस अध्याय की शिक्षा
जो शक्ति विशेष रूप से विनाश के लिए भेजी जाए, वह भी भगवान के समक्ष एक साधारण बाधा मात्र सिद्ध होती है।
चाणूर, मुष्टिक का वध और कंस-वध
कुश्ती-अखाड़े में प्रवेश करते ही, कंस ने अपने सबसे शक्तिशाली, पेशेवर पहलवानों चाणूर और मुष्टिक को कृष्ण और बलराम से भिड़ने का आदेश दिया, यह विश्वास करते हुए कि ये विशाल, अनुभवी पहलवान इन दो किशोर बालकों को क्षण भर में कुचल देंगे।
कृष्ण ने चाणूर से, और बलराम ने मुष्टिक से भीषण द्वंद्व किया, और उपस्थित समस्त दर्शकों — विशेषकर वृद्ध व्रजवासियों और वसुदेव-देवकी, जो गुप्त रूप से यह दृश्य देख रहे थे — के हृदय भय और चिंता से भर उठे। किंतु कृष्ण और बलराम ने अपनी दिव्य शक्ति से दोनों पहलवानों को धराशायी कर, उनका वध कर दिया।
यह देखकर क्रोधित कंस ने कृष्ण को तत्काल मारने और वसुदेव-नंद को बंदी बनाने का आदेश दिया, किंतु कृष्ण, बिजली की गति से मंच पर कूद पड़े, कंस को उनके ही केशों से पकड़कर सिंहासन से नीचे खींच लिया, और उन्हें भूमि पर पटककर, उनकी छाती पर चढ़कर, उनका वध कर दिया — इस प्रकार वह भविष्यवाणी अंततः पूर्ण हुई जिसने इस सम्पूर्ण महाकाव्य कथा को गति दी थी। देवकी और वसुदेव तत्काल कारागार से मुक्त हुए, कृष्ण ने उनके चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लिया, और वयोवृद्ध उग्रसेन को पुनः सम्मानपूर्वक मथुरा के सिंहासन पर बिठाया गया।
इस अध्याय की शिक्षा
अन्याय और अत्याचार की जड़ें कितनी भी गहरी और शक्तिशाली क्यों न हों, धर्म की विजय अंततः निश्चित है।
सांदीपनि मुनि के आश्रम में शिक्षा
कंस-वध और मथुरा में शांति स्थापित होने के पश्चात्, कृष्ण और बलराम ने, यज्ञोपवीत संस्कार के पश्चात् वेदाध्ययन हेतु, अवंतीपुर (उज्जैन) में ऋषि सांदीपनि मुनि के आश्रम में जाकर विद्यार्जन आरम्भ किया, एक साधारण शिष्य की भाँति गुरु-सेवा करते हुए, यद्यपि वे स्वयं ही समस्त ज्ञान के स्रोत थे।
अल्प समय में ही, दोनों भाइयों ने चौंसठ दिनों में चौसठ कलाएँ और समस्त वेद-वेदांगों का पूर्ण ज्ञान प्राप्त कर लिया, गुरु सांदीपनि को अत्यंत विस्मित और श्रद्धावनत करते हुए।
शिक्षा पूर्ण होने पर, गुरु-दक्षिणा के रूप में, सांदीपनि ने अपने उस पुत्र को वापस माँगा जो प्रभास क्षेत्र के समुद्र में डूबकर मृत्यु को प्राप्त हो चुका था — कृष्ण और बलराम, समुद्र देवता के पास गए, जिन्होंने बताया कि बालक को पंचजन नामक एक शंख-रूपी असुर ने हर लिया है। कृष्ण ने उस असुर का वध कर उसका शंख (पांचजन्य) प्राप्त किया, और फिर स्वयं यमलोक जाकर, यमराज से गुरु-पुत्र को वापस माँगकर, उसे जीवित लौटाकर, अपने गुरु के प्रति अपनी असीम कृतज्ञता का यह असाधारण प्रमाण दिया।
भाग ३ समाप्त (अध्याय ३१-४५) — भाग ४ में अध्याय ४६-६० जारी रहेगा
इस अध्याय की शिक्षा
गुरु के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने में कोई भी कार्य असंभव नहीं होना चाहिए, चाहे इसके लिए यमलोक तक ही क्यों न जाना पड़े।
उद्धव का व्रज में आगमन
मथुरा में स्थायी रूप से बस जाने के पश्चात् भी, कृष्ण का हृदय वृंदावन के अपने प्रिय माता-पिता, नंद-यशोदा, तथा गोपियों की स्मृति से कभी मुक्त नहीं हुआ। उनकी विरह-वेदना को शांत करने के उद्देश्य से, कृष्ण ने अपने परम प्रिय मित्र और मंत्री उद्धव को विशेष रूप से व्रज भेजा।
उद्धव, कृष्ण का संदेश और उनके वस्त्र-आभूषण लेकर वृंदावन पहुँचे, जहाँ उन्होंने नंद बाबा और यशोदा को कृष्ण की ओर से स्नेह-भरा सांत्वना-संदेश दिया, यद्यपि यशोदा का हृदय अपने पुत्र के वियोग में अब भी अश्रुपूरित हो उठा।
इसके पश्चात् उद्धव गोपियों से मिलने गए, जो कृष्ण के वियोग में इतनी गहन विरह-अवस्था में थीं कि वे लगभग कृष्ण-मय ही हो चुकी थीं — उनकी यह अटूट, निश्छल भक्ति देखकर उद्धव, जो स्वयं एक महान ज्ञानी थे, गहराई से चकित और प्रभावित हुए।
इस अध्याय की शिक्षा
दूर रहकर भी अपने प्रियजनों के प्रति स्नेह और चिंता प्रकट करना, तथा उन्हें सांत्वना देना, सच्चे सम्बन्ध की पहचान है।
भ्रमर-गीत: गोपियों का भ्रमर को संदेश
गोपियाँ, उद्धव द्वारा लाए गए संदेश को सुनकर, अपने प्रेम की गहनता को एक अत्यंत मार्मिक, प्रतीकात्मक गीत — भ्रमर-गीत — के माध्यम से व्यक्त करने लगीं, एक भ्रमर को संबोधित करते हुए, जिसे वे कृष्ण के दूत के रूप में देखती थीं, ठीक वैसे ही जैसे उद्धव भी एक दूत थे।
इस गीत में गोपियों ने भ्रमर की चंचलता की तुलना कृष्ण की प्रतीत निष्ठुरता से की, यह पूछते हुए कि क्या पुरुष सदैव ऐसे ही होते हैं — पहले प्रेम जगाकर फिर विस्मृत कर देने वाले — फिर भी, इसी गीत के अंत में, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि उनकी भक्ति में कोई वास्तविक शिकायत या क्रोध नहीं, केवल गहन प्रेम की सहज अभिव्यक्ति है, और वे कृष्ण के अतिरिक्त किसी अन्य विचार को अपने हृदय में स्थान नहीं देतीं।
गोपियों ने उद्धव के माध्यम से कृष्ण को यह संदेश भी भेजा कि योग और ज्ञान के मार्ग उनके लिए निरर्थक हैं, क्योंकि उन्हें तो केवल कृष्ण के साक्षात् चरण-दर्शन की ही लालसा है — यह गहन, निश्छल भक्ति-भाव उद्धव के हृदय को भी गहराई से आलोड़ित कर गया।
इस अध्याय की शिक्षा
योग और ज्ञान के मार्ग भी उस निश्छल भक्ति के समक्ष तुच्छ प्रतीत होते हैं जो केवल भगवान के साक्षात् दर्शन की लालसा रखती है।
उद्धव की प्रशंसा और कुब्जा का प्रसंग
गोपियों की इस असाधारण, अटूट भक्ति से अभिभूत होकर, उद्धव ने खुले हृदय से स्वीकार किया कि उनका अपना ज्ञान और योग-साधना भी इस निश्छल प्रेम के समक्ष तुच्छ प्रतीत होती है, और उन्होंने यह हार्दिक इच्छा व्यक्त की कि अगले जन्म में वे वृंदावन की किसी लता या वनस्पति के रूप में जन्म लें, ताकि गोपियों के चरणों की धूलि भी उन्हें प्राप्त हो सके।
इसी अवधि में, उद्धव, कृष्ण के आदेश पर, मथुरा में कुब्जा के घर भी गए, जिसे कृष्ण ने अपने वचन के अनुसार पूर्व में ही दर्शन देने का आश्वासन दिया था। कृष्ण स्वयं भी कुछ समय पश्चात् वहाँ पधारे, उसकी निश्छल भक्ति और सेवा को सम्मान देते हुए, यह दर्शाते हुए कि भगवान अपने प्रत्येक भक्त की भक्ति को समान आदर देते हैं, चाहे वह उच्च कुल की गोपी हो या साधारण दासी।
इस अध्याय की शिक्षा
भक्ति में कोई भेदभाव नहीं होता — भगवान अपने प्रत्येक भक्त की सेवा को समान आदर देते हैं, चाहे उसकी सामाजिक स्थिति कुछ भी हो।
अक्रूर हस्तिनापुर भेजे जाते हैं
इसी काल में, कृष्ण ने अक्रूर को हस्तिनापुर की ओर भेजा, यह जानने हेतु कि पांडु-पुत्रों (पांडवों) और धृतराष्ट्र-पुत्रों (कौरवों) के मध्य राज्य को लेकर बढ़ते विवाद और तनाव की वर्तमान स्थिति क्या है, विशेष रूप से पांडवों के कुशल-क्षेम की जानकारी प्राप्त करने हेतु।
अक्रूर ने हस्तिनापुर पहुँचकर पाया कि भीष्म पितामह और विदुर जैसे बुद्धिमान वरिष्ठजनों के होते हुए भी, दुर्योधन का ईर्ष्या और द्वेष निरंतर बढ़ रहा है, तथा पांडवों के प्रति उसका षड्यंत्रपूर्ण व्यवहार भी स्पष्ट होता जा रहा है — यह यात्रा और इससे प्राप्त जानकारी आगे चलकर महाभारत के उस महान युद्ध की पृष्ठभूमि से गहराई से जुड़ती है, जिसमें कृष्ण स्वयं एक केंद्रीय भूमिका निभाएँगे।
इस अध्याय की शिक्षा
भावी बड़ी घटनाओं की तैयारी में सम्बन्धों और परिस्थितियों की जानकारी रखना दूरदर्शी नेतृत्व का एक आवश्यक अंग है।
द्वारका की स्थापना
मगध के शक्तिशाली, अत्याचारी राजा जरासंध, जिनकी दो पुत्रियाँ कंस को ब्याही गई थीं, कंस-वध का प्रतिशोध लेने हेतु, बार-बार विशाल सेनाओं के साथ मथुरा पर आक्रमण करने लगे, जिससे यदुवंश की प्रजा को निरंतर युद्ध और अस्थिरता का सामना करना पड़ता रहा।
कृष्ण ने अनुभव किया कि यदुवंश की दीर्घकालिक सुरक्षा और समृद्धि हेतु, मथुरा के स्थान पर एक नई, अधिक सुरक्षित राजधानी की स्थापना आवश्यक है, विशेषतः क्योंकि मथुरा भौगोलिक रूप से जरासंध के आक्रमणों के प्रति अत्यंत संवेदनशील थी।
कृष्ण के आदेश पर, विश्वकर्मा ने समुद्र से भूमि याचना कर, अत्यंत भव्य, सुनियोजित और सुरक्षित द्वारका नगरी का निर्माण किया, जिसके चारों ओर समुद्र का प्राकृतिक सुरक्षा-घेरा था, स्वर्ण और मणियों से जड़े महलों और चौड़ी सड़कों वाली इस नगरी में यदुवंश स्थायी रूप से स्थानांतरित हुआ, जो आगे चलकर कृष्ण की लीलाओं का प्रमुख केंद्र बनी।
इस अध्याय की शिक्षा
जब वर्तमान स्थान असुरक्षित हो जाए, तो एक नई, सुरक्षित नींव पर पुनर्निर्माण करना ही दीर्घकालिक समृद्धि के लिए बुद्धिमत्तापूर्ण है।
जरासंध का सत्रहवाँ आक्रमण और कालयवन
जरासंध, अपने पूर्व प्रयासों की असफलता के बावजूद, अपनी विशाल सेना और असंख्य संधि-राजाओं के बल पर, पुनः-पुनः मथुरा पर आक्रमण करता रहा — कुल सत्रह बार उसने आक्रमण किया, और प्रत्येक बार कृष्ण और बलराम ने उसकी विशाल सेनाओं को परास्त किया, यद्यपि जरासंध स्वयं प्रत्येक बार जीवित बचकर भाग निकलने में सफल रहा।
इन्हीं संघर्षों के मध्य, एक और अत्यंत शक्तिशाली, यवन-देशीय राजा कालयवन, जिसने नारद से यह सुना था कि कृष्ण ही तीनों लोकों में सर्वश्रेष्ठ योद्धा हैं, अपनी विशाल यवन-सेना लेकर मथुरा की ओर बढ़ने लगा, यह चुनौती देते हुए कि कृष्ण उससे प्रत्यक्ष युद्ध करें।
कृष्ण, यह समझते हुए कि एक साथ जरासंध और कालयवन, दोनों की विशाल सेनाओं से युद्ध करना अनुचित और अनावश्यक जन-हानि का कारण बनेगा, ने एक चतुर, नई रणनीति अपनाने का निश्चय किया, जिसका वर्णन अगले अध्याय में किया गया है।
इस अध्याय की शिक्षा
बार-बार की असफलता भी शत्रु को हतोत्साहित नहीं करती, किंतु धैर्य और रणनीति अंततः विजय दिलाती है।
कालयवन का वध
कृष्ण, कालयवन को युद्ध के लिए ललकारने के बजाय, उसे एक पर्वत की गुफा की ओर आकर्षित करते हुए भागने का अभिनय करने लगे। कालयवन, यह समझते हुए कि कृष्ण भय से भाग रहे हैं, उनका पीछा करते हुए उसी गुफा में जा घुसा।
उस अंधकारमय गुफा में, कालयवन ने एक सोए हुए पुरुष को कृष्ण समझकर, क्रोधपूर्वक उसे लात मारकर जगाया। किंतु वह पुरुष वास्तव में राजा मुचुकुंद थे, जिन्हें देवताओं की दीर्घकालिक सेवा के पश्चात् यह असाधारण वरदान प्राप्त था कि उनकी निद्रा भंग करने वाला कोई भी प्राणी, उनकी पहली ही दृष्टि मात्र से भस्म हो जाएगा।
मुचुकुंद ने जागते ही अपनी दृष्टि कालयवन पर डाली, और वह तत्काल भस्म होकर राख का ढेर बन गया — कृष्ण, इसके पश्चात् प्रकट होकर मुचुकुंद को अपनी सच्ची पहचान बताई, उन्हें आशीर्वाद दिया, और मुचुकुंद, कलियुग की प्रकृति को समझते हुए, तपस्या के लिए वन की ओर प्रस्थान कर गए — इस चतुर योजना से कृष्ण ने बिना स्वयं युद्ध किए ही एक अजेय शत्रु का अंत कर दिया।
इस अध्याय की शिक्षा
प्रत्यक्ष युद्ध सदैव आवश्यक नहीं — कभी-कभी चतुराई और परिस्थिति का उचित उपयोग ही सबसे शक्तिशाली शत्रु को भी समाप्त कर देता है।
रुक्मिणी का पत्र
विदर्भ देश की राजकुमारी रुक्मिणी, जो कृष्ण के अद्भुत गुणों और सौंदर्य की कथाएँ बार-बार सुनकर, उन्हें ही अपने हृदय का स्वामी मान चुकी थीं, को अत्यंत दुःख हुआ जब उनके ज्येष्ठ भ्राता रुक्मी ने, कृष्ण से द्वेष रखते हुए, उनका विवाह चेदि-नरेश शिशुपाल से निश्चित कर दिया।
विवाह की तिथि निकट आते देख, रुक्मिणी ने अत्यंत साहस के साथ एक विश्वस्त ब्राह्मण के माध्यम से कृष्ण को एक गुप्त, हृदयस्पर्शी पत्र भेजा, जिसमें उन्होंने अपने अटूट प्रेम को व्यक्त करते हुए, कृष्ण से विवाह के दिन, यज्ञ-स्थल पर आकर, उन्हें शिशुपाल से बचाने और अपहरण कर उनसे विवाह करने की करुण प्रार्थना की।
कृष्ण, यह पत्र पढ़कर, बिना विलंब किए, रुक्मिणी की इस साहसिक याचना को स्वीकार करने का निश्चय किया, और उनकी सहायता हेतु द्वारका से गुप्त रूप से विदर्भ की ओर प्रस्थान किया, जिसका वर्णन अगले अध्याय में किया गया है।
इस अध्याय की शिक्षा
साहस के साथ की गई एक ईमानदार प्रार्थना, चाहे परिस्थिति कितनी भी विपरीत क्यों न हो, भगवान तक अवश्य पहुँचती है और उत्तर पाती है।
रुक्मिणी हरण और रुक्मी की पराजय
विवाह-स्थल पर पहुँचकर, कृष्ण ने अत्यंत चतुराई और साहस से, विवाह-मंडप की ओर देवी-पूजा हेतु जाती रुक्मिणी को अपने रथ पर बिठाकर, समस्त उपस्थित राजाओं के समक्ष ही, उन्हें विधिपूर्वक हर लिया, यह अपहरण उस युग की क्षत्रिय परम्परा (राक्षस-विवाह) के अनुरूप पूर्णतः वैध माना जाता था।
रुक्मी, अपनी बहन के इस हरण से अपमानित और क्रोधित होकर, अपनी सेना सहित कृष्ण का पीछा किया और युद्ध छेड़ दिया। कृष्ण ने रुक्मी की सेना को सरलता से परास्त कर दिया, और स्वयं रुक्मी को भी युद्ध में पराजित किया, उनके प्राण लेने ही वाले थे।
किंतु रुक्मिणी की करुण प्रार्थना और बलराम के अनुरोध पर, कृष्ण ने रुक्मी के प्राण बख्श दिए, यद्यपि उन्होंने उनकी दाढ़ी और बाल कुछ स्थानों से मुँड़वाकर उन्हें अपमानित किया — यह एक ऐसा अपमान था जिसे रुक्मी कभी भूल नहीं सके, और इस घटना ने रुक्मिणी और उनके भाई के बीच स्थायी कटुता स्थापित कर दी, यद्यपि रुक्मिणी अब सुखपूर्वक कृष्ण की प्रधान महारानी के रूप में द्वारका में निवास करने लगीं।
इस अध्याय की शिक्षा
सच्चे प्रेम की रक्षा के लिए साहसिक निर्णय लेना उचित है, किंतु विजय में भी करुणा और संयम बनाए रखना चाहिए।
प्रद्युम्न का जन्म
कृष्ण और रुक्मिणी को समय पर एक अत्यंत तेजस्वी, सुंदर पुत्र प्राप्त हुआ, जिसका नाम प्रद्युम्न रखा गया — परम्परा में उन्हें स्वयं कामदेव का अवतार माना जाता है, जो शिव के क्रोध से भस्म होने के पश्चात् इस रूप में पुनः जन्मे।
किंतु जन्म के ठीक दसवें दिन ही, शंबरासुर नामक एक शक्तिशाली, मायावी राक्षस, जो यह भविष्यवाणी जानता था कि यही बालक आगे चलकर उसका वध करेगा, प्रसूति-गृह से बालक का अपहरण कर उसे समुद्र में फेंक दिया, जहाँ एक विशाल मछली ने उसे निगल लिया।
यह मछली संयोगवश शंबर के ही रसोईघर में पहुँची, जहाँ मायावती नामक एक स्त्री (जो वास्तव में कामदेव की पत्नी रति का ही अवतार थीं) ने उसे चीरकर भीतर से एक जीवित, तेजस्वी शिशु पाया। नारद के माध्यम से बालक की सच्ची पहचान जानकर, मायावती ने उसका गुप्त रूप से पालन-पोषण किया, और बड़े होने पर प्रद्युम्न ने स्वयं शंबरासुर को युद्ध में पराजित कर उसका वध किया, और फिर मायावती (रति) के साथ विवाह कर द्वारका लौटकर अपने माता-पिता से पुनर्मिलन का असीम आनंद प्राप्त किया।
इस अध्याय की शिक्षा
पूर्व-निर्धारित भाग्य, चाहे कितनी भी बाधाओं से घिरा हो, अंततः अपने उचित समय पर पूर्ण होता है।
स्यमंतक मणि की कथा
इस अध्याय में विश्वप्रसिद्ध स्यमंतक मणि की कथा वर्णित है। सत्राजित नामक एक यादव को सूर्यदेव से यह अद्भुत मणि प्राप्त हुई, जो प्रतिदिन प्रचुर स्वर्ण उत्पन्न करती थी, किंतु जिसे केवल एक शुद्ध, धर्मात्मा व्यक्ति ही धारण कर सकता था, अन्यथा वह विनाश का कारण बनती।
सत्राजित के भाई प्रसेन ने, एक दिन शिकार पर जाते समय यह मणि पहन ली, जहाँ एक सिंह ने उसे मार डाला और मणि छीन ली, किंतु स्वयं जाम्बवान नामक भालू-राजा ने उस सिंह को मारकर मणि प्राप्त कर ली।
जब प्रसेन वापस नहीं लौटे, तो सत्राजित ने, बिना किसी प्रमाण के, यह आरोप लगाया कि कृष्ण ने ही मणि के लोभ में प्रसेन की हत्या की है — यह मिथ्या, अपमानजनक आरोप सुनकर कृष्ण ने अपनी निर्दोषता सिद्ध करने हेतु स्वयं इस मणि की खोज में निकलने का निश्चय किया।
इस अध्याय की शिक्षा
बिना प्रमाण के किसी पर आरोप लगाना अन्यायपूर्ण है — सत्य को उजागर करने के लिए धैर्य और सच्चा प्रयास आवश्यक है।
जाम्बवान से मणि की प्राप्ति
कृष्ण, प्रसेन के पदचिह्नों का अनुसरण करते हुए, अंततः एक गुफा तक पहुँचे, जहाँ उन्हें ज्ञात हुआ कि जाम्बवान के पास ही वह मणि है। गुफा में प्रवेश कर, कृष्ण का जाम्बवान से भीषण, दीर्घकालिक द्वंद्व-युद्ध हुआ, जो अट्ठाईस दिनों तक निरंतर चलता रहा।
अंततः, जाम्बवान, अपनी शक्ति क्षीण होते देख, यह पहचान गए कि यह कोई साधारण योद्धा नहीं, अपितु साक्षात् वही भगवान राम हैं जिनकी सेवा उन्होंने त्रेतायुग में की थी, और जिनके पुनः दर्शन की वे दीर्घकाल से प्रतीक्षा कर रहे थे।
पहचानते ही, जाम्बवान ने कृष्ण की भावविह्वल स्तुति की, उन्हें सम्मानपूर्वक मणि लौटाई, और साथ ही अपनी अत्यंत सुंदर पुत्री जाम्बवती का हाथ भी कृतज्ञतापूर्वक उन्हें अर्पित किया, जिसे कृष्ण ने सहर्ष स्वीकार किया — कृष्ण द्वारका लौटकर, सत्राजित को स्वयं मणि लौटाई और सम्पूर्ण सत्य-घटना उजागर कर अपनी निर्दोषता सिद्ध की।
इस अध्याय की शिक्षा
पुरानी सेवा और भक्ति का ऋण, चाहे कितने युग बीत गए हों, भगवान कभी नहीं भूलते और उचित समय पर उसे पूर्ण सम्मान से चुकाते हैं।
कृष्ण के अन्य विवाह
अपनी भूल और मिथ्या आरोप पर लज्जित होकर, सत्राजित ने पश्चाताप-स्वरूप अपनी अत्यंत सुंदर पुत्री सत्यभामा का विवाह भी कृष्ण से करा दिया, तथा स्यमंतक मणि भी उन्हें भेंट स्वरूप देना चाहा, यद्यपि कृष्ण ने विनम्रतापूर्वक इसे सत्राजित के पास ही रहने दिया।
इस प्रकार, जाम्बवती और सत्यभामा के साथ विवाह के पश्चात्, कृष्ण ने आगे चलकर अन्य अनेक राजकुमारियों से भी विवाह किया, प्रत्येक विवाह की अपनी विशेष, रोचक पृष्ठभूमि और परिस्थिति के साथ — इस प्रकार उनका विशाल, सुव्यवस्थित और पूर्णतः सामंजस्यपूर्ण परिवार निरंतर विस्तृत होता गया, प्रत्येक रानी अपने महल में कृष्ण की प्रत्यक्ष, प्रेमपूर्ण उपस्थिति का अनुभव करती थी, यद्यपि वे शरीर से एक ही स्थान पर थे — यह उनकी अचिन्त्य, अलौकिक शक्ति का ही एक और प्रमाण था।
इस अध्याय की शिक्षा
भूल स्वीकार कर उसका प्रायश्चित करना ही सम्मान और सम्बन्धों को पुनःस्थापित करने का सच्चा मार्ग है।
नरकासुर का वध
भौमासुर, जिसे नरकासुर के नाम से भी जाना जाता है, प्राग्ज्योतिषपुर का अत्याचारी राजा, अपनी असाधारण शक्ति के अभिमान में देवताओं तक को त्रस्त करने लगा था, और उसने विभिन्न राज्यों से सोलह हजार एक सौ राजकुमारियों का अपहरण कर उन्हें अपने अंतःपुर में बंदी बना रखा था, साथ ही देवमाता अदिति के कुंडल और स्वयं इंद्र की छत्र-राजधानी की सम्पत्ति भी छीन ली थी।
इंद्र, इस अत्याचार से त्रस्त होकर, कृष्ण की शरण में गए और सहायता की प्रार्थना की। कृष्ण, अपनी पत्नी सत्यभामा के साथ गरुड़ पर सवार होकर प्राग्ज्योतिषपुर पहुँचे, जहाँ भीषण युद्ध के पश्चात् उन्होंने नरकासुर का वध किया — कथा के एक रोचक विवरण के अनुसार, सत्यभामा ने भी इस युद्ध में सक्रिय भाग लिया।
नरकासुर के वध के पश्चात्, कृष्ण ने बंदी बनाई गई समस्त सोलह हजार राजकुमारियों को मुक्त किया, और, चूँकि समाज में उनका अपहरण होने के कारण उनकी प्रतिष्ठा और विवाह-योग्यता पर संकट उत्पन्न हो चुका था, कृष्ण ने, उन्हें सामाजिक सम्मान और सुरक्षित जीवन प्रदान करने हेतु, स्वयं ही उन सबसे विवाह किया, और उन्हें द्वारका में सम्मानपूर्वक स्थान दिया।
इस अध्याय की शिक्षा
अत्याचारी की शक्ति चाहे कितनी भी विशाल हो, भगवान द्वारा उसका अंत निश्चित है, और पीड़ितों को पूर्ण सम्मान के साथ न्याय मिलता है।
कृष्ण की रुक्मिणी से हास्य-वार्ता
इस अध्याय में कृष्ण और उनकी प्रधान महारानी रुक्मिणी के मध्य एक अत्यंत स्नेहपूर्ण, हास्यपूर्ण किंतु गहन दार्शनिक संवाद वर्णित है। कृष्ण ने, रुक्मिणी की भक्ति और प्रेम की गहराई को परखने हेतु, स्वयं को तुच्छ, निर्धन और अयोग्य बताते हुए, यह प्रश्न किया कि उन्होंने अन्य महान, शक्तिशाली राजाओं को छोड़कर उन्हीं को पति क्यों चुना।
रुक्मिणी, यह सुनकर पहले तो अत्यंत व्याकुल और भयभीत हो उठीं, यह सोचकर कि कृष्ण वास्तव में उन्हें त्यागने की बात कर रहे हैं, और मूर्च्छित होने के कगार पर पहुँच गईं, अपने प्रेम की गहन, अटूट सच्चाई को गद्गद कण्ठ से व्यक्त करने लगीं।
कृष्ण, अपनी प्रियतमा की यह गहन व्याकुलता देखकर, तुरन्त मुस्कुराए और उन्हें स्नेहपूर्वक गले लगाकर सांत्वना दी, यह स्पष्ट करते हुए कि यह सम्पूर्ण वार्तालाप केवल उनके प्रेम की गहराई और अटूट निष्ठा को और अधिक स्पष्ट रूप से प्रकट करने के लिए की गई एक प्रेमपूर्ण, हास्यमय लीला मात्र थी, इससे अधिक कुछ नहीं।
भाग ४ समाप्त (अध्याय ४६-६०) — भाग ५ में अध्याय ६१-७५ जारी रहेगा
इस अध्याय की शिक्षा
गहन प्रेम कभी-कभी परीक्षा के माध्यम से भी प्रकट होता है, किंतु इसका अंतिम उद्देश्य सदैव प्रेम की गहराई को और स्पष्ट करना ही होता है, पीड़ा पहुँचाना नहीं।
कृष्ण के पुत्रों का वर्णन
शुकदेव ने राजा परीक्षित को कृष्ण की सोलह हजार एक सौ आठ रानियों से उत्पन्न असंख्य पुत्रों का संक्षिप्त, गौरवपूर्ण वर्णन किया, जिनमें रुक्मिणी के पुत्र प्रद्युम्न सर्वप्रमुख, सबसे तेजस्वी और अपने पिता के गुणों के सर्वाधिक निकट माने जाते थे।
उन्होंने बताया कि प्रत्येक रानी के पुत्र अपने-अपने विशिष्ट गुणों, वीरता और सौंदर्य से सम्पन्न थे, यह दर्शाते हुए कि कृष्ण का यह विशाल, असंख्य सदस्यों वाला पारिवारिक जीवन कितना समृद्ध, सुव्यवस्थित और सामंजस्यपूर्ण था, प्रत्येक सदस्य को समान स्नेह और ध्यान प्राप्त होता था।
इन असंख्य पुत्रों में से भी, प्रद्युम्न का पुत्र अनिरुद्ध विशेष रूप से उल्लेखनीय था, जिनकी अपनी एक अत्यंत रोचक, प्रेम-कथा आगामी अध्यायों में विस्तार से वर्णित है।
इस अध्याय की शिक्षा
एक समृद्ध, विशाल परिवार भी, यदि वह धर्म और स्नेह के आधार पर संगठित हो, सामंजस्य और सम्मान का उदाहरण बन सकता है।
अनिरुद्ध-ऊषा प्रसंग
बाणासुर, हिरण्यकश्यप के वंशज तथा भगवान शिव के परम भक्त, एक अत्यंत शक्तिशाली किंतु अभिमानी असुर-राजा थे, जिनकी परम सुंदरी पुत्री ऊषा ने एक रात्रि स्वप्न में एक अत्यंत सुंदर युवक को देखा और उसी क्षण उससे गहन प्रेम करने लगीं, जागने पर उस युवक को न पाकर अत्यंत व्याकुल हो उठीं।
ऊषा की सखी चित्रलेखा, जो चित्रकला में अत्यंत निपुण थीं, ने अनेक देवताओं, गंधर्वों और राजकुमारों के चित्र बनाकर ऊषा को दिखाए, जब तक कि ऊषा ने प्रद्युम्न के पुत्र अनिरुद्ध के चित्र को पहचान कर यह पुष्टि की कि यही वह युवक है जिसे उन्होंने स्वप्न में देखा था।
चित्रलेखा, अपनी योगशक्ति से, उसी रात्रि द्वारका से अनिरुद्ध को गुप्त रूप से उठाकर बाणासुर की नगरी शोणितपुर के अंतःपुर में ऊषा के महल में ले आईं, जहाँ दोनों का गुप्त, गांधर्व-विवाह सम्पन्न हुआ, और अनिरुद्ध कुछ काल तक वहीं गुप्त रूप से निवास करने लगे।
इस अध्याय की शिक्षा
सच्चा प्रेम, चाहे स्वप्न में ही आरम्भ क्यों न हुआ हो, साहस और सच्ची सहायता मिलने पर वास्तविकता में परिणत हो सकता है।
बाणासुर से युद्ध
जब बाणासुर को अपनी पुत्री और अनिरुद्ध के इस गुप्त सम्बन्ध का पता चला, वे अत्यंत क्रोधित हुए और अनिरुद्ध को बंदी बनाकर नागपाश में बाँध दिया। यह समाचार द्वारका पहुँचने पर, कृष्ण, बलराम और प्रद्युम्न, विशाल यादव-सेना लेकर शोणितपुर की ओर प्रस्थान किया।
बाणासुर, चूँकि भगवान शिव का परम भक्त था और उसने शिव से यह वरदान प्राप्त किया था कि वे स्वयं उसकी नगरी की रक्षा करेंगे, अतः इस युद्ध में स्वयं भगवान शिव और उनके पुत्र कार्तिकेय भी बाणासुर के पक्ष में युद्धरत हुए, जिससे यह संघर्ष अत्यंत भीषण और ब्रह्मांडीय स्तर का बन गया।
दीर्घकालिक, भीषण युद्ध के पश्चात्, कृष्ण ने शिव को अपने योगनिद्रा-अस्त्र से शांत किया, और अंततः बाणासुर की सहस्र भुजाओं को अपने सुदर्शन चक्र से एक-एक कर काट डाला, यद्यपि स्वयं शिव के विनम्र अनुरोध पर, अपने परम भक्त की रक्षा हेतु, कृष्ण ने बाणासुर के प्राण बख्श दिए, केवल उनका अभिमान दंडित करते हुए — अनिरुद्ध और ऊषा को सम्मानपूर्वक द्वारका लाया गया।
इस अध्याय की शिक्षा
किसी परम भक्त की रक्षा में अन्य देवता भी उलझ सकते हैं, फिर भी भगवान अपने भक्त और उसके शत्रु दोनों के प्रति करुणा का संतुलन बनाए रखते हैं।
राजा नृग की कथा
इस अध्याय में राजा नृग की एक अत्यंत शिक्षाप्रद कथा वर्णित है, जो एक अत्यंत धर्मपरायण, दानवीर राजा थे, किंतु एक बार अनजाने में उन्होंने एक ब्राह्मण को दान की गई गाय को, बिना जाने, पुनः किसी अन्य ब्राह्मण को दान कर दिया।
इस अनजाने, किंतु गंभीर धार्मिक भूल के कारण, नृग को मृत्यु के पश्चात् दीर्घकाल तक एक छिपकली (गिरगिट) की योनि में एक गहरे कुएँ में गिरे रहने का दंड भोगना पड़ा, यद्यपि उनके अन्य समस्त पुण्य-कर्म अक्षुण्ण रहे।
जब कृष्ण, एक बार द्वारका के निकट उस कुएँ के पास पहुँचे, और अपने ग्वाल-बालों के आग्रह पर उस छिपकली को कुएँ से बाहर निकाला, तो कृष्ण के स्पर्श मात्र से नृग तत्काल अपने मूल, तेजस्वी दिव्य रूप में वापस आ गए, और कृष्ण की भावभीनी स्तुति कर, अपने पूर्व पापों से मुक्त होकर स्वर्ग को प्रस्थान किया — यह कथा इस गहन शिक्षा को दर्शाती है कि ब्राह्मण या साधु को दिया गया दान अत्यंत सावधानी से देना चाहिए।
इस अध्याय की शिक्षा
ब्राह्मण या साधु को दिया गया दान अत्यंत सावधानी और स्पष्टता से देना चाहिए, अन्यथा अनजाने में भी गंभीर परिणाम भोगने पड़ सकते हैं।
बलराम द्वारा द्विविद वानर का वध
द्विविद नामक एक अत्यंत शक्तिशाली, उन्मत्त वानर, जो नरकासुर का मित्र था, अपने मित्र की मृत्यु का प्रतिशोध लेने की इच्छा से, वृंदावन और आस-पास के क्षेत्रों में भीषण उत्पात मचाने लगा — खेतों को नष्ट करना, स्त्रियों को भयभीत करना, और साधुओं की तपस्या में विघ्न डालना उसकी दिनचर्या बन गई।
बलराम, जो उस समय रैवतक पर्वत पर गोपियों के साथ आनंदपूर्वक विहार कर रहे थे, ने इस उत्पाती वानर को चुनौती दी। द्विविद ने बलराम का उपहास करते हुए उन पर फल और पत्थर फेंके, जिससे क्रोधित बलराम ने उसे अपने मूसल से एक ही प्रहार में मार डाला, इस प्रकार क्षेत्र को उसके निरंतर उत्पात से मुक्त करते हुए।
इस अध्याय की शिक्षा
जो भी समुदाय और प्रकृति को निरंतर उत्पात से पीड़ित करता है, चाहे वह कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, अंततः रोका जाता है।
पौंड्रक का वध
पौंड्रक, करुष देश का एक अत्यंत मूर्ख, अभिमानी राजा, अपने मूर्ख चाटुकारों के बहकावे में आकर, स्वयं को ही वास्तविक वासुदेव (कृष्ण) घोषित करने लगा, और शंख, चक्र, गदा तथा मुकुट जैसे कृष्ण के दिव्य प्रतीक चिह्नों की नकल करते हुए, कृष्ण को एक दूत के माध्यम से खुली चुनौती भेजी कि वे अपने प्रतीक चिह्न त्याग दें, अन्यथा युद्ध के लिए तैयार रहें।
कृष्ण, इस मूर्खतापूर्ण दुस्साहस पर मुस्कुराते हुए, अपनी विशाल सेना सहित काशी की ओर, जहाँ पौंड्रक अपने मित्र काशी-नरेश के साथ शरण लिए हुए था, प्रस्थान किया।
युद्धभूमि में, कृष्ण ने पौंड्रक की नकली उपाधियों और प्रतीकों का उपहास करते हुए, अपने वास्तविक सुदर्शन चक्र से उसका वध कर दिया, तथा काशी-नरेश का भी, जिसने पौंड्रक का साथ दिया था, उसी अवसर पर संहार किया — इस कथा से यह शिक्षा मिलती है कि भगवान के पद और चिह्नों की मिथ्या नकल करना अंततः विनाशकारी सिद्ध होता है।
इस अध्याय की शिक्षा
भगवान के पद और प्रतीकों की मिथ्या नकल करना अंततः विनाशकारी सिद्ध होता है — सच्ची पहचान कभी छद्म रूप से प्राप्त नहीं की जा सकती।
साम्ब की कथा और द्वारका-हस्तिनापुर तनाव
कृष्ण के पुत्र साम्ब, जो अत्यंत सुंदर और साहसी थे, ने हस्तिनापुर की एक बार यात्रा के दौरान, दुर्योधन की पुत्री लक्ष्मणा से गुप्त रूप से विवाह करने की इच्छा से, उनका हरण करने का साहसिक प्रयास किया।
कौरवों ने, इस दुस्साहस से क्रोधित होकर, साम्ब को बंदी बना लिया, जिससे द्वारका और हस्तिनापुर के मध्य, जो पूर्व में मित्रवत् सम्बन्ध रखते थे, गंभीर तनाव और कटुता उत्पन्न हो गई, यह घटना आगे चलकर दोनों राज्यों के बीच होने वाले भावी संघर्षों की एक झलक भी प्रस्तुत करती है।
इस अध्याय की शिक्षा
उतावला, अनुचित निर्णय पारिवारिक और राजनीतिक सम्बन्धों में गहरा तनाव उत्पन्न कर सकता है, जिसके परिणाम दूरगामी होते हैं।
बलराम का हस्तिनापुर जाना
साम्ब के बंदी बनाए जाने का समाचार पाकर, बलराम ने पहले शांतिपूर्ण, कूटनीतिक ढंग से हस्तिनापुर जाकर साम्ब की मुक्ति और विधिवत् विवाह की माँग रखी, किंतु दुर्योधन सहित अन्य कौरवों ने बलराम का उपहास किया और उनकी माँग को अस्वीकार कर दिया।
इस अनादर से अत्यंत क्रोधित होकर, बलराम ने अपना हल (जो उनका प्रमुख अस्त्र था) हस्तिनापुर की भूमि में गाड़ दिया, और घोषणा की कि यदि साम्ब को तुरन्त मुक्त नहीं किया गया, तो वे सम्पूर्ण नगरी को ही हल से खींचकर पवित्र यमुना नदी में डुबो देंगे।
जैसे ही बलराम ने अपना हल चलाना आरम्भ किया, सम्पूर्ण हस्तिनापुर नगरी डगमगाने और यमुना की ओर खिंचने लगी, जिससे भयभीत कौरवों ने तुरन्त अपनी भूल स्वीकार की, साम्ब और लक्ष्मणा का विधिवत् विवाह सम्पन्न कराया, और उन्हें सम्मानपूर्वक द्वारका विदा किया, इस प्रकार यह संकट शांतिपूर्वक टल गया।
इस अध्याय की शिक्षा
जब शांतिपूर्ण संवाद विफल हो जाए, तो दृढ़ता और उचित शक्ति-प्रदर्शन भी न्याय स्थापित करने का एक वैध साधन बन सकता है।
नारद द्वारा कृष्ण के दैनिक जीवन का वर्णन
देवर्षि नारद मुनि, कृष्ण के इस असाधारण, विशाल गृहस्थ जीवन की वास्तविकता को प्रत्यक्ष देखने की जिज्ञासा से प्रेरित होकर, द्वारका पधारे और एक-एक कर कृष्ण की सोलह हजार से अधिक रानियों के प्रत्येक महल में गए।
प्रत्येक महल में, नारद ने पूर्ण विस्मय के साथ यह पाया कि कृष्ण, एक ही समय में, प्रत्येक रानी के साथ व्यक्तिगत रूप से उपस्थित थे — कहीं वे अपने बच्चों के साथ खेल रहे थे, कहीं रानी की सेवा स्वीकार कर रहे थे, कहीं राजकीय कार्यों में व्यस्त थे — प्रत्येक स्थान पर पूर्णतः, अखंड ध्यान के साथ उपस्थित।
यह देखकर नारद पूर्णतः चकित रह गए, और उन्होंने गहराई से अनुभव किया कि कृष्ण की यह अचिन्त्य, अद्वितीय शक्ति सामान्य मानवीय, यहाँ तक कि दिव्य सीमाओं से भी पूर्णतः परे है — यह उनकी असीम, अपार योगशक्ति का ही एक और प्रत्यक्ष, चमत्कारिक प्रमाण था।
इस अध्याय की शिक्षा
भगवान की अचिन्त्य शक्ति सामान्य मानवीय, यहाँ तक कि दिव्य सीमाओं से भी परे है — वे एक साथ अनेक स्थानों पर पूर्ण रूप से उपस्थित रह सकते हैं।
कृष्ण का दैनिक जीवन
इस अध्याय में शुकदेव ने कृष्ण के द्वारका में दैनिक जीवन का अत्यंत विस्तृत, सुंदर वर्णन किया — ब्रह्म-मुहूर्त में जागना, स्नान और संध्या-वंदन, तत्पश्चात् राजसभा में उपस्थित होकर प्रजा की समस्याओं का समाधान करना, तथा दिनभर के विभिन्न राजकीय और पारिवारिक कर्तव्यों का पालन करना।
उन्होंने विशेष रूप से यह बल दिया कि कृष्ण, अपने असीम ऐश्वर्य और अनंत शक्ति के होते हुए भी, एक आदर्श राजा और गृहस्थ के रूप में, समस्त वैदिक कर्तव्यों और सामाजिक मर्यादाओं का पूर्ण, सटीक पालन करते थे, यह प्रदर्शित करते हुए कि भगवान स्वयं भी धर्म की मर्यादा का सम्मान करते हैं, चाहे उन्हें इसकी कोई वास्तविक आवश्यकता न हो, केवल सामान्य जनों के समक्ष एक आदर्श स्थापित करने हेतु।
इस अध्याय की शिक्षा
असीम ऐश्वर्य और शक्ति के होते हुए भी, एक आदर्श व्यक्ति समस्त वैदिक कर्तव्यों और सामाजिक मर्यादाओं का पूर्ण पालन करता है।
युधिष्ठिर का राजसूय यज्ञ
युधिष्ठिर, पांडवों में ज्येष्ठ, ने अपने चक्रवर्ती सम्राट होने की घोषणा हेतु एक भव्य राजसूय यज्ञ के आयोजन का निश्चय किया, जिसमें कृष्ण को विशेष रूप से आमंत्रित किया गया, और उनके परामर्श पर ही जरासंध जैसे बाधक शत्रुओं का पूर्व-निवारण किया गया था।
इस भव्य यज्ञ में, जब यह प्रश्न उठा कि सर्वप्रथम, सर्वोच्च पूजा (अग्रपूजा) किसे अर्पित की जाए, भीष्म पितामह के सुझाव पर, सभा ने सर्वसम्मति से कृष्ण को ही यह सर्वोच्च सम्मान प्रदान करने का निर्णय लिया, यह मानते हुए कि वे ही समस्त उपस्थित राजाओं और ऋषियों में सर्वश्रेष्ठ हैं।
यह निर्णय सुनते ही, चेदि-नरेश शिशुपाल, जो कृष्ण से पूर्व से ही गहरा द्वेष रखते थे, क्रोध से आगबबूला हो उठे और सम्पूर्ण सभा के समक्ष कृष्ण की घोर निंदा और अपमान करना आरम्भ कर दिया, उन्हें एक साधारण ग्वाला और इस सर्वोच्च सम्मान के सर्वथा अयोग्य बताते हुए।
इस अध्याय की शिक्षा
सच्ची श्रेष्ठता का सम्मान बाह्य पद या जन्म से नहीं, अपितु गुण और चरित्र से निर्धारित होना चाहिए — भले ही इसका विरोध हो।
शिशुपाल वध
कृष्ण, जिन्होंने अपनी बुआ (शिशुपाल की माता) को यह वचन दिया था कि वे उनके पुत्र के एक सौ अपराध क्षमा करेंगे, अत्यंत धैर्यपूर्वक, बिना किसी क्रोध के, शिशुपाल की एक-एक कर सभी निंदाओं को सहन करते रहे, सभा में उपस्थित सभी लोग यह गिनती करते रहे कि कितने अपराध हो चुके हैं।
जैसे ही शिशुपाल ने अपना एक सौ एकवाँ अपमानजनक अपराध किया, कृष्ण ने, अपना वचन पूर्ण करते हुए, बिना किसी और विलंब के, अपना दिव्य सुदर्शन चक्र आह्वान किया, जिसने क्षण भर में शिशुपाल का शिरच्छेद कर दिया, समस्त सभा को स्तब्ध करते हुए।
उपस्थित सभी लोगों ने विस्मय से देखा कि शिशुपाल के प्राण-तेज ने, मृत्यु के तत्काल पश्चात्, एक तेजस्वी प्रकाश-पुंज के रूप में कृष्ण के शरीर में प्रवेश किया और उसी में विलीन हो गया — शुकदेव ने समझाया कि यह इस बात का प्रमाण है कि शत्रुता में भी, यदि मन निरंतर भगवान पर ही केंद्रित रहे, तो भगवान के हाथों मृत्यु भी अंततः परम मुक्ति ही प्रदान करती है।
इस अध्याय की शिक्षा
क्षमा की भी एक सीमा होती है — जब अपमान बार-बार, बिना पश्चाताप के दोहराया जाए, तो न्याय का प्रवर्तन आवश्यक हो जाता है।
जरासंध का वध
राजसूय यज्ञ की तैयारी के दौरान ही, जरासंध, जो अब भी पांडवों और यादवों दोनों का एक बड़ा शत्रु बना हुआ था, को पराजित करने की आवश्यकता महसूस हुई, क्योंकि अनेक राजा उनके भय से युधिष्ठिर की अधीनता स्वीकार करने में हिचकिचा रहे थे।
कृष्ण के मार्गदर्शन में, भीम और अर्जुन, ब्राह्मण-वेश धारण कर, जरासंध के दरबार में पहुँचे, और भीम ने जरासंध को द्वंद्व-युद्ध की चुनौती दी। दोनों महाबली योद्धाओं के बीच अत्यंत भीषण, दीर्घकालिक मल्ल-युद्ध हुआ, जो अनेक दिनों तक निरंतर चलता रहा।
अंततः, जब भीम यह नहीं समझ पा रहे थे कि जरासंध को पूर्णतः कैसे नष्ट किया जाए (क्योंकि उनका शरीर दो भागों से जोड़कर बना था, और विभाजित करने पर वे पुनः जुड़ जाते थे), कृष्ण ने संकेत से एक तिनके को बीच से चीरकर विपरीत दिशाओं में फेंकने का इशारा किया — भीम ने यही किया, जरासंध के शरीर को चीरकर विपरीत दिशाओं में फेंका, जिससे वह अब पुनः जुड़ न सका और अंततः मृत्यु को प्राप्त हुआ, इस प्रकार यदुवंश और पांडवों दोनों का यह दीर्घकालिक, भयंकर शत्रु सदा के लिए समाप्त हो गया।
इस अध्याय की शिक्षा
जिस शत्रु को सामान्य विधि से पराजित न किया जा सके, उसके लिए बुद्धिमत्तापूर्ण, असाधारण उपाय खोजना आवश्यक है।
राजसूय यज्ञ की पूर्णता
जरासंध के वध और अन्य समस्त बाधाओं के दूर होने के पश्चात्, युधिष्ठिर का भव्य राजसूय यज्ञ, कृष्ण की प्रत्यक्ष उपस्थिति, मार्गदर्शन और आशीर्वाद के साथ, अत्यंत सफलतापूर्वक, बिना किसी और विघ्न के सम्पन्न हुआ।
इस यज्ञ में सम्पूर्ण आर्यावर्त के असंख्य राजाओं ने उपस्थित होकर युधिष्ठिर को श्रद्धांजलि और उपहार अर्पित किए, जिससे युधिष्ठिर औपचारिक रूप से चक्रवर्ती सम्राट घोषित हुए, और पांडवों की महिमा, प्रतिष्ठा तथा शक्ति सम्पूर्ण भारतवर्ष में सर्वोच्च स्तर पर स्थापित हुई, जो आगे चलकर, दुर्योधन की ईर्ष्या को और भी अधिक भड़काने का एक कारण बनी।
इस अध्याय की शिक्षा
बड़े उद्देश्य की सिद्धि के लिए पहले सभी बाधाओं को व्यवस्थित रूप से दूर करना आवश्यक है — तभी सच्ची, स्थायी सफलता मिलती है।
शाल्व का द्वारका पर आक्रमण
शिशुपाल के घनिष्ठ मित्र, सौभ-नगरी के राजा शाल्व, अपने मित्र की मृत्यु का प्रतिशोध लेने हेतु दृढ़ संकल्पित होकर, शिव से प्राप्त एक अत्यंत शक्तिशाली, आकाश में स्वच्छंद विचरण करने वाले मायावी विमान "सौभ" के साथ, कृष्ण की अनुपस्थिति (जो राजसूय यज्ञ में हस्तिनापुर गए हुए थे) का लाभ उठाते हुए, द्वारका पर अचानक, भीषण आक्रमण कर दिया।
शाल्व के इस मायावी विमान से द्वारका पर भीषण बमबारी हुई, नगरी के भवन, उद्यान और सार्वजनिक स्थल भारी क्षति ग्रस्त हुए, और यादव-सेना को भी भारी हानि उठानी पड़ी, यद्यपि प्रद्युम्न सहित अन्य यादव वीरों ने वीरतापूर्वक नगरी की रक्षा का प्रयास किया।
भाग ५ समाप्त (अध्याय ६१-७५) — भाग ६ में अध्याय ७६-९० जारी रहेगा (अंतिम भाग)
इस अध्याय की शिक्षा
जब हमारी सुरक्षा अस्थायी रूप से अनुपस्थित हो, शत्रु उस अवसर का लाभ उठा सकते हैं — फिर भी अंतिम विजय धर्म की ही होती है।
शाल्व वध
शाल्व के आक्रमण का समाचार पाकर, कृष्ण तत्काल राजसूय यज्ञ से द्वारका लौटे, और अपनी क्षतिग्रस्त, संकटग्रस्त नगरी को देखकर, बिना विलंब किए शाल्व से भीषण युद्ध आरम्भ किया।
शाल्व, अपने मायावी विमान सौभ से आकाश में इधर-उधर, अदृश्य होकर, कृष्ण पर निरंतर अस्त्रों की वर्षा करता रहा, एक क्षण के लिए तो उसने अपनी माया से कृष्ण को यह भी दिखाया कि उनके पिता वसुदेव को बंदी बनाकर उनके समक्ष ही मार डाला गया है, जिससे कृष्ण क्षण भर के लिए शोक-विह्वल हुए, इससे पूर्व कि वे इसे शाल्व की मायावी चाल के रूप में पहचान सकें।
कृष्ण, अपनी दिव्य दृष्टि और अद्वितीय कौशल से, अंततः शाल्व के विमान के गुप्त तंत्र को पहचान गए, और अपने गदा-प्रहार से उस विमान को चूर्ण-विचूर्ण कर दिया, तत्पश्चात् अपने सुदर्शन चक्र से शाल्व का शिरच्छेद कर, द्वारका को इस भीषण संकट से सदा के लिए मुक्त किया।
इस अध्याय की शिक्षा
जो शक्ति छल और माया पर आधारित हो, वह अंततः सत्य और प्रत्यक्ष पराक्रम के समक्ष टिक नहीं सकती।
दंतवक्र का वध
शिशुपाल के एक अन्य घनिष्ठ मित्र, काशी-नरेश के पुत्र दंतवक्र, अपने दोनों मित्रों की मृत्यु से क्रोधित होकर, अकेले ही, केवल एक गदा लेकर, कृष्ण को द्वंद्व-युद्ध की चुनौती देने आए।
दंतवक्र, वास्तव में जय-विजय नामक वैकुण्ठ के उन्हीं द्वारपालों का तीसरा और अंतिम जन्म थे, जिन्हें सनकादि ऋषियों के शाप के कारण तीन जन्मों तक भगवान के शत्रु के रूप में जन्म लेना पड़ा था — प्रथम जन्म में हिरण्यकश्यप-हिरण्याक्ष, द्वितीय जन्म में रावण-कुम्भकर्ण, और अब इस तृतीय, अंतिम जन्म में शिशुपाल-दंतवक्र के रूप में।
कृष्ण ने दंतवक्र की चुनौती स्वीकार की, और दोनों के बीच गदा-युद्ध हुआ, जिसमें कृष्ण ने अपनी गदा कौमोदकी के एक ही निर्णायक प्रहार से दंतवक्र को मुक्ति प्रदान की — उनके प्राण-तेज ने भी, शिशुपाल की भाँति ही, कृष्ण के शरीर में विलीन होकर मुक्ति प्राप्त की, इस प्रकार जय-विजय के इन तीन शत्रुतापूर्ण, शाप-बद्ध जन्मों का चक्र सदा के लिए पूर्ण और समाप्त हुआ।
इस अध्याय की शिक्षा
पुराना वैर, चाहे कितने भी जन्मों तक चले, अंततः भगवान के हाथों समाप्त होकर मुक्ति में ही परिणत होता है।
बलराम की तीर्थयात्रा
जब कुरुक्षेत्र में कौरवों और पांडवों के मध्य वह महाभारत का विनाशकारी युद्ध आरम्भ होने को था, बलराम, जो दोनों ही पक्षों — विशेषकर दुर्योधन (जिन्होंने उनसे गदा-युद्ध सीखा था) तथा भीम (जो उनके प्रिय शिष्य भी थे) — से समान, गहरा स्नेह रखते थे, इस असहनीय पारिवारिक द्वंद्व में किसी एक पक्ष का साथ देने में असमर्थ अनुभव करने लगे।
इस दुविधा से बचने के लिए, बलराम ने युद्ध में भाग लेने से पूर्णतः विरत रहने का निश्चय किया, और इसके स्थान पर, सम्पूर्ण भारतवर्ष के पवित्र तीर्थ-स्थलों की एक विस्तृत, दीर्घकालिक यात्रा पर निकल पड़े, विभिन्न पवित्र नदियों में स्नान, ऋषियों से भेंट और दान-पुण्य करते हुए, युद्ध की सम्पूर्ण अवधि इसी तीर्थाटन में व्यतीत की।
इस अध्याय की शिक्षा
जब पारिवारिक या मैत्री सम्बन्ध विरोधी पक्षों में बँट जाएँ, तो तटस्थता और आत्म-संयम भी एक बुद्धिमत्तापूर्ण, सम्मानजनक विकल्प हो सकता है।
बलराम द्वारा रुक्मी का वध
अपनी इस दीर्घ तीर्थयात्रा के दौरान, एक स्थान पर बलराम की भेंट कुछ ऐसे व्यक्तियों से हुई जो द्यूत-क्रीड़ा (जुआ) में संलग्न थे। बलराम भी इसमें सम्मिलित हुए, और रुक्मी (रुक्मिणी के भाई, जो कृष्ण से पूर्व में भी वैर रखते थे) के साथ पासों का खेल खेलने लगे।
खेल के दौरान, रुक्मी ने बलराम पर छल करने का आरोप लगाया और उनका सार्वजनिक रूप से घोर उपहास तथा अपमान किया, उन्हें अशिक्षित ग्वाला कहकर तिरस्कृत किया।
बलराम, इस असहनीय अपमान से क्रोधित होकर, अपने मूसल से एक ही प्रहार में रुक्मी का वध कर दिया — यद्यपि यह घटना रुक्मिणी के लिए अत्यंत दुःखदायी सिद्ध हुई, अपने ही भाई की इस मृत्यु पर, तथापि बलराम ने अपने सम्मान की रक्षा को सर्वोपरि माना।
इस अध्याय की शिक्षा
अपमान सहन करने की भी एक सीमा होती है, किंतु क्रोध में लिया गया निर्णय अक्सर स्थायी, अनपेक्षित दुःख का कारण बनता है।
सुदामा की कथा का आरम्भ
भागवत पुराण की सर्वाधिक हृदयस्पर्शी, सर्वप्रिय कथाओं में से एक अब आरम्भ होती है: सुदामा की कथा। सुदामा, कृष्ण के बाल्यकाल के परम मित्र, सांदीपनि मुनि के आश्रम में साथ पढ़े हुए सहपाठी थे, किंतु जीवन में वे अत्यंत निर्धनता में जी रहे थे, अपनी पत्नी और बच्चों को पेट भर भोजन तक नहीं दे पाते थे।
सुदामा की पत्नी, अपने बच्चों की भूख से व्यथित होकर, बार-बार सुदामा से आग्रह करती रहीं कि वे अपने बाल्यकाल के मित्र, अब द्वारकाधीश कृष्ण के पास जाकर सहायता माँगें, क्योंकि निश्चय ही एक पुराना मित्र उनकी सहायता करेगा।
सुदामा, अत्यंत संकोची स्वभाव के होने के कारण, याचना के विचार मात्र से लज्जित होते रहे, किंतु अंततः पत्नी के बार-बार आग्रह पर, पड़ोसियों से माँगे गए मुट्ठी भर चिउड़े को एक फटे कपड़े में बाँधकर, केवल इसी भेंट के साथ, द्वारका की ओर पैदल प्रस्थान किया, यह भी नहीं जानते हुए कि वे कृष्ण से कुछ माँगने का साहस भी जुटा पाएँगे या नहीं।
इस अध्याय की शिक्षा
सच्ची मित्रता धन या सामाजिक स्थिति नहीं देखती — बाल्यकाल का प्रेम, चाहे वर्षों बाद भी, उतना ही सच्चा और जीवंत रह सकता है।
कृष्ण-सुदामा मिलन
द्वारका पहुँचकर, जब सुदामा ने अपना परिचय द्वारपालों को दिया, कृष्ण, यह सुनते ही कि उनका बाल्य-मित्र सुदामा द्वार पर खड़ा है, नंगे पैर ही दौड़ते हुए बाहर आए, और अपने इस दरिद्र, फटे वस्त्रों वाले मित्र को अत्यंत आत्मीयता से गले लगाया, स्वयं की आँखों से हर्षाश्रु बहाते हुए।
कृष्ण, सम्पूर्ण राजसी शिष्टाचार को त्यागकर, सुदामा को अपने ही सिंहासन पर बिठाया, स्वयं अपने हाथों से उनके थके, धूल-भरे पैर धोए, और उस जल को अपने मस्तक पर लगाया, अपनी रानियों तथा दरबारियों को यह देखकर पूर्णतः चकित करते हुए, जिन्होंने पहले कभी कृष्ण को इतनी विनम्रता से किसी का स्वागत करते नहीं देखा था।
कृष्ण ने सुदामा को पंखा झला, सुगंधित जल से स्नान कराया, और बाल्यकाल की मधुर स्मृतियों — गुरु के आश्रम में साथ बिताए दिन, वहाँ की छोटी-छोटी शरारतें — को अत्यंत स्नेह से स्मरण किया, इस पूरे समय सुदामा, अपनी दरिद्रता की तुलना कृष्ण के इस असीम वैभव से करते हुए, संकोच में डूबे रहे।
इस अध्याय की शिक्षा
सच्ची मित्रता में कोई ऊँच-नीच नहीं होता — भगवान स्वयं अपने विनम्र भक्त-मित्र का सम्मान अपने ही सिंहासन पर बिठाकर करते हैं।
सुदामा के चिउड़े का भोग
कृष्ण, यह जानते हुए भी कि सुदामा उनके लिए क्या भेंट लाए हैं, ने स्वयं ही उनसे स्नेहपूर्वक पूछा कि क्या वे अपनी पत्नी द्वारा भेजा गया कोई उपहार लाए हैं। लज्जित सुदामा, अपने मुट्ठी भर तुच्छ चिउड़े को छिपाने का प्रयास करने लगे, यह सोचते हुए कि इतनी साधारण वस्तु द्वारकाधीश को भेंट करना उचित नहीं।
किंतु कृष्ण ने स्वयं ही उनके कपड़े की गठरी को छीन लिया, और उसमें से चिउड़े की एक-एक मुट्ठी अत्यंत प्रेम और आनंद से खाने लगे, यह घोषित करते हुए कि सच्चे प्रेम से दी गई यह छोटी सी भेंट, किसी भी राजसी, बहुमूल्य उपहार से कहीं अधिक मूल्यवान और मधुर है।
सुदामा, कृष्ण की इस असीम मित्रता, स्नेह और आदर के आनंद में इतने डूब गए कि वे अपनी दरिद्रता या अपनी वास्तविक याचना के विषय में एक शब्द भी कहना भूल गए, और कुछ दिन द्वारका में अत्यंत सुखपूर्वक व्यतीत करने के पश्चात्, बिना कुछ भी माँगे, केवल अपने मित्र से मिलने के आनंद से परिपूर्ण होकर, अपने घर की ओर वापस लौट पड़े।
इस अध्याय की शिक्षा
प्रेम से दी गई सबसे छोटी भेंट भी, यदि सच्चे हृदय से अर्पित हो, किसी भी राजसी उपहार से अधिक मूल्यवान होती है।
सुदामा की समृद्धि
मार्ग में, सुदामा स्वयं यह सोचकर संतुष्ट थे कि कृष्ण से मिलने का यह अवसर ही अपने आप में उनके जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि है, और वे इसी विचार में मग्न, अपनी उसी टूटी-फूटी झोंपड़ी की ओर बढ़ते रहे।
किंतु जैसे ही वे अपने गाँव के निकट पहुँचे, उन्होंने विस्मय से देखा कि जहाँ उनकी जीर्ण-शीर्ण झोंपड़ी हुआ करती थी, वहाँ अब स्वर्ण-जटित स्तंभों, मणि-जड़ित द्वारों और विशाल उद्यानों से सुसज्जित एक भव्य महल खड़ा था, और उनकी पत्नी, दिव्य वस्त्र और आभूषण पहने, द्वार पर उनकी प्रतीक्षा में खड़ी थीं।
सुदामा, यह देखकर समझ गए कि यह उनके मित्र कृष्ण की ही मौन, अपार, बिना माँगे दी गई कृपा है — एक ऐसी कृपा जो उन्होंने कभी माँगी ही नहीं थी, अपितु जो शुद्ध, निश्छल मित्रता और भक्ति के प्रत्युत्तर में स्वतः ही प्रवाहित हुई। यह कथा भागवत पुराण में इस गहन शिक्षा का सर्वोत्तम उदाहरण मानी जाती है कि भगवान की मित्रता का सच्चा फल भौतिक याचना से नहीं, अपितु निश्छल प्रेम से ही प्राप्त होता है।
इस अध्याय की शिक्षा
भगवान की मित्रता का सच्चा फल याचना से नहीं, अपितु निश्छल, निःस्वार्थ प्रेम से ही प्राप्त होता है।
द्रौपदी और कृष्ण की रानियों की भेंट
इस अध्याय में द्रौपदी और कृष्ण की रानियों — रुक्मिणी, सत्यभामा, जाम्बवती और अन्य — के बीच हुई एक अत्यंत स्नेहपूर्ण, आत्मीय भेंट का वर्णन है, जब द्रौपदी द्वारका की यात्रा पर आईं।
इस भेंट में, कृष्ण की रानियों ने द्रौपदी से जिज्ञासावश पूछा कि उन्होंने कृष्ण को अपना पति किस प्रकार प्राप्त किया, और द्रौपदी ने भी उनसे यही प्रश्न किया — दोनों पक्षों ने अपने-अपने विवाह की रोचक कथाएँ तथा कृष्ण के प्रति अपने गहन, अटूट प्रेम और भक्ति के अनुभवों को हार्दिकता से साझा किया, इस भेंट ने उनके बीच एक गहरी, स्थायी आत्मीयता स्थापित की।
इस अध्याय की शिक्षा
भिन्न-भिन्न परिस्थितियों से आई स्त्रियाँ भी, यदि साझा भक्ति और अनुभव से जुड़ें, एक गहरी, स्थायी आत्मीयता स्थापित कर सकती हैं।
वसुदेव के यज्ञ और देवकी के पुत्रों की वापसी
वसुदेव, अपने पुत्रों कृष्ण और बलराम की सलाह तथा गर्ग एवं अन्य ऋषियों के मार्गदर्शन में, अनेक महत्त्वपूर्ण वैदिक यज्ञ सम्पन्न किए, अपने जीवन के इस उत्तरार्ध में पूर्ण धार्मिक कर्तव्यों का पालन करते हुए।
इसी अवसर पर, कृष्ण और बलराम ने अपनी माता देवकी की एक दीर्घकालिक, गहन इच्छा पूर्ण करने का निश्चय किया — वे दोनों योगबल से पाताल लोक गए, जहाँ कंस द्वारा मारे गए देवकी के वे छह पूर्व पुत्र, जो वास्तव में हिरण्यकश्यप के शाप-ग्रस्त पुत्र थे, अस्थायी रूप से निवास कर रहे थे।
कृष्ण और बलराम ने इन छहों को पुनः थोड़े समय के लिए देवकी के पास लाकर, माता को अपने इन पूर्व पुत्रों को गोद में लेने और स्नेह करने का दीर्घ-प्रतीक्षित अवसर दिया, इससे पूर्व कि वे छहों पुत्र अपने वास्तविक, स्वर्गिक धाम को सदा के लिए वापस लौट जाएँ, इस प्रकार माता देवकी की वर्षों पुरानी वेदना को शांत किया।
इस अध्याय की शिक्षा
एक माता की वर्षों पुरानी, अधूरी लालसा को शांत करना भी भगवान के लिए असंभव नहीं — उनकी करुणा समय और परिस्थिति की सीमाओं से परे है।
सुभद्रा का विवाह और द्रौपदी की रक्षा
कृष्ण ने अपनी बहन सुभद्रा के विवाह की व्यवस्था में भी सक्रिय भूमिका निभाई, यह देखकर कि उनकी बहन अर्जुन के प्रति स्नेह रखती हैं, कृष्ण ने बलराम की इच्छा (जो सुभद्रा का विवाह दुर्योधन से करना चाहते थे) के विपरीत जाकर भी, चतुराईपूर्वक अर्जुन और सुभद्रा के गांधर्व-विवाह की व्यवस्था करने में सहायता की।
इस अध्याय में द्रौपदी के चीर-हरण के उस प्रसिद्ध प्रसंग को भी पुनः श्रद्धापूर्वक स्मरण किया गया है, जब भरी कौरव-सभा में दुःशासन द्वारा अपमानित की जाती द्रौपदी की पुकार पर, कृष्ण ने अपनी योगमाया से उनकी साड़ी को अनंत विस्तार दे दिया, इस प्रकार उनकी लाज और सम्मान की रक्षा करते हुए, यह पुनः स्थापित करते हुए कि भगवान अपने शरणागत भक्तों की पुकार को कभी अनसुना नहीं करते, चाहे संकट कितना भी असंभव प्रतीत हो।
इस अध्याय की शिक्षा
भगवान अपने भक्तों की पुकार को, चाहे संकट कितना भी असंभव प्रतीत हो, कभी अनसुना नहीं करते।
श्रुति-स्तुति: वेदों की प्रार्थना
इस अध्याय में स्वयं वेदों द्वारा, मानवीकृत रूप में, भगवान की महिमा में गाई गई एक अत्यंत गहन, दार्शनिक और काव्यात्मक स्तुति — श्रुति-स्तुति — प्रस्तुत की गई है, जिसमें वेद स्वयं यह स्वीकार करते हैं कि वे भी भगवान की अनंत, अपार महिमा और उनके वास्तविक स्वरूप का पूर्ण, सम्पूर्ण वर्णन करने में सर्वथा असमर्थ हैं।
यह स्तुति भगवान की सर्वव्यापकता, उनकी सर्जन-शक्ति, तथा उनके भक्तों के प्रति उनकी असीम करुणा का वर्णन करती है, यह स्थापित करते हुए कि भगवद्भक्ति ही, वेदाध्ययन और कर्मकांड से भी अधिक, भगवान तक पहुँचने का सर्वोच्च, सरलतम और सर्वसुलभ मार्ग है, क्योंकि वेद स्वयं भी अंततः इसी भक्ति की ओर ही संकेत करते हैं।
इस अध्याय की शिक्षा
वेद स्वयं भी भगवान की अनंत महिमा का पूर्ण वर्णन करने में असमर्थ हैं — यह भक्ति की उस असीमता का प्रमाण है जो शास्त्रों की सीमा से भी परे है।
वृकासुर से शिव की रक्षा
इस अध्याय में वृकासुर नामक एक असुर की कथा है, जिसने नारद के दिखाए मार्ग पर भगवान शिव की कठोर तपस्या कर, यह भयंकर वरदान प्राप्त किया कि वह जिस किसी के भी सिर पर अपना हाथ रखेगा, वह तत्काल भस्म हो जाएगा।
इस वरदान की शक्ति की परीक्षा लेने के लोभ में, वृकासुर ने तुरन्त इसे स्वयं शिव पर ही प्रयोग करने का प्रयास किया, जिससे भयभीत शिव भागते हुए भगवान विष्णु की शरण में पहुँचे।
विष्णु ने, अपनी अद्वितीय चतुराई से, मोहिनी का अत्यंत सुंदर रूप धारण कर वृकासुर के समक्ष प्रकट हुए, और उसे नृत्य की एक विशेष मुद्रा में, स्वयं अपने ही सिर पर हाथ रखने के लिए छलपूर्वक प्रेरित किया — वृकासुर, मोहिनी के सौंदर्य में मोहित होकर उनका अनुसरण करते हुए, अनजाने में स्वयं अपने ही सिर पर हाथ रख बैठा, और तत्काल स्वयं ही भस्म होकर नष्ट हो गया, इस प्रकार शिव को एक भीषण संकट से सुरक्षित बचाया गया।
इस अध्याय की शिक्षा
छल और चतुराई से प्राप्त शक्ति का दुरुपयोग करने वाला अंततः स्वयं अपने ही कृत्य का शिकार बनता है।
ब्राह्मण के पुत्रों की वापसी
इस अध्याय में एक द्वारकावासी ब्राह्मण की करुण कथा है, जिनके अनेक नवजात पुत्र, जन्म लेते ही, एक-एक कर रहस्यमय ढंग से मृत्यु को प्राप्त हो जाते थे, जिससे शोकाकुल ब्राह्मण ने राजसभा में स्वयं कृष्ण और अर्जुन को भी इस अन्याय के लिए उत्तरदायी ठहराते हुए घोर उलाहना दी, कि राजा की उपस्थिति में भी उनके पुत्र सुरक्षित नहीं।
अर्जुन ने, इस चुनौती को स्वीकार करते हुए, ब्राह्मण के अगले पुत्र की रक्षा का वचन दिया, और अपने दिव्य अस्त्रों से एक सुरक्षा-कवच बनाया, फिर भी वह पुत्र भी रहस्यमय ढंग से लुप्त हो गया, जिससे अर्जुन ने स्वयं को अग्नि में भस्म करने का प्रण लिया।
अंततः कृष्ण और अर्जुन दोनों, रथ पर सवार होकर, संसार की सीमाओं को पार कर, प्रलय-जल में स्थित भगवान के अपने ही दिव्य वैकुण्ठ-स्वरूप तक पहुँचे, जहाँ से उन्होंने ब्राह्मण के समस्त मृत पुत्रों को, जीवित एवं सकुशल, वापस प्राप्त कर, उन्हें उनके शोकाकुल पिता को लौटाया — यह घटना प्रदर्शित करती है कि भगवान अपने भक्तों की प्रत्येक प्रार्थना और चुनौती को, चाहे वह कितनी भी असंभव प्रतीत हो, अंततः पूर्ण करने में पूर्णतः सक्षम हैं।
इस अध्याय की शिक्षा
भगवान अपने भक्तों की प्रत्येक प्रार्थना और चुनौती को, चाहे वह कितनी भी असंभव प्रतीत हो, पूर्ण करने में पूर्णतः सक्षम हैं।
दशम स्कन्ध का समापन: कृष्ण की महिमा का सारांश
दशम स्कन्ध के इस अंतिम अध्याय में, शुकदेव ने राजा परीक्षित के समक्ष कृष्ण के सम्पूर्ण, भव्य जीवन और उनकी असंख्य लीलाओं का एक विस्तृत, हृदयस्पर्शी सारांश प्रस्तुत किया — कारागार में उनके अलौकिक जन्म से लेकर वृंदावन की मधुर, निश्छल बाल-लीलाओं तक; मथुरा में कंस के अंत से लेकर द्वारका के भव्य, समृद्ध राजसी जीवन तक; और उनके असंख्य विवाहों, असंख्य संतानों तथा उनकी अनगिनत, विविध लीलाओं तक।
शुकदेव ने परीक्षित को गहराई से स्मरण कराया कि यह सम्पूर्ण, विशाल कथा, अपनी अपार विविधता — युद्ध और विवाह, राजसी उत्सव और घर में एक शर्मीले, निर्धन मित्र की चुपचाप की गई सहायता, पर्वत उठाने का चमत्कार और मक्खन चुराने की बचकानी शरारत — के बावजूद, एक ही, अटूट, केंद्रीय संदेश देती है: कि कृष्ण की असीम शक्ति और कृष्ण का असीम प्रेम, दो भिन्न वस्तुएँ नहीं, अपितु एक ही, अविभाज्य, अतिप्रवाहित दिव्य वास्तविकता के दो पक्ष हैं।
चाहे वे गोवर्धन पर्वत उठा रहे हों, गोपियों के साथ रास-नृत्य कर रहे हों, या किसी लज्जित, निर्धन बाल-मित्र के घर को चुपचाप, बिना कुछ कहे, स्वर्ण-महल में परिवर्तित कर रहे हों — प्रत्येक लीला में वही एक अविरल, असीम प्रेम प्रवाहित होता है, जो न शक्ति की सीमा जानता है, न स्नेह की।
इस प्रकार भागवत पुराण का यह सबसे विस्तृत, सबसे विख्यात और भक्तों के हृदय में सर्वाधिक प्रिय स्कन्ध यहाँ समाप्त होता है, कथा को अब एकादश स्कन्ध की ओर अग्रसर करते हुए, जहाँ यदुवंश पर अंततः आने वाले विनाशकारी शाप, उद्धव को कृष्ण द्वारा दिया गया उनका अंतिम, सर्वाधिक गहन उपदेश, और स्वयं भगवान के अपने शाश्वत, दिव्य धाम को वापस प्रस्थान की मार्मिक कथा का वर्णन किया जाएगा।
दशम स्कन्ध (पुस्तक १०) का सम्पूर्ण हिंदी अनुवाद समाप्त — कुल ९० अध्याय (भाग १: अध्याय १-१५, भाग २: १६-३०, भाग ३: ३१-४५, भाग ४: ४६-६०, भाग ५: ६१-७५, भाग ६: ७६-९०)
इस अध्याय की शिक्षा
कृष्ण की असीम शक्ति और असीम प्रेम एक ही, अविभाज्य वास्तविकता के दो पक्ष हैं — चाहे पर्वत उठाना हो या मित्र की सहायता करना, दोनों में वही एक प्रेम प्रवाहित होता है।
