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चतुर्थ स्कन्ध

चतुर्थ स्कन्ध

दक्ष-यज्ञ विध्वंस, ध्रुव चरित्र, वेन-पृथु राजा की कथा एवं पूर्वचित्ति-पुरंजन के आख्यान।

1

दक्ष द्वारा शिव की निंदा एवं यज्ञ का आयोजन

चतुर्थ स्कन्ध का आरम्भ एक ऐसे पारिवारिक विवाद से होता है, जो अभिमान और अपमान के कारण एक महान त्रासदी में बदल जाता है। प्रजापति दक्ष, जो ब्रह्माजी के मानस-पुत्र और सती के पिता थे, अपने जामाता भगवान शिव के प्रति दीर्घकाल से एक गहरा असंतोष पाले हुए थे। शिव की जटाएँ, श्मशान की भस्म का लेपन, गले में सर्प, और राजसी लोकाचार के प्रति उनकी पूर्ण उदासीनता दक्ष को अपनी सुसंस्कृत, ऐश्वर्यशाली पुत्री की गरिमा के सर्वथा अयोग्य प्रतीत होती थी।

एक बार, एक विशाल यज्ञ-सभा में, जब दक्ष स्वयं उपस्थित हुए, तो समस्त सभा — ब्रह्माजी के अतिरिक्त — सम्मानपूर्वक खड़ी हो गई। किंतु शिव, जो उस समय गहन ध्यान में लीन थे, दक्ष के प्रवेश पर खड़े होकर सम्मान न दे सके। दक्ष का दीर्घकालिक असंतोष इस क्षण क्रोध बनकर फूट पड़ा। उन्होंने सम्पूर्ण सभा के समक्ष शिव को श्मशान-वासी, अपवित्र, कुल-हीन और असभ्य कहकर अपमानित किया, उन्हें यज्ञ-भाग पाने के सर्वथा अयोग्य घोषित किया, और खुले शब्दों में कहा कि उन्होंने अपनी पुत्री का विवाह कर एक भूल की थी जिसे वे अब गहराई से पछता रहे थे।

नंदीश्वर, शिव के परम भक्त गण, इस अपमान को सहन न कर सके और उन्होंने दक्ष तथा उपस्थित ब्राह्मणों को शाप दिया कि वे कर्मकाण्ड में लिप्त रहकर आत्मज्ञान से सदैव वंचित रहेंगे। इस पर ऋषि भृगु ने प्रतिशाप देते हुए कहा कि शिव के अनुयायी वेद-विरुद्ध, नास्तिक और म्लेच्छ-सदृश आचरण वाले होंगे — इस प्रकार एक पारिवारिक विवाद शीघ्र ही दो महान परंपराओं के बीच कटुता में परिवर्तित होने लगा।

इस अपमान से आहत होकर भी सती अपने पिता के प्रति स्वाभाविक प्रेम के कारण चुप न रह सकीं। जब उन्हें समाचार मिला कि दक्ष एक विशाल बृहस्पति-सव यज्ञ का आयोजन करने जा रहे हैं, जिसमें समस्त देवताओं और ऋषियों को आमंत्रित किया गया है किंतु जान-बूझकर शिव को आमंत्रण नहीं भेजा गया, तो उन्होंने निश्चय किया कि वे बिना निमंत्रण के ही वहाँ उपस्थित होंगी, इस आशा से कि उनकी उपस्थिति शायद इस पारिवारिक कटुता को शांत कर सके।

शिव, जो अपनी योगदृष्टि से जानते थे कि यह यात्रा शुभ परिणाम नहीं देगी, ने सती को अत्यंत सौम्यता से समझाने का प्रयास किया — किंतु सती का पितृ-प्रेम उन्हें रोक न सका, और वे अपने पिता के यज्ञ की ओर चल पड़ीं, यह न जानते हुए कि यह निर्णय शीघ्र ही किस भयावह मोड़ की ओर ले जाएगा।

इस अध्याय की शिक्षा

दूसरों की जीवनशैली को तुच्छ समझकर किया गया अनादर, चाहे वह कितना भी न्यायोचित प्रतीत हो, अंततः घर की शांति और सम्मान को ही नष्ट करता है।

2

सती का आत्मदाह

सती जब दक्ष के यज्ञ-स्थल पर, अकेली और बिना किसी स्वागत के, पहुँचीं, तो उनकी सबसे बड़ी आशंका सत्य सिद्ध हुई। उनकी माता और बहनों के अतिरिक्त किसी ने भी उनका उचित स्वागत नहीं किया। दक्ष ने उनकी ओर देखा तक नहीं, मानो वे वहाँ उपस्थित ही न हों — यह उपेक्षा किसी प्रत्यक्ष अपमान से भी अधिक पीड़ादायक थी।

जब सती ने साहस कर अपने पिता से शिव के प्रति उनकी शत्रुता का कारण पूछा, तो दक्ष सम्पूर्ण सभा के समक्ष पुनः क्रोधित हो उठे। उन्होंने शिव को एक भिखारी, श्मशान-वासी भूत-प्रेतों का स्वामी, कुल-हीन और सभ्य समाज के सर्वथा अयोग्य बताते हुए अत्यंत कटु शब्दों में उनकी निंदा की, यह भी कहते हुए कि उन्होंने केवल ब्रह्माजी के आग्रह पर विवश होकर ही यह विवाह स्वीकार किया था।

यह अपमान सती अपने लिए नहीं, अपितु अपने प्रियतम पति के लिए सह न सकीं। उन्होंने पिता से स्पष्ट शब्दों में कहा कि जो व्यक्ति अपने ही जामाता की, जो स्वयं समस्त लोकों के स्वामी हैं, निंदा करता है, वह अपनी जिह्वा और कानों दोनों को पापी बना लेता है, और ऐसे पिता से उत्पन्न शरीर को धारण करना ही एक लज्जा की बात है।

इस असहनीय क्रोध और लज्जा में डूबकर, सती ने पूर्व दिशा की ओर मुख कर आसन ग्रहण किया, अपनी योगशक्ति द्वारा प्राणवायु को क्रमशः ऊपर उठाते हुए अपने ही शरीर में एक आंतरिक अग्नि उत्पन्न की, और उसी योगाग्नि में अपने शरीर को पूर्णतः भस्म कर दिया — यह चुनते हुए कि जिस शरीर का जन्म ऐसे पिता से हुआ जो उनके पति के विषय में इतनी निंदनीय भाषा बोल सके, उसे त्याग देना ही श्रेयस्कर है।

इस घटना ने तीनों लोकों में शोक और क्रोध की लहर दौड़ा दी। जब यह समाचार शिव तक पहुँचा, तो उनके गणों में हाहाकार मच गया, और स्वयं शिव की जटाओं से भयंकर वीरभद्र तथा काली प्रकट हुए, जिन्होंने प्रतिशोध में दक्ष के यज्ञ की ओर प्रस्थान किया — किंतु यह कथा अगले अध्यायों में विस्तार से वर्णित होती है, क्योंकि शुकदेव यहाँ कुछ क्षण के लिए ठहरकर विदुर को उस संवाद की ओर ले जाते हैं जो सती और शिव के बीच यज्ञ-गमन से पूर्व हुआ था।

इस अध्याय की शिक्षा

जब पति के सम्मान की रक्षा करने का कोई अन्य मार्ग शेष न रहे, तो एक शुद्ध हृदय शरीर के त्याग को भी अपमान सहने से श्रेष्ठ मान सकता है — किंतु यह मार्ग अंतिम उपाय ही होना चाहिए।

3

शिव और सती के बीच संवाद

इस अध्याय में, कथा कुछ पीछे लौटती है, यह समझाने के लिए कि सती के यज्ञ-गमन के पूर्व शिव और सती के बीच क्या विस्तृत संवाद हुआ था। जब आकाश-मार्ग से देवताओं और ऋषियों को दक्ष के यज्ञ की ओर जाते देखकर सती के मन में भी वहाँ जाने की तीव्र इच्छा जागृत हुई, तो उन्होंने शिव से इसकी अनुमति माँगी।

शिव ने अत्यंत स्नेह और गंभीरता के साथ उन्हें समझाया कि दक्ष, अपने पूर्व के अपमानजनक व्यवहार के कारण, उनसे और उनके गणों से गहरा द्वेष रखते हैं, और बिना निमंत्रण के वहाँ जाना उचित नहीं होगा। उन्होंने एक गहन सिद्धांत भी प्रस्तुत किया — कि सम्बन्धियों के घर बिना बुलाए जाना, चाहे वे कितने भी निकट क्यों न हों, यदि वहाँ अपमान की आशंका हो, तो वह सम्मान के योग्य आत्मा के लिए वर्जित है।

सती, अपने पिता के प्रति गहरे स्नेह और यह आशा लिए हुए कि उनकी उपस्थिति शायद पुरानी कटुता को धो सके, इस चेतावनी को पूर्णतः समझते हुए भी, अपनी यात्रा से विरत न हो सकीं। उन्होंने शिव को आश्वस्त किया कि वे केवल सुलह और अपनी माता-बहनों से मिलने की आशा से जा रही हैं, कलह की नहीं, और स्त्री का अपने पिता के घर बिना निमंत्रण जाना कोई अपराध नहीं माना जाता।

शिव, यद्यपि परिणाम को भलीभाँति जानते थे, अपनी योगदृष्टि से भावी अनर्थ को देख चुके थे, तथापि उन्होंने सती की स्वतंत्र इच्छा का सम्मान करते हुए उन्हें जाने की अनुमति दे दी। उन्होंने अपने प्रमुख गणों को सती के साथ रक्षक के रूप में भेजा, यह जानते हुए भी कि दक्ष के यज्ञ में उनकी उपस्थिति स्वयं में एक चुनौती के समान प्रतीत होगी।

यह संवाद इस बात का गंभीर और मार्मिक उदाहरण है कि कैसे गहन प्रेम भी कभी-कभी किसी प्रियजन को आसन्न पीड़ा से नहीं बचा पाता, यद्यपि पूर्ण ज्ञान और चेतावनी पहले ही दी जा चुकी हो — क्योंकि स्वतंत्र इच्छा, प्रेम के होते हुए भी, सदैव सम्मानित की जाती है।

इस अध्याय की शिक्षा

पूर्ण ज्ञान और चेतावनी के होते हुए भी, प्रेम कभी-कभी किसी प्रियजन को आसन्न पीड़ा से नहीं बचा पाता — फिर भी स्वतंत्र इच्छा का सम्मान करना ही सच्चा प्रेम है।

4

सती द्वारा शरीर त्याग

यह अध्याय सती के आत्मदाह की घटना पर और गहराई से प्रकाश डालता है, विशेषतः उनके मानसिक द्वंद्व का वर्णन करते हुए — एक ओर पिता के प्रति कर्तव्य और स्नेह, दूसरी ओर पति के अपमान की असहनीय पीड़ा। शुकदेव ने परीक्षित को समझाया कि सती का यह कार्य क्षणिक आवेश का परिणाम नहीं था, अपितु एक विचारपूर्ण, यौगिक निश्चय था।

सती ने पहले स्नान कर, पवित्र होकर, पूर्वाभिमुख होकर आसन ग्रहण किया। उन्होंने अष्टांग योग की विधि से अपने प्राणों को क्रमशः मूलाधार से हृदय, और हृदय से कण्ठ की ओर उठाया, और अंततः ब्रह्मरंध्र में स्थिर कर, अपनी संपूर्ण योगशक्ति एकत्रित कर अपने भीतर ही समाधि-अग्नि प्रज्वलित की, जिसने क्षण भर में उनके शरीर को पूर्णतः भस्म कर दिया, बिना किसी बाह्य अग्नि की सहायता के।

इस घटना का गहन आध्यात्मिक संदेश यह है कि जब सम्मान और प्रेम के बीच कोई समझौता असंभव हो जाए, तो एक शुद्ध हृदय वाली आत्मा शरीर के प्रति अपनी आसक्ति को भी त्याग सकती है, यदि वह शरीर उसके धर्म और प्रेम के विरुद्ध किसी अपमान का साधन बन जाए। उपस्थित समस्त देवगण और ऋषिगण इस दृश्य को देखकर स्तब्ध रह गए, और दक्ष के प्रति उनके मन में भी घोर निंदा उत्पन्न हुई।

सती का यह बलिदान आगे चलकर उनके पुनर्जन्म — पर्वतराज हिमालय की पुत्री पार्वती के रूप में — का आधार बना, जहाँ वे दीर्घ तपस्या के पश्चात् पुनः शिव की अर्धांगिनी बनीं, इस बार बिना किसी पारिवारिक विरोध के, क्योंकि हिमालय ने सहर्ष अपनी पुत्री शिव को अर्पित की।

शुकदेव ने परीक्षित को यह भी बताया कि यह कथा केवल एक ऐतिहासिक घटना मात्र नहीं, अपितु प्रत्येक श्रोता के लिए एक गहन शिक्षा है — कि पारिवारिक अभिमान और अहंकार कितनी विनाशकारी शक्ति रखते हैं, और कैसे विनम्रता तथा पारस्परिक सम्मान के अभाव में सबसे पवित्र सम्बन्ध भी अपरिवर्तनीय रूप से टूट सकते हैं।

इस अध्याय की शिक्षा

पारिवारिक अभिमान और अनादर की जड़ें कितनी गहरी विनाशकारी हो सकती हैं, यह सती का बलिदान दर्शाता है — विनम्रता के अभाव में सबसे पवित्र सम्बन्ध भी टूट जाते हैं।

5

दक्ष के यज्ञ का विध्वंस

सती के आत्मदाह का समाचार जब शिव तक पहुँचा, तो उनका असीम शोक क्रोध में परिवर्तित हो गया। समस्त लोक काँप उठे। अपनी जटाओं से एक बाल उखाड़कर उन्होंने क्रोधपूर्वक भूमि पर दे मारा, जिससे भयंकर वीरभद्र प्रकट हुए — काल के समान विशाल, हजार भुजाओं वाले, और क्रोध तथा प्रतिशोध की साक्षात् मूर्ति। साथ ही महाकाली भी प्रकट हुईं, अपने गणों की सेना के साथ।

शिव के अनगिनत गण, भूत-प्रेत, यक्ष और वीरभद्र की विशाल सेना ने दक्ष के यज्ञ-स्थल पर आक्रमण कर दिया। इस विध्वंसकारी सेना ने यज्ञशाला को छिन्न-भिन्न कर दिया, यज्ञ-वेदी को तोड़ डाला, यज्ञ-पात्रों को नष्ट कर दिया, और वहाँ उपस्थित देवताओं तथा ऋषियों में से कई को भयभीत कर भगा दिया।

स्वयं भृगु ऋषि, जिन्होंने यज्ञ की अध्यक्षता की थी, अपनी दाढ़ी की रक्षा में असफल रहे और उसे उखाड़ लिया गया; पूषा देव के दाँत तोड़ दिए गए क्योंकि उन्होंने हँसते हुए इस विध्वंस को देखा था; भग देव की आँखें फोड़ दी गईं क्योंकि उन्होंने कुदृष्टि से देखा था; और यज्ञ के देवता स्वयं भयभीत होकर मृगरूप धारण कर आकाश में भाग गए, जहाँ वीरभद्र ने उनका पीछा किया।

अंततः वीरभद्र ने क्रोध की चरम सीमा पर पहुँचकर दक्ष का शिरच्छेद कर उसे यज्ञाग्नि में ही समर्पित कर दिया, इस प्रकार पुत्री के अपमान का प्रतिशोध पूर्ण हुआ। सम्पूर्ण यज्ञ-स्थल अराजकता, भय और विनाश के दृश्य में परिवर्तित हो गया, और शेष उपस्थित देवगण प्राण बचाकर ब्रह्माजी की शरण में भागे।

शुकदेव ने परीक्षित को समझाया कि यह विध्वंस केवल प्रतिशोध नहीं था, अपितु यह दर्शाने का एक माध्यम भी था कि जब कोई यज्ञ, चाहे वह कितना ही वैदिक विधि-विधान से क्यों न हो, अहंकार और अनादर की नींव पर खड़ा हो, तो वह अपनी ही आधारशिला के कारण गिर जाता है। सच्चे धर्म का सार यज्ञ की बाह्य विधियों में नहीं, अपितु उसमें उपस्थित विनम्रता और सम्मान में निहित है।

इस अध्याय की शिक्षा

जब कोई यज्ञ या कार्य अहंकार और अनादर की नींव पर खड़ा हो, तो वह चाहे कितना भी विधि-सम्मत क्यों न हो, अपनी ही आधारशिला के कारण गिर जाता है।

6

शिव का प्रसन्न किया जाना

यज्ञ के विध्वंस और दक्ष की मृत्यु के पश्चात्, देवताओं में गहरी चिंता व्याप्त हो गई, क्योंकि प्रजापति दक्ष सृष्टि के आगामी कार्य — प्रजा-वृद्धि — के लिए अपरिहार्य थे, और भग तथा पूषा जैसे देवता भी अपंग हो चुके थे, जिससे यज्ञ-कर्म का सम्पूर्ण तंत्र ही अस्त-व्यस्त हो गया था।

ब्रह्माजी के नेतृत्व में समस्त देवगण कैलाश पर्वत पहुँचे, जहाँ शिव अभी भी शोक और क्रोध में गहन ध्यानमग्न थे। ब्रह्माजी ने अत्यंत विनम्रता से शिव के समक्ष खड़े होकर उनकी स्तुति की, यह स्वीकार करते हुए कि शिव, समस्त देवताओं में सर्वाधिक क्षमाशील और करुणामय हैं, और दक्ष का अपराध क्षम्य होना चाहिए क्योंकि सृष्टि का कल्याण इसी में निहित है।

शिव, जिनका स्वभाव क्रोध जितनी शीघ्रता से आता है उतनी ही शीघ्रता से शांत भी हो जाता है — विशेषतः जब वह क्रोध किसी की भक्ति या विनम्र प्रार्थना से शांत किया जाए — देवताओं की विनती से पूर्णतः पिघल गए। उन्होंने न केवल दक्ष को क्षमा किया और उसे पुनर्जीवित करने की स्वीकृति दी, अपितु वीरभद्र द्वारा किए गए विध्वंस को भी शांत करने का आदेश दिया, तथा भग और पूषा को भी उनकी दृष्टि और दाँत पुनः प्राप्त कराने का वचन दिया।

शिव ने स्वयं यज्ञ में उपस्थित होकर उसे पूर्णता प्रदान करने की सहमति दी, इस प्रकार पूर्व की कटुता को समाप्त करते हुए एक नई शुरुआत का मार्ग प्रशस्त किया। इस उदारता से देवगण अत्यंत प्रसन्न हुए और शिव की जय-जयकार करने लगे।

यह प्रसंग भक्तों के लिए एक गहन शिक्षा है — कि सच्ची भक्ति और विनम्र प्रार्थना, चाहे कितने भी गंभीर संकट में क्यों न हो, सबसे उग्र क्रोध को भी शांत कर सकती है। देवताओं की सामूहिक प्रार्थना ने यह सिद्ध किया कि विनाश के पश्चात् भी पुनर्निर्माण और क्षमा संभव है, यदि हृदय में सच्ची विनम्रता हो।

इस अध्याय की शिक्षा

सच्ची भक्ति और विनम्र प्रार्थना सबसे उग्र क्रोध को भी शांत कर सकती है — विनाश के पश्चात् भी क्षमा और पुनर्निर्माण सदैव संभव है।

7

दक्ष के यज्ञ की पूर्णता

पुनर्जीवित होने पर दक्ष का हृदय पूर्णतः परिवर्तित हो चुका था। परम्परा के अनुसार, चूँकि उसका मूल सिर विध्वंस में नष्ट हो चुका था, देवताओं ने उसके शरीर में एक बकरे का सिर जोड़ दिया, जो अभिमान की कीमत की सदा स्मरण कराने वाली एक स्थायी निशानी बन गया।

बकरे के सिर के साथ जीवित होकर, दक्ष अपने पूर्व अभिमान को भूलकर विनम्रता और पश्चाताप से भर गए। उन्होंने शिव के समक्ष खड़े होकर, गद्गद कण्ठ से, अपनी भूल के लिए क्षमा माँगी और उनकी भावभीनी स्तुति की, यह स्वीकार करते हुए कि अभिमान ने उन्हें इतना अंधा कर दिया था कि उन्होंने स्वयं भगवान शिव को, जो सम्पूर्ण सृष्टि के आदि-गुरु हैं, पहचानने में भूल की।

इसके पश्चात्, दक्ष ने इस बार पूर्ण श्रद्धा और उचित विधि-विधान के साथ अपने यज्ञ को पूर्ण किया, जो पूर्व में अहंकार के कारण अधूरा और विध्वंसकारी बन गया था। शुकदेव ने वर्णन किया कि कैसे भगवान विष्णु स्वयं इस पुनःआयोजित यज्ञ में उपस्थित हुए, और शिव तथा विष्णु दोनों को यज्ञ में समुचित भाग प्राप्त हुआ।

इस प्रसंग से यह स्पष्ट होता है कि शिव और विष्णु के बीच कोई वास्तविक प्रतिस्पर्धा नहीं है, अपितु वे दोनों एक ही परम सत्य के भिन्न-भिन्न प्रकटीकरण हैं, जिनकी पूजा समान भक्ति और सम्मान से की जानी चाहिए — यह शिक्षा भागवत पुराण में बार-बार विभिन्न रूपों में दोहराई जाती है।

इस प्रकार, अभिमान से आरम्भ हुआ यह प्रसंग विनम्रता और सामंजस्य के साथ समाप्त होता है — एक ऐसी शिक्षा जो आगे आने वाले ध्रुव की कथा के सर्वथा विपरीत प्रस्तुत होती है, जहाँ एक पाँच वर्ष का निष्कपट बालक विनम्रता और दृढ़ता के संयोग से वह प्राप्त करता है, जो दक्ष का अभिमान कभी प्राप्त न कर सका।

इस अध्याय की शिक्षा

अभिमान से आरम्भ हुई कोई भी कथा विनम्रता और सामंजस्य के साथ भी समाप्त हो सकती है, यदि हृदय में सच्चा पश्चाताप और परिवर्तन की इच्छा हो।

8

ध्रुव का गृह-त्याग

राजा उत्तानपाद, जो स्वायम्भुव मनु के पुत्र थे, की दो रानियाँ थीं — सुनीति और सुरुचि। सुनीति के पुत्र ध्रुव थे, किंतु राजा का अधिकतर स्नेह सुंदरी और प्रिय सुरुचि तथा उनके पुत्र उत्तम पर केंद्रित था, जबकि सुनीति और ध्रुव को उपेक्षा का सामना करना पड़ता था।

एक दिन, राजा उत्तानपाद अपने पुत्र उत्तम को गोद में लिए बैठे थे। पाँच वर्षीय ध्रुव भी अपने पिता की गोद में बैठने की इच्छा से आगे बढ़े, किंतु सुरुचि ने उन्हें कठोरता से रोकते हुए कहा कि यह आसन केवल उन्हीं के पुत्र के लिए है, और यदि ध्रुव को राजा की गोद और भविष्य में सिंहासन चाहिए, तो उन्हें पहले सुरुचि की ही कोख से जन्म लेना चाहिए था — एक बात जो अब असंभव है, अतः उन्हें भगवान की तपस्या करके ऐसा भाग्य अर्जित करना होगा।

राजा, अपनी प्रिय रानी के इस कठोर वचन को सुनकर भी, अपनी ही रानी के समक्ष मौन रह गए, अपने ही पुत्र की रक्षा या सांत्वना में एक शब्द भी न बोल सके — यह देखकर आहत ध्रुव क्रोध और अपमान से भरकर, आँसुओं से भीगे हुए, अपनी माता सुनीति के पास दौड़े गए।

सुनीति, स्वयं गहरे दुःख में डूबी होते हुए भी, अपने पुत्र को क्रोध या प्रतिशोध की ओर नहीं, अपितु एक गहन आध्यात्मिक सत्य की ओर मोड़ा। उन्होंने समझाया कि सुरुचि के कठोर शब्द वास्तव में असत्य नहीं हैं — कोई भी सांसारिक पिता की गोद कभी स्थायी नहीं हो सकती, क्योंकि यह भाग्य और पूर्वजन्म के कर्मों पर निर्भर करती है। किंतु एक ऐसा पिता भी है जिसकी गोद कोई कभी नहीं छीन सकता — स्वयं भगवान नारायण, यदि सच्चे हृदय से खोजा जाए।

इन शब्दों से गहराई से प्रेरित होकर, पाँच वर्षीय ध्रुव, क्रोध या शोक में डूबने के बजाय, अकेले ही महल त्यागकर वन की ओर चल पड़े, यह दृढ़ निश्चय करते हुए कि वे पृथ्वी के किसी भी सिंहासन से श्रेष्ठ एक आसन प्राप्त करेंगे — एक ऐसा संकल्प जो इतिहास में एक बालक की भक्ति और अटूट दृढ़ता का सर्वोत्तम उदाहरण बन गया।

इस अध्याय की शिक्षा

जब सांसारिक सम्मान और सुरक्षा छिन जाए, तो एक निश्छल हृदय भगवान में ही अपना स्थायी आसन खोज लेता है — ध्रुव की दृढ़ता इसी सत्य का प्रमाण है।

9

ध्रुव की तपस्या और विष्णु का वरदान

वन की ओर जाते हुए ध्रुव की भेंट देवर्षि नारद से हुई, जो इस अल्पवयस्क बालक के मुख पर इतने कठोर संकल्प और आँखों में इतनी दृढ़ता देखकर आश्चर्यचकित हुए। नारद ने पहले उन्हें स्नेहपूर्वक समझाया कि वे अभी अत्यंत छोटे हैं, घर लौट जाएँ और आयु तथा समझ बढ़ने पर तप करें, किंतु ध्रुव का दृढ़ निश्चय टस से मस न हुआ।

ध्रुव ने उत्तर दिया कि सुरुचि के कटु वचनों ने उनके हृदय को इतनी गहराई तक बींध दिया है कि अब कोई सांत्वना उसे शांत नहीं कर सकती, केवल भगवान का साक्षात् दर्शन ही उस पीड़ा को मिटा सकता है। उनकी इस अटूट निष्ठा से प्रभावित होकर, नारद ने उन्हें मधुवन जाने की सलाह दी और द्वादशाक्षर मंत्र — ॐ नमो भगवते वासुदेवाय — तथा ध्यान की विधि सिखाई।

ध्रुव ने वन में जो तपस्या की, उसका वर्णन अद्भुत तीव्रता से किया गया है — प्रथम मास केवल फल-मूल खाए, द्वितीय मास केवल सूखे पत्ते, तृतीय मास केवल जल, और चतुर्थ मास से केवल वायु ग्रहण कर, एक पैर पर खड़े होकर, प्राणों को रोककर, इतनी गहन समाधि में लीन हो गए कि उनका श्वास-प्रश्वास रुकने से सम्पूर्ण ब्रह्मांड की श्वास-प्रक्रिया ही बाधित होने लगी, जिससे भयभीत होकर देवताओं ने विष्णु से हस्तक्षेप की प्रार्थना की।

अंततः भगवान विष्णु अपने पूर्ण चतुर्भुज दिव्य रूप में, शंख-चक्र-गदा-पद्म धारण किए, गरुड़ पर आरूढ़ होकर उनके समक्ष प्रकट हुए। और उस क्षण, जो बालक सिंहासन से बड़ा आसन माँगने वन में आया था, वह प्रेम के अतिरेक में अपनी रटी हुई प्रार्थना के शब्द ही भूल गया, केवल आनंद-विभोर होकर हकलाने लगा, उसकी आँखों से अश्रुधारा बहने लगी।

भगवान, इस निश्छल भक्ति से अत्यंत प्रसन्न होकर, अपना शंख बालक के गाल पर स्पर्श कराया, जिससे तुरन्त उसकी वाणी में अद्भुत प्रवाह उत्पन्न हुआ और वह एक सुंदर स्तुति गाने लगा। भगवान ने उसे न केवल एक शाश्वत राज्य अपितु स्वर्ग में एक स्थान — ध्रुवलोक, अचल ध्रुवतारा — प्रदान किया, जिसके चारों ओर समस्त तारे, नक्षत्र और यहाँ तक कि सप्तर्षि भी सदा परिक्रमा करते रहते हैं, यह वरदान देते हुए कि यह पद उसके पिता और पितामह से भी अधिक दीर्घकाल तक स्थिर रहेगा।

इस अध्याय की शिक्षा

बाल्यावस्था की निष्कपट, अटूट लगन भी भगवान को उतनी ही शीघ्रता से प्रसन्न कर सकती है जितनी वर्षों की तपस्या — भक्ति में आयु या अनुभव बाधा नहीं बनते।

10

ध्रुव का यक्षों से युद्ध

वर्षों पश्चात्, जब ध्रुव अपने पिता के राज्य में लौट आए और शासन संभाला, उनके छोटे भाई उत्तम की, एक बार हिमालय के वनों में आखेट करते समय, एक यक्ष के हाथों अकारण ही मृत्यु हो गई। यह समाचार पाकर ध्रुव अत्यंत क्रोधित और शोकाकुल हुए, और अपने भाई की मृत्यु का प्रतिशोध लेने का प्रण लिया।

क्रोध से भरे ध्रुव ने एक विशाल सेना लेकर यक्षों की नगरी अलकापुरी पर आक्रमण कर दिया। उन्होंने अपने दिव्य अस्त्रों से अनेक यक्षों का संहार किया, नगरी को घेर लिया, और युद्ध इतना भयंकर हो गया कि यक्षों की पत्नियाँ और परिवार भय से चीत्कार करने लगे। किंतु जब यक्षों की संख्या मायावी शक्ति से बढ़ती ही गई — प्रतीत होता था मानो प्रत्येक मारे गए यक्ष के स्थान पर दो नए प्रकट हो जाते हों — तो ध्रुव को आभास हुआ कि यह युद्ध केवल क्रोध के वशीभूत होकर अनावश्यक और अनंत विनाश की ओर बढ़ रहा है।

इसी संघर्ष के चरम पर, ध्रुव के पितामह स्वयं स्वायम्भुव मनु युद्धभूमि में पहुँचे और अपने पौत्र को रोककर समझाया कि प्रतिशोध की यह अग्नि, चाहे न्यायोचित प्रतीत हो, अंततः और अधिक शत्रुता, पाप तथा विनाश को ही जन्म देगी, और एक निर्दोष जाति का सामूहिक संहार किसी भी परिस्थिति में धर्मसंगत नहीं हो सकता।

मनु ने ध्रुव को स्मरण कराया कि एक भक्त और धर्मात्मा राजा का कर्तव्य क्रोध और प्रतिशोध में डूबना नहीं, अपितु क्षमा, संयम और विवेक का उदाहरण प्रस्तुत करना है, और यह भी कि उत्तम की मृत्यु स्वयं उसके अपने पूर्वकृत कर्मों का ही फल थी, जिसके लिए यक्ष जाति को पूर्णतः दोषी नहीं ठहराया जा सकता।

ध्रुव, अपने पितामह की इस गहन बात को सुनकर, अपने भीतर के क्रोध को शांत करने में सफल हुए और तुरन्त युद्ध विराम की घोषणा की। यक्षों के स्वामी, स्वयं धनाध्यक्ष कुबेर, ध्रुव की इस उदारता, संयम और अंततः क्षमाशीलता से अत्यंत प्रभावित होकर, स्वयं उनके समक्ष प्रकट हुए, उन्हें आशीर्वाद दिया, और अखंड भक्ति का वरदान दिया — यह घटना इस बात का सुंदर उदाहरण है कि सच्ची वीरता क्रोध पर विजय में है, शत्रु के विनाश में नहीं।

इस अध्याय की शिक्षा

प्रतिशोध का क्रोध, चाहे कितना भी न्यायोचित प्रतीत हो, अंततः और अधिक विनाश ही जन्म देता है — सच्ची वीरता क्रोध पर विजय में है, शत्रु के संहार में नहीं।

11

स्वायम्भुव मनु का ध्रुव को उपदेश

इस अध्याय में स्वायम्भुव मनु ने अपने पौत्र ध्रुव को, युद्धविराम के पश्चात् एकांत में, विस्तार से समझाया कि एक शासक का सच्चा कर्तव्य क्या है। उन्होंने बताया कि प्रतिशोध की भावना, चाहे वह कितनी भी न्यायसंगत प्रतीत हो, अंततः आत्मा को उसी अंधकार में डुबो देती है जिससे वह मुक्ति चाहती है, क्योंकि क्रोध विवेक को नष्ट कर देता है।

मनु ने एक गहन उदाहरण देते हुए समझाया कि जिस प्रकार अग्नि को घी से बुझाया नहीं जा सकता, उसी प्रकार हिंसा को हिंसा से शांत नहीं किया जा सकता — केवल क्षमा और सहनशीलता ही वैर-चक्र को समाप्त कर सकती है। उन्होंने ध्रुव को यह भी स्मरण कराया कि उन्हें जो असाधारण वरदान भगवान विष्णु से प्राप्त हुआ है, वह किसी युद्ध-विजय के लिए नहीं, अपितु उनकी बाल्यकाल की निश्छल, निष्कपट भक्ति के कारण था।

इसलिए, मनु ने कहा, ध्रुव को अपने शेष जीवन को उसी भक्ति और धर्मपरायणता के अनुरूप जीना चाहिए, न कि क्रोध और प्रतिशोध के मार्ग पर चलकर उस दिव्य वरदान की गरिमा को कम करना चाहिए। एक राजा जिसे भगवान ने स्वयं इतना महान पद प्रदान किया हो, उसका आचरण सामान्य मनुष्यों से कहीं अधिक उच्च होना चाहिए।

ध्रुव ने अपने पितामह के इस गहन उपदेश को हृदय से आत्मसात् किया, अपनी भूल के लिए पश्चाताप व्यक्त किया, और यक्षों के साथ स्थायी शांति स्थापित कर वे शांतिपूर्वक अपने राज्य की ओर लौट चले।

इस प्रसंग से शुकदेव ने परीक्षित को यह गहन शिक्षा दी कि आध्यात्मिक उपलब्धि और भगवद्-दर्शन भी किसी को क्रोध, शोक या मानवीय दुर्बलताओं से स्वतः मुक्त नहीं करते — निरंतर सजगता, आत्म-निरीक्षण और गुरुजनों के मार्गदर्शन की आवश्यकता जीवन-पर्यंत बनी रहती है, चाहे कोई कितना भी महान भक्त क्यों न हो।

इस अध्याय की शिक्षा

जो वरदान भक्ति से प्राप्त हुआ हो, उसे क्रोध या प्रतिशोध के मार्ग पर चलकर कलंकित नहीं करना चाहिए — आध्यात्मिक उपलब्धि के पश्चात् भी सजगता आवश्यक है।

12

ध्रुव की वापसी और उनका शासनकाल

यक्षों के साथ शांति स्थापित कर ध्रुव अपनी राजधानी लौट आए, जहाँ प्रजा ने हर्षोल्लास और भव्य उत्सव के साथ उनका स्वागत किया। उन्होंने अपने पिता उत्तानपाद के सिंहासन को संभाला और अत्यंत न्यायपूर्ण, धर्मपरायण शासन किया, जिसमें प्रजा सुखी-समृद्ध रही, वर्षा समय पर होती रही, और भूमि प्रचुर फसल देती रही — एक धर्मात्मा शासक के गुणों का प्रत्यक्ष फल।

ध्रुव ने अपनी दो रानियों — शम्भु की पुत्री भ्रमि और वायुदेव की पुत्री इला — से विवाह किया, और उनसे कल्प तथा वत्सर नामक पुत्र, तथा उत्कल नामक एक पुत्र उत्पन्न हुए, जिन्होंने आगे चलकर विभिन्न राजवंशों की स्थापना की। ध्रुव ने छत्तीस हजार वर्षों तक पृथ्वी पर धर्मपूर्वक शासन किया, यज्ञ किए, प्रजा का पालन किया, और सदैव भगवद्भक्ति में लीन रहे।

दीर्घकाल तक शासन करने के पश्चात्, जब ध्रुव को आभास हुआ कि उनका सांसारिक कर्तव्य पूर्ण हो चुका है, तो उन्होंने अपना राज्य अपने पुत्र उत्कल को सौंपकर, स्वयं हिमालय के बद्रिकाश्रम की ओर प्रस्थान किया, जहाँ वे पुनः गहन भगवद्-ध्यान में लीन हो गए, अपने प्राणों को नियंत्रित कर सांसारिक विचारों से पूर्णतः मुक्त हो गए।

अंततः, जब उनके शरीर-त्याग का समय निकट आया, भगवान विष्णु के दूत एक दिव्य विमान लेकर उन्हें लेने आए। ध्रुव, अपनी माता सुनीति को भी साथ लेकर, अपने शरीर को त्यागे बिना ही, उसी दिव्य विमान में बैठकर ध्रुवलोक की ओर प्रस्थान कर गए — वही अचल स्थान जो उन्हें बाल्यकाल में वचन दिया गया था।

शुकदेव ने कहा कि आज भी जब कोई रात्रि के आकाश में उस अचल ध्रुवतारे को देखता है, वह उसी बालक को देखता है जिसने कभी एक अस्थिर, क्षणभंगुर आसन को अस्वीकार कर, अपनी निष्कपट भक्ति और अटूट दृढ़ता से, एक शाश्वत आसन प्राप्त किया — और यह कथा जो कोई श्रद्धापूर्वक सुनता या सुनाता है, वह भी भगवद्भक्ति में दृढ़ता प्राप्त करता है।

इस अध्याय की शिक्षा

धर्मपूर्वक शासन करने और समय आने पर निर्मोह से पद त्यागने का यह संतुलन ही एक आदर्श राजा और भक्त के जीवन की पूर्णता है।

13

प्रियव्रत के वंश का वर्णन एवं विदुर की जिज्ञासा

ध्रुव की कथा के पश्चात्, शुकदेव ने परीक्षित को ध्रुव के बड़े भाई प्रियव्रत के विशाल वंश का वर्णन सुनाया। प्रियव्रत, जो स्वयं एक महान भक्त और चक्रवर्ती सम्राट थे, ने पृथ्वी को सात द्वीपों — जम्बू, प्लक्ष, शाल्मलि, कुश, क्रौंच, शाक और पुष्कर — में विभाजित कर अपने पुत्रों में बाँटा, और स्वयं भी एक विरक्त, ज्ञानी शासक के रूप में विख्यात हुए।

इसी वंशावली में आगे चलकर, प्रियव्रत के एक पुत्र आग्नीध्र से नाभि, नाभि से ऋषभदेव, और अंततः राजा अंग के वंश में राजा वेन और उनके पुत्र पृथु का जन्म हुआ, जिनकी कथा इस स्कन्ध के आगामी अध्यायों का मुख्य विषय बनती है।

इस बिंदु पर कथा-प्रवाह में एक स्वाभाविक विराम आता है, जहाँ विदुर, जो पूर्व स्कन्ध में मैत्रेय ऋषि से संवाद कर रहे थे, इन वंशावलियों के विषय में अपनी जिज्ञासा प्रकट करते हैं। विदुर ने मैत्रेय से पूछा कि एक ऐसा प्रजापति, जिसका पुत्र वेन इतना अधर्मी और क्रूर था, आगे चलकर पृथु जैसे महान, धर्मपरायण भक्त-राजा का पिता कैसे बना — यह कैसा विरोधाभास है?

मैत्रेय ने समझाया कि प्रत्येक वंशावली, चाहे वह कितनी भी सांसारिक प्रतीत हो, अंततः उन आत्माओं की कथा है जिन्होंने अपने-अपने युग में या तो धर्म की रक्षा की या अधर्म का प्रसार किया, और यह कि एक ही कुल में दोनों प्रकार की आत्माएँ जन्म ले सकती हैं, क्योंकि जन्म कुल से नहीं अपितु व्यक्तिगत कर्मों से निर्धारित होता है।

इसी संदर्भ में, विदुर की जिज्ञासा को शांत करने के लिए, राजा वेन की कथा का वर्णन आरम्भ होता है — एक ऐसी कथा जो यह दर्शाती है कि कैसे एक शासक का व्यक्तिगत अधर्म सम्पूर्ण राज्य और प्रकृति को संकट में डाल सकता है, और कैसे उसके पुत्र पृथु का जन्म, स्वयं भगवान की कृपा से, इस संकट के निवारण के लिए हुआ।

इस अध्याय की शिक्षा

एक ही वंश में अत्यंत भिन्न प्रकृति की आत्माएँ जन्म ले सकती हैं — जन्म कुल से नहीं, अपितु व्यक्ति के अपने कर्मों से निर्धारित होता है।

14

राजा वेन का जन्म, राज्याभिषेक और मृत्यु

राजा अंग के पुत्र वेन का जन्म एक अशुभ पृष्ठभूमि में हुआ। उनकी माता सुनीथा, मृत्यु के देवता यम की पुत्री थीं, और ज्योतिषियों ने जन्म के समय ही भविष्यवाणी कर दी थी कि वेन में अपने नाना के गुण अधिक प्रकट होंगे। बाल्यकाल से ही वेन में क्रूरता, हिंसा और अन्य बालकों को पीड़ा देने की प्रवृत्ति दिखाई दी, जिससे राजा अंग स्वयं अत्यंत चिंतित रहते थे।

राजा बनने पर, वेन का अहंकार असीम हो गया। उन्होंने सम्पूर्ण धार्मिक विधि-विधानों को त्याग दिया, यज्ञ, दान और वेद-पाठ पर प्रतिबंध लगा दिया, और उद्घोषणा की कि प्रजा को अब देवताओं या ऋषियों की नहीं, केवल राजा की ही पूजा करनी चाहिए, क्योंकि राजा ही समस्त देवताओं का समुच्चय है। उन्होंने घोषित किया कि उनके राज्य में उनकी आज्ञा के अतिरिक्त कोई अन्य धर्म मान्य नहीं होगा।

ऋषियों ने बार-बार सभा में आकर वेन को समझाने का प्रयास किया, उन्हें धर्म की मर्यादा और राजा के वास्तविक कर्तव्यों का स्मरण कराया, किंतु वेन ने प्रत्येक बार उनका उपहास किया और उन्हें अपमानित कर सभा से निकाल दिया। जब उनका अहंकार और अधर्म असहनीय सीमा तक बढ़ गया, तो क्रोधित ऋषियों ने सामूहिक रूप से हुंकार मंत्र का उच्चारण कर उन्हें शाप देकर मंत्र-शक्ति से मार डाला।

किंतु एक राजाविहीन राज्य में अराजकता, चोरी और अव्यवस्था फैलने की आशंका से चिंतित होकर, ऋषियों ने विचार किया कि वंश को पूर्णतः नष्ट करना उचित नहीं है। उन्होंने वेन के मृत शरीर की जांघ का मंथन किया, जिससे एक अत्यंत कुरूप, कृष्णवर्ण और वामन आकृति का पुरुष उत्पन्न हुआ, जिसे निषाद कहा गया — यह वेन के समस्त पापों का साक्षात् प्रतीक था, जो मंथन द्वारा उससे बाहर निकाला गया, और जो आगे चलकर वन्य जनजातियों का पूर्वज बना।

इसके पश्चात् ऋषियों ने वेन के शरीर की दाहिनी भुजा का मंथन किया, और इस बार एक तेजस्वी, दिव्य, अग्नि के समान कांतिमान पुरुष प्रकट हुआ, जिसके हाथ में जन्म से ही धनुष-बाण और कवच थे — यही राजा पृथु थे, जिनका जन्म विशेष रूप से इसलिए हुआ कि वे अपने पिता के अधर्म से उत्पन्न अराजकता का निवारण कर एक नए, धर्मपरायण युग का सूत्रपात कर सकें।

इस अध्याय की शिक्षा

अहंकार में डूबकर धर्म और वेद की उपेक्षा करने वाला शासक, चाहे कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, अंततः स्वयं अपने ही पतन का कारण बनता है।

15

राजा पृथु का जन्म

पृथु का जन्म साधारण नहीं था, अपितु परम्परा में उन्हें भगवान विष्णु का अंशावतार माना जाता है, जो विशेष रूप से अपने पिता वेन के कुशासन से उत्पन्न अव्यवस्था को ठीक करने के लिए प्रकट हुए। उनके जन्म के समय समस्त प्रकृति ने शुभ संकेत प्रदर्शित किए — आकाश से पुष्पवर्षा हुई, दिव्य संगीत बजा, नदियाँ स्वच्छ जल से भर गईं, और समस्त देवगण उनके दर्शन हेतु उपस्थित हुए।

पृथु के साथ ही उनकी बहन अर्ची का भी जन्म हुआ, जो स्वयं देवी लक्ष्मी का अंश थीं, और आगे चलकर पृथु की पत्नी बनीं। सूत, मागध और वंदी नामक बंदीजनों ने, जिनका पैतृक कार्य राजाओं की प्रशंसा गाना था, उस पवित्र अवसर पर उपस्थित होकर स्तुति-गान आरम्भ किया।

देवताओं और ऋषियों ने मिलकर पृथु को विभिन्न दिव्य अस्त्र-शस्त्र, कवच और आशीर्वाद प्रदान किए — इंद्र ने मुकुट, वरुण ने छत्र, यमराज ने दंड, कुबेर ने स्वर्ण-मुद्राएँ, और स्वयं ब्रह्माजी ने अभयदान दिया — यह जानते हुए कि उन्हें शीघ्र ही एक अत्यंत कठिन कार्य, पृथ्वी को उसकी खोई हुई समृद्धि लौटाने का कार्य, करना होगा, जो उनके पिता के अधर्मी शासन के कारण भयभीत होकर अपनी संपदा छिपाकर चली गई थी।

पृथु के जन्म के समाचार से सम्पूर्ण राज्य में उल्लास की लहर दौड़ गई, क्योंकि वर्षों की अराजकता और भय के पश्चात् प्रजा को एक ऐसा शासक मिलने की आशा जगी जो न केवल शक्तिशाली अपितु धर्मपरायण भी होगा।

सूत गोस्वामी ने शौनक ऋषि को समझाया कि पृथु की यह कथा इस बात का प्रत्यक्ष उदाहरण है कि कैसे एक ही वंश में अधर्म और धर्म दोनों जन्म ले सकते हैं, और कैसे भगवान स्वयं, जब आवश्यकता पड़े, ऐसे अवसरों पर पृथ्वी और धर्म की रक्षा हेतु मानव रूप में अवतरित होते हैं, चाहे उनका प्राकट्य कितने ही असामान्य ढंग से क्यों न हो।

इस अध्याय की शिक्षा

भगवान, आवश्यकता पड़ने पर, अधर्म से उत्पन्न अराजकता को समाप्त करने के लिए असाधारण, अप्रत्याशित परिस्थितियों में भी अवतरित होते हैं।

16

पृथु का राज्याभिषेक और स्तुति

पृथु के राज्याभिषेक के समय, समस्त देवगण, ऋषि, गंधर्व, सिद्ध और चारण वहाँ उपस्थित हुए। यह विशाल समारोह इतना भव्य था कि इससे पूर्व किसी राजा के राज्याभिषेक में इतने देवताओं की उपस्थिति नहीं देखी गई थी।

सूत और मागध जाति के बंदीजनों ने, जिनका वंश-परम्परागत कार्य राजाओं की प्रशस्ति गाना था, पृथु के समक्ष उपस्थित होकर उनकी स्तुति करने का प्रयास किया, किंतु आश्चर्यजनक रूप से वे मौन रह गए — क्योंकि पृथु ने अभी तक कोई ऐसा कार्य नहीं किया था जिसकी प्रशंसा की जा सके, और झूठी प्रशंसा करना उनके सिद्धांतों के विरुद्ध था।

यह मौन देखकर, स्वयं भगवान ने, अपनी दिव्य प्रेरणा द्वारा, इन बंदीजनों की वाणी को सक्षम बनाया, और उन्होंने पृथु के भावी शासनकाल के गुणों की भविष्यवाणी करते हुए एक अद्भुत, भविष्यसूचक स्तुति गाई — इस बात की पुष्टि करते हुए कि पृथु अपने राज्य में न्याय, समृद्धि और धर्म की स्थापना करेंगे, पृथ्वी को दुहेंगे, और प्रजा के हितों को अपने स्वयं के हितों से सदैव ऊपर रखेंगे।

इस भविष्यवाणी को सुनकर पृथु ने अत्यंत विनम्रता से उत्तर दिया कि वे इन प्रशंसाओं के योग्य बनने का पूर्ण प्रयास करेंगे, और यह कि एक राजा का सच्चा गौरव प्रजा की सेवा और उनके कल्याण में ही निहित है, न कि सत्ता के दंभ में।

अपने राज्याभिषेक के प्रथम कार्य के रूप में ही उन्होंने यह घोषणा की कि वे पृथ्वी की उस विकट समस्या का समाधान करेंगे जिसके कारण प्रजा भुखमरी और अभाव से पीड़ित थी, क्योंकि पृथ्वी अपनी सम्पूर्ण उर्वरता और अन्न-संपदा छिपाए बैठी थी — एक घोषणा जो अगले अध्याय की कथा का आधार बनती है।

इस अध्याय की शिक्षा

एक आदर्श राजा की प्रशंसा केवल उसके पद से नहीं, अपितु उसके भावी कार्यों और गुणों की आशा से उपजती है — सच्चा सम्मान अर्जित किया जाता है, ग्रहण नहीं किया जाता।

17

पृथु द्वारा पृथ्वी को दंडित करना

अपने राज्याभिषेक के पश्चात्, पृथु ने पाया कि पृथ्वी, जो अपने पिता वेन के कुशासन के भय से अपनी सम्पूर्ण उर्वरता, बीज और संपदा छिपाकर चली गई थी, अब भी, वेन की मृत्यु के पश्चात् भी, अपने अन्न-भंडार को उजागर करने को तैयार नहीं थी, जिससे प्रजा में भीषण अकाल, कुपोषण और भुखमरी व्याप्त थी और लोग त्राहि-त्राहि कर रहे थे।

क्रोधित होकर, पृथु ने अपना दिव्य धनुष उठाया और पृथ्वी का पीछा किया, जो अपनी रक्षा में एक गाय का रूप धारण कर वेग से भागने लगी। पृथु, अपने रथ पर सवार होकर, इस दिव्य गौ-रूपी पृथ्वी का स्वर्ग, पाताल और मृत्युलोक — तीनों लोकों में पीछा करते रहे, जब तक कि थककर, हांफते हुए, पृथ्वी अंततः रुक गई।

भयभीत और असहाय पृथ्वी ने अंततः पृथु से करबद्ध होकर क्षमा माँगते हुए समझाया कि उसने अपनी संपदा इसलिए छिपाई थी क्योंकि वेन जैसे पूर्व के अधर्मी शासकों ने उसका निरंतर दुरुपयोग किया, बिना उसकी उचित देखभाल या पोषण किए हुए उससे निरंतर लेते ही रहे, जिस कारण वह स्वयं को असुरक्षित और शोषित अनुभव करने लगी।

पृथु ने पृथ्वी की इस गहन व्यथा को समझा और सहानुभूतिपूर्वक सुना, किंतु साथ ही उसे यह भी स्पष्ट किया कि उसका इस प्रकार अपनी संपदा छिपाना समस्त निर्दोष प्रजा के लिए घोर अन्यायपूर्ण है, क्योंकि इससे उन लोगों को भी कष्ट भोगना पड़ रहा है जिन्होंने कोई अपराध नहीं किया।

उन्होंने पृथ्वी को दृढ़ आश्वासन दिया कि वे स्वयं एक धर्मपरायण शासक के रूप में उसकी पूर्ण रक्षा और उचित देखभाल करेंगे, यदि वह अपनी संपदा पुनः प्रकट करने को तैयार हो — इस प्रकार यह संवाद शासक और प्रजा (यहाँ प्रकृति के रूप में) के बीच पारस्परिक उत्तरदायित्व और विश्वास के एक गहन प्रतीक के रूप में प्रस्तुत होता है।

इस अध्याय की शिक्षा

शासक और प्रजा (या प्रकृति) के बीच पारस्परिक उत्तरदायित्व और विश्वास का सम्बन्ध ही सच्ची समृद्धि की नींव है — केवल माँग करना पर्याप्त नहीं।

18

पृथु द्वारा पृथ्वी का दोहन

पृथु के आश्वासन और उनकी धर्मपरायणता से संतुष्ट होकर, पृथ्वी ने अपनी संपदा पुनः प्रकट करने की सहमति दी, किंतु उसने एक शर्त रखी — उसे समतल किया जाए, क्योंकि पर्वतों और असमान भूभाग के कारण उसकी संपदा समान रूप से सभी प्राणियों तक नहीं पहुँच पाती थी। पृथु ने अपने दिव्य धनुष से पर्वतों के अग्रभागों को समतल भूमि की सीमा तक धकेला, जिससे विशाल मैदानों, ग्रामों और नगरों की स्थापना संभव हुई।

इसके पश्चात्, भागवत पुराण के सर्वाधिक काव्यात्मक और सुंदर दृश्यों में से एक का वर्णन आता है — समस्त प्राणियों ने, अपने-अपने योग्य पात्र और अपने-अपने योग्य बछड़े को दुहने वाले के रूप में चुनकर, पृथ्वी-रूपी दिव्य गौ का दोहन किया। ऋषियों ने बृहस्पति को बछड़ा बनाकर वेद-ज्ञान का दोहन किया; देवताओं ने इंद्र को बछड़ा बनाकर अमृत और सोमरस का दोहन किया; पितरों ने यमराज को बछड़ा बनाकर श्राद्ध और स्वधा का दोहन किया।

असुरों ने प्रह्लाद को बछड़ा बनाकर मदिरा का दोहन किया लौह-पात्र में; नागों ने तक्षक को बछड़ा बनाकर विष का दोहन किया; पशु-पक्षियों ने अपने-अपने बछड़ों के माध्यम से घास और चारा प्राप्त किया; और स्वयं मनुष्यों ने राजा पृथु को ही बछड़ा बनाकर, स्वर्ण-पात्र में, अन्न, कृषि-उत्पाद और सम्पूर्ण भौतिक समृद्धि का दोहन किया — प्रत्येक प्राणी को उसकी आवश्यकतानुसार यथोचित पोषण प्राप्त हुआ।

इस अद्भुत, सर्वव्यापी दोहन के परिणामस्वरूप, पृथ्वी पुनः समृद्ध हो उठी, अन्न-भंडार भर गए, वृक्ष फलों से लद गए, और पृथु के धर्मपरायण शासन में प्रजा सुख-समृद्धि से जीने लगी। इसी घटना के कारण पृथ्वी को "पृथ्वी" अर्थात् पृथु से सम्बद्ध नाम प्राप्त हुआ, तथा वह "वसुंधरा" — समस्त संपदा को धारण करने वाली — भी कहलाई।

शुकदेव ने परीक्षित को समझाया कि यह कथा केवल एक प्राचीन ऐतिहासिक घटना नहीं, अपितु एक सार्वभौमिक और शाश्वत सत्य है — कि प्रकृति अपनी संपदा उन्हीं को उदारता से देती है, जो उसकी उचित देखभाल, सम्मान और संरक्षण करते हैं, और जो शासक इस उत्तरदायित्व को निभाते हैं, वे ही सच्चे अर्थों में प्रजा के पिता कहलाने योग्य होते हैं।

इस अध्याय की शिक्षा

प्रकृति अपनी संपदा उन्हीं को उदारता से देती है जो उसकी उचित देखभाल, सम्मान और संरक्षण करते हैं — यह सत्य आज भी उतना ही प्रासंगिक है।

19

पृथु के सौ अश्वमेध यज्ञ; इंद्र द्वारा अश्व-चोरी

पृथु ने अपने धर्मपरायण शासन के दौरान, अपनी कृतज्ञता और वैभव को भगवान के चरणों में समर्पित करने हेतु, सौ अश्वमेध यज्ञ करने का महान संकल्प लिया, यह मानते हुए कि इससे उनकी प्रजा और सम्पूर्ण राज्य को और अधिक समृद्धि तथा दिव्य आशीर्वाद प्राप्त होगा।

जैसे-जैसे उनके यज्ञ, एक के बाद एक, पूर्णता की ओर बढ़ते गए, स्वर्ग के राजा इंद्र, यह आशंकित होकर कि पृथु के सौ यज्ञ पूर्ण होने पर उनकी बढ़ती शक्ति और पुण्य उनके स्वयं के इंद्र-पद को चुनौती दे सकते हैं, ईर्ष्यावश निन्यानवेवें यज्ञ के पवित्र अश्व को गुप्त रूप से चुरा ले गए।

पृथु के ज्येष्ठ पुत्र विजिताश्व, जो यज्ञ के अश्व की रक्षा कर रहे थे, इंद्र का तीव्रता से पीछा करने लगे। किंतु इंद्र ने अपनी मायावी शक्ति से एक वल्कल-धारी, जटाजूटधारी साधु का वेश धारण कर लिया, जिस कारण विजिताश्व, धर्मसंकट में पड़कर — क्योंकि एक साधु प्रतीत होने वाले व्यक्ति पर आक्रमण करना घोर पाप माना जाता — हिचकिचाए और इंद्र अश्व सहित अंतर्ध्यान हो गए।

यह घटना बार-बार दोहराई गई — इंद्र बार-बार भिन्न-भिन्न वेश धारण कर अश्व चुरा ले जाते, और प्रत्येक बार वेश की पवित्रता के कारण पृथु के सैनिक असमंजस में पड़ जाते। यह प्रसंग आगे चलकर इस बात का प्रतीक बना कि पाखंड और छद्म वेश धारण करना असुरों और यहाँ तक कि देवताओं की भी एक सामान्य किंतु निंदनीय युक्ति है, जिससे धर्मात्मा भी कभी-कभी भ्रमित हो जाते हैं।

यह घटना पृथु के लिए एक गहन परीक्षा बनी — क्या उन्हें इंद्र के इस अन्यायपूर्ण कृत्य का प्रतिशोध लेना चाहिए, भले ही इसके लिए स्वयं देवराज से युद्ध करना पड़े, और क्या सौवें यज्ञ को पूर्ण करने का हठ इतना आवश्यक है कि इसके लिए स्वर्ग और पृथ्वी के बीच युद्ध छेड़ दिया जाए? यह प्रश्न अगले अध्याय में भगवान विष्णु के प्रत्यक्ष हस्तक्षेप और चार कुमारों के साथ पृथु की दिव्य भेंट द्वारा हल होता है।

इस अध्याय की शिक्षा

अहंकार और असुरक्षा की भावना सबसे शक्तिशाली को भी अनुचित कार्य करने पर विवश कर सकती है — इंद्र की ईर्ष्या इसी मानवीय (और दैवीय) दुर्बलता को दर्शाती है।

20

विष्णु का हस्तक्षेप और चार कुमारों से भेंट

इंद्र द्वारा बार-बार अश्व-चोरी किए जाने और अपने पुत्र विजिताश्व के धर्मसंकट से क्षुब्ध होकर, पृथु ने अंततः स्वयं इंद्र से युद्ध करने का निश्चय लिया और अपना धनुष उठाकर स्वर्ग की ओर प्रस्थान करने को तत्पर हुए। उनके ऋषि-पुरोहितों ने भी क्रोधवश एक अनुष्ठान आरम्भ किया जिससे एक द्वितीय इंद्र उत्पन्न हो सके।

किंतु जैसे ही यह संघर्ष अत्यंत गंभीर रूप लेने वाला था और सृष्टि-व्यवस्था के लिए संकट उत्पन्न होने लगा, स्वयं भगवान विष्णु ने प्रत्यक्ष हस्तक्षेप किया। उन्होंने दोनों पक्षों — पृथु और इंद्र — के बीच स्वयं मध्यस्थता कर शांति स्थापित की, यह समझाते हुए कि यह अनावश्यक संघर्ष किसी के हित में नहीं है, और चूँकि पृथु पहले ही निन्यानवे यज्ञों से अपनी धर्मपरायणता और महानता पूर्णतः सिद्ध कर चुके हैं, अतः सौवें यज्ञ के हठ की अब कोई आवश्यकता नहीं। भगवान ने स्वयं इंद्र और पृथु को परस्पर मित्रता में बाँध दिया।

इसी शुभ अवसर पर, चार कुमार — सनक, सनन्दन, सनातन और सनत्कुमार — जो ब्रह्माजी के मानस-पुत्र, नित्य पाँच वर्ष की आयु वाले, गहन ज्ञान और वैराग्य से संपन्न महान ऋषि थे, आकाश-मार्ग से पृथु के दरबार में पधारे। उनके तेज से सम्पूर्ण सभा दैदीप्यमान हो उठी।

पृथु ने, उनके आगमन को पहचानते ही, तुरन्त अपने सिंहासन से उठकर, साष्टांग प्रणाम कर, उनका अत्यंत सम्मानपूर्वक स्वागत किया, उन्हें उच्च आसन प्रदान किया, उनके चरण धोए, और विनम्रतापूर्वक हाथ जोड़कर उनसे आध्यात्मिक ज्ञान प्रदान करने की हार्दिक प्रार्थना की।

कुमारों ने, पृथु की इस असाधारण विनम्रता, सच्ची जिज्ञासा और भौतिक ऐश्वर्य के होते हुए भी अहंकार-रहित स्वभाव से अत्यंत प्रसन्न होकर, उन्हें आत्मा, भक्ति और मुक्ति के गहनतम रहस्यों का उपदेश देना आरम्भ किया — एक ऐसा उपदेश जो अगले अध्यायों में पृथु द्वारा अपनी प्रजा को दिए गए शिक्षाओं का सुदृढ़ आधार बनता है।

इस अध्याय की शिक्षा

जब कोई विवाद अनावश्यक विनाश की ओर बढ़ने लगे, तो विनम्रता और उच्च मार्गदर्शन को स्वीकार करना ही सच्ची बुद्धिमत्ता है, हठ नहीं।

21

पृथु का अपनी प्रजा को उपदेश

चार कुमारों से प्राप्त गहन ज्ञान से समृद्ध होकर, पृथु ने अपने राज्य की सम्पूर्ण प्रजा को एक विशाल सभा में एकत्रित किया और उन्हें एक अत्यंत गहन उपदेश दिया। उन्होंने समझाया कि एक राजा का सच्चा कर्तव्य केवल भौतिक समृद्धि, सुरक्षा और अन्न प्रदान करना नहीं, अपितु प्रजा को धर्म और भक्ति के मार्ग पर भी अग्रसर करना है।

उन्होंने प्रजा को स्मरण कराया कि सांसारिक सुख-समृद्धि, धन-वैभव और सत्ता, चाहे कितनी भी विशाल क्यों न हो, अंततः क्षणभंगुर है और मृत्यु के समय साथ नहीं जाती, जबकि सच्चा और स्थायी कल्याण केवल भगवद्भक्ति में ही निहित है, जो आत्मा को जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त करती है।

पृथु ने अपने स्वयं के जीवन का उदाहरण देते हुए कहा कि उन्होंने अपने राज्य के सुशासन, पृथ्वी के दोहन और यज्ञों के आयोजन को भी भगवद्भक्ति का ही एक रूप माना है — क्योंकि कर्म का त्याग आवश्यक नहीं, अपितु कर्म को भगवद्-अर्पण भाव से करना ही सच्चा वैराग्य है।

उन्होंने प्रजा को यह भी सिखाया कि गुरु और साधु-संतों की सेवा, सत्संग में समय व्यतीत करना, और निरंतर भगवद्-कथा का श्रवण-कीर्तन करना, प्रत्येक गृहस्थ के लिए भी सुलभ और अनिवार्य साधन हैं, चाहे वह कितना भी व्यस्त क्यों न हो।

इस उपदेश ने पृथु के राज्य में एक नई आध्यात्मिक जागृति उत्पन्न की, जहाँ प्रजा न केवल भौतिक समृद्धि अपितु आध्यात्मिक उन्नति की ओर भी अग्रसर हुई। यह अध्याय इस बात का प्रत्यक्ष उदाहरण है कि कैसे एक आदर्श शासक अपनी शक्ति और प्रभाव का उपयोग केवल राजनीतिक स्थिरता के लिए नहीं, अपितु प्रजा के सम्पूर्ण आध्यात्मिक कल्याण के लिए भी कर सकता है।

इस अध्याय की शिक्षा

एक आदर्श शासक प्रजा को केवल भौतिक समृद्धि नहीं, अपितु धर्म और भक्ति के मार्ग पर भी अग्रसर करता है — यही राज्य-धर्म की पूर्णता है।

22

सनत्कुमार द्वारा पृथु को उपदेश

इस अध्याय में सनत्कुमार, चार कुमारों में सबसे वरिष्ठ, पृथु को एक बार पुनः, अत्यंत विस्तार और गहनता से, आध्यात्मिक शिक्षा प्रदान करते हैं। उन्होंने भक्तियोग की सर्वोच्चता, आत्मा और परमात्मा के शाश्वत सम्बन्ध, तथा भौतिक संसार के मोह-जाल से मुक्ति के विविध मार्गों का विस्तार से वर्णन किया।

सनत्कुमार ने विशेष रूप से इस बात पर बल दिया कि एक राजा के लिए सबसे बड़ी परीक्षा यह है कि वह अपार शक्ति, संपदा और प्रजा की स्तुतियों के मध्य रहते हुए भी विनम्र और भगवद्भक्ति में अटल स्थिर रहे — क्योंकि सत्ता और सम्मान ही सबसे बड़े प्रलोभन हैं जो साधक को पथभ्रष्ट कर सकते हैं।

उन्होंने पृथु को यह भी सिखाया कि सच्चा वैराग्य वस्तुओं के भौतिक त्याग में नहीं, अपितु आसक्ति-रहित होकर, फल की इच्छा त्यागकर, अपने कर्तव्यों का पालन करने में निहित है — एक शिक्षा जो पृथु ने अपने संपूर्ण शासनकाल में गहराई से आत्मसात् की, और जिसके कारण वे राजसत्ता के मध्य रहते हुए भी एक सच्चे संत के समान जीवन व्यतीत कर सके।

सनत्कुमार ने पंचरात्र सिद्धांत और भगवान की सृष्टि, स्थिति तथा संहार करने वाली त्रिविध शक्तियों का भी वर्णन किया, यह स्पष्ट करते हुए कि किस प्रकार एक साधक इन शक्तियों को समझकर अपने मन को भगवद्-चिंतन में स्थिर कर सकता है।

इस गहन उपदेश से पृथु का हृदय पूर्णतः शुद्ध और भक्ति से परिपूर्ण हो गया। उन्होंने सनत्कुमार के प्रति गद्गद होकर गहरी कृतज्ञता व्यक्त की, और यह दृढ़ संकल्प लिया कि वे अपने शेष जीवन को इसी शिक्षा के पूर्ण अनुरूप जिएंगे — एक ऐसा संकल्प जो उनके जीवन के अंतिम अध्याय, उनके वैराग्य और शरीर-त्याग, का सुदृढ़ आधार बनता है।

इस अध्याय की शिक्षा

सबसे बड़ी परीक्षा शक्ति और संपदा के मध्य भी विनम्र और भगवद्भक्ति में स्थिर रहना है — सच्चा वैराग्य त्याग में नहीं, अनासक्ति में निहित है।

23

पृथु का वैराग्य और शरीर-त्याग

दीर्घकाल तक धर्मपरायण शासन करने के पश्चात्, जब पृथु को आभास हुआ कि उनका सांसारिक कर्तव्य पूर्ण हो चुका है और उनकी संतानें राज्य संभालने योग्य हो चुकी हैं, उन्होंने अपने पुत्रों को समस्त राज्य सौंपकर स्वयं वानप्रस्थ आश्रम की ओर प्रस्थान करने का दृढ़ निश्चय किया।

अपनी परम पतिव्रता पत्नी अर्ची के साथ, जो स्वयं देवी लक्ष्मी का अंश थीं, वे पुलहाश्रम के वन में जाकर कठोर तपस्या में लीन हो गए। उन्होंने साधारण फल-मूल का आहार लिया, फिर धीरे-धीरे उपवास बढ़ाते गए, और अपने मन को पूर्णतः इंद्रिय-विषयों से हटाकर एकाग्रचित्त होकर भगवद्-ध्यान में स्थिर किया।

पृथु ने अपने शेष जीवन को पूर्णतः भगवद्-ध्यान में समर्पित कर दिया, धीरे-धीरे भौतिक शरीर के प्रति समस्त आसक्ति को क्रमिक रूप से त्यागते हुए। शुकदेव ने वर्णन किया कि किस प्रकार पृथु, अपनी दीर्घकालिक और अनुशासित साधना के माध्यम से, प्राणायाम की उच्चतम विधियों द्वारा, अंततः अपने प्राणों को ब्रह्मरंध्र में स्थिर कर अपने शरीर को इस प्रकार त्याग सके जैसे एक सर्प अपनी पुरानी केंचुली सहज ही त्याग देता है — बिना किसी पीड़ा, भय या मोह के, पूर्ण शांति और आनंद के साथ।

उनकी पत्नी अर्ची, जो अपने पति की भक्ति, वैराग्य और तपस्या से गहराई से प्रभावित थीं और जिन्होंने स्वयं भी उनके साथ समान तप किया था, उन्होंने भी अपने पति के शरीर-त्याग के पश्चात्, उन्हीं के पद-चिन्हों पर चलते हुए, पूर्ण संतोष और भक्ति के साथ अपना शरीर त्याग दिया, और दोनों वैकुण्ठ धाम को प्राप्त हुए।

इस प्रकार, पृथु की कथा, जो अपने पिता वेन के अधर्म और अराजकता के निवारण से आरम्भ हुई थी, पूर्ण वैराग्य, भक्ति और मुक्ति के साथ समाप्त होती है — एक आदर्श राजा, आदर्श भक्त और आदर्श मनुष्य के जीवन का सम्पूर्ण, सुसंगत चक्र, जो आज भी प्रत्येक शासक और गृहस्थ के लिए एक अनुकरणीय आदर्श प्रस्तुत करता है।

इस अध्याय की शिक्षा

एक पूर्ण जीवन वही है जो अधर्म के निवारण से आरम्भ होकर, पूर्ण वैराग्य और भक्ति में समाप्त हो — पृथु का जीवन इस पूर्णता का आदर्श प्रस्तुत करता है।

24

मैत्रेय द्वारा गाया गया स्तोत्र (प्राचेतसों की कथा का आरम्भ)

पृथु की कथा पूर्ण करने के पश्चात्, मैत्रेय ऋषि ने विदुर को प्राचेतस नामक दस राजकुमारों की कथा सुनानी आरम्भ की, जो प्रियव्रत के वंश में, राजा प्राचीनबर्हि के पुत्रों के रूप में आगे चलकर जन्मे थे। इन दस भाइयों ने, अपने पिता के आदेश पर, प्रजा की वृद्धि हेतु एक दीर्घ और कठिन तपस्या करने का निश्चय किया।

तपस्या के मार्ग पर समुद्र-तट की ओर जाते हुए, उन्होंने एक विशाल, स्वच्छ जलाशय पाया, जिसके जल में कमल खिले हुए थे, और जहाँ से एक अद्भुत, हृदयस्पर्शी दिव्य संगीत सुनाई दे रहा था, मानो कोई गंधर्व वीणा बजा रहा हो। जिज्ञासु होकर, उन्होंने इस मधुर संगीत का स्रोत खोजना आरम्भ किया।

खोजते हुए उन्होंने पाया कि स्वयं भगवान शिव, अपने गणों से घिरे हुए, वहाँ ध्यानमग्न बैठे थे, और यह दिव्य संगीत उनकी ही स्तुति में गंधर्वों द्वारा गाया जा रहा था। राजकुमार इस अद्भुत, तेजस्वी दृश्य को देखकर स्तब्ध रह गए, और अत्यंत श्रद्धा के साथ शिव के समक्ष नतमस्तक हुए।

शिव ने, इन युवा राजकुमारों की सहज भक्ति-भावना, विनम्रता और गहन जिज्ञासा को देखकर अत्यंत प्रसन्न होकर, उन्हें अपने समीप स्नेहपूर्वक बुलाया और उन्हें एक गहन आध्यात्मिक उपदेश देने का निश्चय किया, यह कहते हुए कि उनकी यह भेंट कोई संयोग नहीं, अपितु पूर्वजन्मों के पुण्य का फल है।

यह उपदेश अगले अध्याय में विस्तार से वर्णित होता है, और यह भागवत पुराण के सबसे गहन, काव्यात्मक और दार्शनिक अंशों में से एक माना जाता है, जिसे परम्परा में "रुद्रगीता" के नाम से जाना जाता है।

इस अध्याय की शिक्षा

भक्ति से भरा हृदय स्वयं भगवान को भी आकर्षित कर लेता है — प्राचेतसों की तपस्या और उनकी भक्ति-भावना ने उन्हें स्वयं शिव के दर्शन का सौभाग्य दिया।

25

शिव का प्राचेतसों को उपदेश

भगवान शिव ने प्राचेतस राजकुमारों को एक अत्यंत गहन, सुंदर और मधुर स्तोत्र सिखाया, जिसे "रुद्रगीता" के नाम से जाना जाता है, जिसमें उन्होंने भगवान विष्णु की अनंत महिमा, उनके विराट रूप, और उनकी सर्वव्यापकता का विस्तृत वर्णन किया।

शिव ने अत्यंत विनम्रता से समझाया कि यद्यपि वे स्वयं महादेव, तीनों लोकों के संहारक कहलाते हैं, तथापि उनकी सबसे गहन, अटूट भक्ति भी अंततः भगवान विष्णु के चरण-कमलों में ही समर्पित है, और वे स्वयं वैष्णवों में श्रेष्ठ माने जाते हैं — "वैष्णवानां यथा शम्भुः"।

शिव ने राजकुमारों को यह भी सिखाया कि सच्ची भक्ति में कोई मौलिक भेदभाव नहीं होता — चाहे कोई शिव का भक्त हो या विष्णु का, यदि उसकी भक्ति निश्छल, सच्ची और अहंकार-रहित है, तो वह अंततः उसी परम सत्य तक पहुँचती है, क्योंकि शिव और विष्णु में कोई मौलिक भेद नहीं, वे एक ही तत्त्व के दो प्रकटीकरण हैं।

यह शिक्षा इस बात का सुदृढ़ प्रमाण है कि भागवत पुराण में शैव और वैष्णव परंपराओं के बीच कोई मौलिक विरोध नहीं दर्शाया गया, अपितु दोनों को एक ही सत्य के पूरक और परस्पर सम्मानित रूप में प्रस्तुत किया गया है, जो सांप्रदायिक संकीर्णता से सर्वथा परे है।

इस उपदेश से गहराई से प्रेरित होकर, प्राचेतस राजकुमारों ने अपनी तपस्या और अधिक दृढ़ता से जारी रखी, और दीर्घकाल पश्चात् अंततः भगवान विष्णु का साक्षात् दर्शन प्राप्त किया, जिन्होंने प्रसन्न होकर उन्हें आशीर्वाद दिया और उनकी भावी संतानों तथा राज्य-कार्य के विषय में शुभ भविष्यवाणी की — इस प्रकार उनकी दीर्घ तपस्या पूर्ण हुई, और वे अपने पिता के राज्य की ओर लौटने की तैयारी करने लगे।

इस अध्याय की शिक्षा

सच्ची भक्ति में शैव और वैष्णव परंपराओं के बीच कोई मौलिक भेद नहीं — निश्छल भक्ति, चाहे किसी भी रूप में हो, अंततः उसी परम सत्य तक पहुँचाती है।

26

पुरंजन की कथा का आरम्भ

अपनी तपस्या पूर्ण कर, समुद्र-तट से लौटते समय, प्राचेतस राजकुमारों की भेंट देवर्षि नारद से हुई। मार्ग में नारद ने उन्हें एक अत्यंत गहन, काव्यात्मक रूपक-कथा सुनाई — राजा पुरंजन की कथा, जो मानव आत्मा की भौतिक संसार में उलझन और उसकी विस्मृति का एक अत्यंत सुंदर और मार्मिक प्रतीकात्मक चित्रण है।

नारद ने बताया कि प्राचीन काल में राजा पुरंजन थे, जिनका एक अभिन्न, सदा-जागृत मित्र था जिसका नाम अविज्ञात ("अज्ञात") था — यह मित्र वास्तव में परमात्मा का ही प्रतीक है, जो सदैव आत्मा के साथ रहता है किंतु प्रायः अनदेखा और अपरिचित ही रह जाता है। पुरंजन एक ऐसे निवास-स्थान की खोज में सम्पूर्ण पृथ्वी पर भटकते रहे जो उनकी सम्पूर्ण इच्छाओं के अनुकूल हो, किंतु कहीं भी संतोष न पा सके।

अंततः, हिमालय के दक्षिण में, भारतवर्ष नामक स्थान में, उन्होंने एक अत्यंत सुंदर, नौ-द्वारों वाला नगर पाया, जो स्वर्ण, रजत और मणियों से सुसज्जित था, चारों ओर उद्यानों और सरोवरों से घिरा हुआ था — यह नगर वास्तव में मानव शरीर का ही प्रतीक है, जिसके नौ द्वार शरीर के नौ प्राकृतिक छिद्रों (दो नेत्र, दो कान, दो नासिका-छिद्र, मुख, तथा दो निम्न द्वार) को दर्शाते हैं।

उस उद्यान में भ्रमण करते हुए, पुरंजन की भेंट एक अत्यंत सुंदर, यौवन से परिपूर्ण स्त्री से हुई, जो दस सेवकों और एक पाँच-फणों वाले सर्प से सुरक्षित थी — यह स्त्री वास्तव में बुद्धि का प्रतीक है, दस सेवक दस इंद्रियों के, और पाँच-फणों वाला सर्प जीवनी-शक्ति (प्राण) का, जो निरंतर, यहाँ तक कि निद्रा में भी, शरीर की रक्षा करता है।

पुरंजन, उस स्त्री के सौंदर्य से मुग्ध होकर, कामवश उससे प्रश्न पूछने लगे, और वह भी, अपने अतीत और मूल के विषय में कुछ न जानते हुए भी, उनसे विवाह करने को सहमत हो गई — इस प्रकार, ठीक वैसे ही जैसे एक आत्मा शरीर और इंद्रिय-सुखों में इतनी लीन हो जाती है कि वह अपनी वास्तविक, आध्यात्मिक प्रकृति को पूर्णतः विस्मृत कर देती है, पुरंजन उस नगर (शरीर) में बुद्धि (रानी) के साथ बस गए, धीरे-धीरे अपने सच्चे मित्र (परमात्मा) को भुलाते हुए।

इस अध्याय की शिक्षा

मानव शरीर एक नौ-द्वार वाले नगर के समान है, जिसमें आत्मा, इंद्रियों और मन के वशीभूत होकर, अपनी वास्तविक, आध्यात्मिक पहचान को भुला बैठती है।

27

पुरंजन की कथा (आगे का भाग)

नारद ने पुरंजन की कथा को आगे बढ़ाते हुए बताया कि किस प्रकार राजा पुरंजन, अपनी रानी (बुद्धि) के सम्पूर्ण प्रभाव में पूर्णतः खो गए, अपने राज्य के वास्तविक कर्तव्यों को भूलकर, केवल इंद्रिय-सुखों, भोग-विलास और सांसारिक मनोरंजन में ही लीन रहने लगे — रानी जो चाहती, वही पुरंजन भी करते, मानो वे स्वयं का कोई स्वतंत्र अस्तित्व ही न रखते हों।

उनका वह अभिन्न मित्र, अविज्ञात, निरंतर उनके साथ रहता, किंतु पुरंजन कभी उसकी ओर ध्यान नहीं देते थे — यह मित्र वास्तव में परमात्मा का ही प्रतीक है, जो आत्मा के साथ सदैव विराजमान रहता है, किंतु उसकी स्वतंत्र इच्छा और भोग-वासना में कभी बलपूर्वक हस्तक्षेप नहीं करता, केवल साक्षी बना रहता है।

समय बीतने के साथ, पुरंजन के राज्य पर चंडवेग नामक एक गंधर्व-राजा ने, अपनी तीन सौ साठ पत्नियों (वर्ष के दिनों का प्रतीक) सहित, आक्रमण किया — यह प्रतीकात्मक रूप से काल (समय) का ही रूप है, जो अनवरत, दिन-प्रतिदिन, अंततः प्रत्येक भौतिक उपलब्धि, यौवन और सुख को क्षीण कर नष्ट कर देता है। युद्ध में पुरंजन धीरे-धीरे पराजित होते गए, और उनका वह सुंदर नगर (शरीर) जीर्ण-शीर्ण होने लगा।

वृद्धावस्था के प्रतीक स्वरूप एक भयंकर सर्प-कन्या (जरा) भी इस काल-सेना के साथ प्रकट हुई, जिसने पुरंजन के शरीर को धीरे-धीरे जकड़ना आरम्भ किया। मृत्यु के समीप आने पर, पुरंजन को अपने जीवन भर की भूलों का धुँधला आभास होने लगा, किंतु तब तक बहुत विलंब हो चुका था।

वे अपने अंतिम, मरणासन्न क्षणों में भी अपनी रानी (मन) और सांसारिक संबंधों के विषय में ही व्याकुल और चिंतित रहे, न कि अपनी वास्तविक आध्यात्मिक स्थिति या अपने भुलाए हुए सच्चे मित्र के विषय में — यह गहराई से दर्शाते हुए कि कैसे आजीवन की गहन आसक्ति मृत्यु के अंतिम क्षण में भी आत्मा को भ्रमित और बद्ध रखती है, और उसकी अगली गति को निर्धारित करती है।

इस अध्याय की शिक्षा

समय (काल) अंततः प्रत्येक भौतिक उपलब्धि, यौवन और सुख को क्षीण कर देता है — जीवन भर की आसक्ति मृत्यु के समय भी आत्मा को भ्रमित रखती है।

28

पुरंजन का पुनर्जन्म और रानी की कथा

अपनी मृत्यु के पश्चात्, चूँकि पुरंजन का अंतिम विचार अपनी रानी के प्रति गहन आसक्ति और स्नेह से भरा हुआ था, भगवद्गीता के इस सिद्धांत के अनुसार कि "जो मनुष्य अंतकाल में जिस भाव का स्मरण करते हुए शरीर त्यागता है, वह उसी भाव को प्राप्त होता है," वे अगले जन्म में विदर्भ देश की एक राजकुमारी के रूप में, स्त्री-शरीर में जन्मे।

इस नए जन्म में भी, वे किसी राजा से विवाह करके पुनः उसी प्रकार के सांसारिक सुख-दुःख, पुत्र-मोह और गृहस्थ-आसक्ति के चक्र में फंस गए, जैसे पूर्व जन्म में फंसे थे — यह दर्शाते हुए कि केवल शरीर और लिंग बदल जाने से आत्मा के मूल भ्रम या बंधन में कोई अंतर नहीं आता।

नारद ने इस पुनर्जन्म की कथा को विस्तार से सुनाते हुए स्पष्ट किया कि आत्मा, जब तक अपनी वास्तविक, आध्यात्मिक प्रकृति को नहीं पहचानती और अपने भीतर विराजमान परमात्मा की ओर मुड़ती नहीं, तब तक वह बार-बार विभिन्न शरीरों, लिंगों और परिस्थितियों में जन्म लेती रहती है, प्रत्येक बार समान भ्रम, मोह और आसक्ति के जाल में नए सिरे से फंसती हुई।

इस स्त्री-जन्म में भी अंततः पति की मृत्यु और वैधव्य के गहन शोक ने उसे जीवन की नश्वरता पर गहन चिंतन करने को प्रेरित किया, और तभी संयोगवश उसकी भेंट पुनः एक ब्राह्मण से हुई, जो वास्तव में उसका वही भुला हुआ पुराना मित्र, अविज्ञात, था, जो अब उसे उसकी वास्तविक पहचान स्मरण कराने के लिए पुनः प्रकट हुआ था।

इस कथा के माध्यम से नारद ने प्राचेतस राजकुमारों को यह गहन शिक्षा दी कि भौतिक संसार में सुख-दुःख, विजय-पराजय, स्त्री-पुरुष, जन्म-मृत्यु का यह अंतहीन चक्र तब तक कभी नहीं टूटता जब तक आत्मा अपनी वास्तविक, आध्यात्मिक पहचान को पहचान कर परमात्मा की शरण नहीं लेती।

इस अध्याय की शिक्षा

मृत्यु के समय का विचार ही अगले जन्म की प्रकृति निर्धारित करता है — केवल शरीर या लिंग बदलने से आत्मा का मूल भ्रम या बंधन समाप्त नहीं होता।

29

नारद द्वारा रूपक-कथा की व्याख्या

इस अध्याय में नारद मुनि ने पुरंजन की सम्पूर्ण कथा का गूढ़ार्थ प्रकट किया, प्रत्येक प्रतीक को क्रमबद्ध रूप से स्पष्ट करते हुए। उन्होंने बताया कि नौ-द्वार वाला नगर मानव शरीर है; सुंदर रानी बुद्धि या मन है; दस सेवक दस इंद्रियाँ हैं; पाँच-फणों वाला सर्प जीवनी-शक्ति (प्राण) है; अनकहा, सदा-साथ रहने वाला मित्र अविज्ञात स्वयं परमात्मा या अंतरात्मा है; चंडवेग तथा उसकी तीन सौ साठ पत्नियाँ काल और वर्ष के दिन हैं; और नगर का क्रमिक विनाश शरीर की जरा तथा मृत्यु है।

नारद ने विशेष रूप से यह गहनता से समझाया कि आत्मा (पुरंजन), जो वास्तव में शुद्ध, नित्य चेतना है, अज्ञानवश स्वयं को शरीर और मन के साथ पूर्णतः एकाकार कर लेती है, यह भूलकर कि वह वास्तव में इस सबसे सर्वथा पृथक्, एक शुद्ध साक्षी मात्र है, जो शरीर के सुख-दुःख से अप्रभावित रहकर भी, अज्ञानवश उनसे बंधा हुआ अनुभव करती है। यही मूल भ्रम समस्त सांसारिक बंधन, दुःख और पुनर्जन्म का एकमात्र कारण है।

नारद ने यह भी स्पष्ट किया कि पुरंजन की भाँति, प्रत्येक जीव भी अपने-अपने शरीर-रूपी नगर का राजा है, और जब तक वह अपनी इंद्रियों और मन के वशीभूत होकर बाह्य भोगों में उलझा रहता है, तब तक वह अपने भीतर विराजमान उस सच्चे मित्र — परमात्मा — को न तो देख पाता है, न पहचान पाता है, चाहे वह मित्र कितना भी निकट और सदा-उपस्थित क्यों न हो।

इस गूढ़ रूपक के माध्यम से नारद ने प्राचेतसों को यह भी सिखाया कि सांसारिक जीवन का त्याग करना समाधान नहीं, अपितु सांसारिक जीवन जीते हुए भी अपने भीतर के उस साक्षी-चेतना को कभी विस्मृत न करना ही वास्तविक ज्ञान और मुक्ति का मार्ग है।

नारद ने प्राचेतसों को स्पष्ट रूप से समझाया कि इस भ्रम से मुक्ति का एकमात्र निश्चित उपाय है — अपने भीतर के उस अनकहे, सदा-साथ रहने वाले मित्र, अर्थात् परमात्मा, को श्रद्धापूर्वक पहचानना और उसकी पूर्ण शरण ग्रहण करना। जब तक आत्मा अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानकर परमात्मा के साथ अपने शाश्वत, नित्य सम्बन्ध को नहीं समझती, तब तक वह पुरंजन की भाँति ही जन्म-दर-जन्म, बार-बार भ्रम और दुःख के अंतहीन चक्र में फंसी रहेगी।

इस अध्याय की शिक्षा

जब तक आत्मा अपने भीतर विराजमान सच्चे मित्र, परमात्मा, को नहीं पहचानती, तब तक वह पुरंजन की भाँति ही जन्म-दर-जन्म भ्रम और दुःख में फंसी रहेगी।

30

प्राचेतसों की नारद से भेंट और उपदेश

पुरंजन की इस गहन रूपक-कथा और उसकी विस्तृत व्याख्या को सुनने के पश्चात्, प्राचेतस राजकुमारों का हृदय गहराई से प्रभावित और आलोड़ित हो उठा। उन्होंने नारद से आगे के आध्यात्मिक मार्गदर्शन की विनम्रतापूर्वक प्रार्थना की, यह जानते हुए भी कि उन्हें शीघ्र ही अपने पिता का विशाल राज्य संभालना है।

नारद ने उन्हें भक्तियोग के परम महत्त्व पर विस्तार से उपदेश दिया, यह समझाते हुए कि कैसे निरंतर भगवद्-स्मरण, नाम-कीर्तन और संतों की संगति के माध्यम से आत्मा, राजसी वैभव और सांसारिक उत्तरदायित्वों के मध्य रहते हुए भी, पुरंजन जैसी विस्मृति और भूलों से सुरक्षित रह सकती है।

नारद ने उन्हें यह भी स्पष्ट रूप से सिखाया कि सांसारिक कर्तव्यों — जैसे राज्य-शासन, विवाह या पारिवारिक उत्तरदायित्व — का त्याग करना आवश्यक नहीं है। यदि हृदय भगवद्-भक्ति में सुदृढ़ रूप से स्थिर रहे, तो आत्मा इन सभी कर्तव्यों का पालन करते हुए भी भौतिक बंधन से पूर्णतः मुक्त रह सकती है — यह शिक्षा विशेष रूप से प्राचेतसों के लिए अत्यंत प्रासंगिक थी, क्योंकि उन्हें अपने पिता के राज्य को शीघ्र ही संभालना था।

राजकुमारों ने नारद से यह भी पूछा कि जब भक्ति ही सर्वोच्च और सरलतम मार्ग है, तो लोग फिर भी कठिन यज्ञ, तप और अनुष्ठानों में क्यों उलझे रहते हैं। नारद ने उत्तर दिया कि यह मानव-स्वभाव की एक सामान्य दुर्बलता है, जिसमें सरल किंतु गहन मार्ग को छोड़कर जटिल किंतु सतही मार्गों की ओर आकर्षण बना रहता है, जब तक कि सच्चा विवेक जागृत न हो।

इस गहन उपदेश से आध्यात्मिक रूप से समृद्ध होकर, प्राचेतस राजकुमार अपने पिता प्राचीनबर्हि के राज्य की ओर लौट चले, यह दृढ़ संकल्प लेते हुए कि वे अपने आगामी शासनकाल में भक्ति और धर्म — दोनों का सामंजस्यपूर्ण, अविभाज्य पालन करेंगे, ठीक उसी प्रकार जैसे पूर्व-वर्णित पृथु महाराज ने अपने सम्पूर्ण जीवन में किया था।

इस अध्याय की शिक्षा

सांसारिक कर्तव्यों का त्याग किए बिना भी, यदि हृदय भगवद्-भक्ति में स्थिर रहे, तो आत्मा भौतिक बंधन से पूर्णतः मुक्त रह सकती है।

31

प्राचेतसों की संतान एवं चतुर्थ स्कन्ध का समापन

चतुर्थ स्कन्ध के इस अंतिम अध्याय में, शुकदेव ने परीक्षित को प्राचेतस राजकुमारों के भावी वंश का विस्तृत वर्णन सुनाया। राज्य लौटने पर, उन्होंने पाया कि उनकी दीर्घकालिक अनुपस्थिति में समस्त वन अनियंत्रित रूप से बढ़ गए थे और प्रजा के लिए कृषि-योग्य भूमि अपर्याप्त हो गई थी।

क्रोधित होकर, दस प्राचेतसों ने अपने मुख से अग्नि और वायु उत्पन्न कर वनों को जलाना आरम्भ किया, जिससे भयभीत होकर स्वयं वृक्षों के अधिपति सोम (चंद्रमा) उनके समक्ष प्रकट हुए और उन्हें शांत करते हुए कन्दु ऋषि की कन्या मारिषा का विवाह-प्रस्ताव रखा — मारिषा, जो स्वयं एक अद्भुत कथा के माध्यम से वृक्ष-योनि से जन्मी थीं, दसों प्राचेतसों की सम्मिलित पत्नी बनीं।

उनसे दक्ष नामक पुत्र उत्पन्न हुआ — वही दक्ष, जिनकी कथा इसी चतुर्थ स्कन्ध के आरम्भ में शिव के साथ उनके विवाद के रूप में वर्णित हुई थी, इस बार पुनः जन्मे, इस बार समृद्धि और सृजन के देवता के रूप में, जिन्हें ब्रह्माजी के आदेश पर सृष्टि को जनसंख्या से समृद्ध करने का महान कार्य सौंपा गया, और जिन्होंने अपनी अनेक पुत्रियों — जिनमें सती भी सम्मिलित थीं — के माध्यम से समस्त लोकों को भर दिया।

इस प्रकार, कथा-चक्र पूर्ण होता है — वही दक्ष, जिसका अभिमान इस स्कन्ध के आरम्भ में विनाश का कारण बना, अंततः अपने पुनर्जन्म में सृजन और समृद्धि का माध्यम बनता है, यह दर्शाते हुए कि समय और भगवद्-इच्छा के चक्र में कोई भी आत्मा स्थायी रूप से बद्ध नहीं रहती, अपितु शुद्धिकरण और परिवर्तन का अवसर सदैव उपलब्ध रहता है।

इस प्रकार चतुर्थ स्कन्ध, जिसमें दक्ष के अभिमान और पतन, सती के करुण बलिदान, ध्रुव की निश्छल बाल-भक्ति, पृथु के आदर्श शासन और वैराग्य, तथा पुरंजन की गहन रूपक-कथा जैसे विविध किंतु परस्पर गहराई से सम्बद्ध विषयों का अद्भुत समावेश है, समाप्त होता है। शुकदेव ने परीक्षित को स्मरण कराया कि इन सभी कथाओं का एक ही केंद्रीय, शाश्वत संदेश है — कि अभिमान अंततः विनाश की ओर ले जाता है, जबकि विनम्रता, निश्छल भक्ति और धर्मपरायणता ही सच्ची समृद्धि और अंततः परम मुक्ति का एकमात्र मार्ग है। इसी शिक्षा के साथ, कथा अब पंचम स्कन्ध की ओर अग्रसर होने को तैयार है, जहाँ ऋषभदेव और भरत महाराज की कथाएँ इसी विषय को और भी गहराई से उद्घाटित करेंगी।

इस अध्याय की शिक्षा

अभिमान अंततः विनाश की ओर ले जाता है, जबकि विनम्रता, भक्ति और धर्मपरायणता ही सच्ची समृद्धि और अंततः मुक्ति का मार्ग है — यही इस सम्पूर्ण स्कन्ध का सार है।