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पञ्चम स्कन्ध

पञ्चम स्कन्ध

प्रियव्रत-आग्नीध्र वंश, ऋषभदेव चरित्र, भरत की कथा एवं भूगोल-खगोल तथा नरक-वर्णन।

1

राजा प्रियव्रत का चरित्र और नारद का उपदेश

पंचम स्कन्ध का आरम्भ राजा प्रियव्रत की कथा से होता है, स्वायम्भुव मनु के पुत्र और ध्रुव के भाई, जिनका जीवन इस बात का एक अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत करता है कि कैसे एक आत्मा, सांसारिक कर्तव्यों में गहराई से संलग्न होते हुए भी, आध्यात्मिक उन्नति के मार्ग पर दृढ़ता से बनी रह सकती है।

प्रियव्रत, बाल्यकाल से ही, संसार से विरक्त होकर वन में तपस्या करने की प्रबल इच्छा रखते थे, इस विचार से कि सांसारिक शासन, राजसी वैभव और पारिवारिक जीवन अंततः आत्मा को बाँधने वाले बंधन ही हैं। जब उनके पितामह ब्रह्माजी ने उन्हें राज्य ग्रहण करने का आदेश दिया, तो प्रियव्रत ने इसे स्वीकार करने में हिचकिचाहट दिखाई, अपने वैराग्य को त्यागने में असमर्थ अनुभव करते हुए।

देवर्षि नारद, उनकी इस वैराग्यमय प्रवृत्ति को देखकर, स्वयं उनके पास पहुँचे और उन्हें एक गहन शिक्षा दी: उन्होंने समझाया कि त्याग केवल बाह्य रूप से कर्तव्यों को छोड़ने में नहीं, अपितु आंतरिक अनासक्ति में निहित है। एक राजा, जो अपने कर्तव्यों को बिना फल की इच्छा के, भगवद्-अर्पण भाव से निभाता है, वह उस साधु से कम वैरागी नहीं जो वन में तप करता है — अपितु, यदि उसका शासन प्रजा के कल्याण और धर्म की स्थापना के लिए हो, तो यह स्वयं एक उच्च आध्यात्मिक साधना बन जाता है।

नारद ने यह भी समझाया कि संसार से पलायन करना सदैव वैराग्य का प्रमाण नहीं होता — कभी-कभी यह भी एक सूक्ष्म अहंकार या भय का ही रूप हो सकता है। सच्चा वैरागी वह है जो कर्तव्यों के मध्य रहकर भी अपने मन को भगवद्-चरणों में स्थिर रख सके, ठीक वैसे ही जैसे कमल जल में रहकर भी उससे अछूता रहता है।

प्रियव्रत ने इस शिक्षा को गहराई से आत्मसात् किया, और, अपने पिता की आज्ञा तथा नारद के उपदेश के अनुसार, राज्य ग्रहण करने के लिए सहमत हुए। उन्होंने विश्वकर्मा की पुत्री बर्हिष्मती से विवाह किया, और अपने शासनकाल में ऐसी न्यायपूर्णता और तेज का प्रदर्शन किया कि कहा जाता है सूर्य की गति भी, जो पृथ्वी के एक अर्ध भाग को अंधकार में छोड़ देती थी, इससे असंतुष्ट होकर प्रियव्रत ने अपने तेजस्वी रथ से सात बार पृथ्वी की परिक्रमा की, जिसके पहिए के निशानों से सात समुद्र बने — इस प्रकार पृथ्वी की सात द्वीपों में विभाजित भौगोलिक संरचना की उत्पत्ति हुई, जिसका विस्तृत वर्णन इस स्कन्ध के आगामी अध्यायों में किया जाएगा।

इस अध्याय की शिक्षा

त्याग का सार बाह्य वस्तुओं को छोड़ने में नहीं, अपितु आंतरिक अनासक्ति में है — कर्तव्य-पालन और वैराग्य परस्पर विरोधी नहीं, एक ही यात्रा के दो चरण हो सकते हैं।

2

प्रियव्रत का दांपत्य जीवन और पुत्र

मैत्रेय ने विदुर को आगे बताया कि प्रियव्रत और बर्हिष्मती को दस पुत्र और एक पुत्री, ऊर्जस्वती, प्राप्त हुए। इनमें से तीन पुत्रों — कवि, महावीर और सवन — ने बाल्यकाल से ही आत्म-साक्षात्कार में गहरी रुचि दिखाई और वे आजीवन नैष्ठिक ब्रह्मचारी रहकर परमहंस-अवस्था को प्राप्त हुए, संसार के प्रति पूर्णतः उदासीन।

शेष सात पुत्रों — अग्नीध्र, इध्मजिह्व, यज्ञबाहु, महावीर, हिरण्यरेता, घृतपृष्ठ और मेधातिथि — ने अपने पिता से पृथ्वी के सातों द्वीपों का शासन प्राप्त किया, प्रत्येक अपने-अपने द्वीप का चक्रवर्ती राजा बना और वहाँ के निवासियों का पालन-पोषण करने लगा, प्रियव्रत की ही भाँति धर्मपूर्वक शासन करते हुए।

प्रियव्रत, दीर्घकाल तक इस प्रकार विशाल साम्राज्य पर शासन करने के पश्चात्, अंततः यह अनुभव करने लगे कि उनका सांसारिक कर्तव्य पूर्ण हो चुका है। उन्होंने अपने पुत्रों में राज्य को विभाजित किया और स्वयं वानप्रस्थ जीवन की ओर अग्रसर हुए, अपनी इंद्रियों को संयमित कर, गहन ध्यान में भगवद्-स्वरूप का चिंतन करते हुए, यह प्रदर्शित करते हुए कि नारद की प्रारंभिक शिक्षा — कि कर्तव्य-पालन और वैराग्य परस्पर विरोधी नहीं, अपितु एक ही आध्यात्मिक यात्रा के दो क्रमिक चरण हो सकते हैं — कितनी सत्य थी।

मैत्रेय ने इस बिंदु पर विदुर को यह भी बताया कि प्रियव्रत के इसी विशाल वंश में, उनके पुत्र अग्नीध्र से नाभि, और आगे चलकर, ऋषभदेव का जन्म हुआ — एक ऐसा राजा जो स्वयं भगवान के अवतार माने जाते हैं, और जिनका जीवन त्याग के सर्वोच्च आदर्श को प्रस्तुत करता है, एक कथा जो अगले अध्यायों में विस्तार से वर्णित होगी।

विदुर, इस वंशावली को सुनकर, विशेष रूप से यह जानने को उत्सुक हुए कि ऐसा कौन-सा असाधारण गुण था जिसके कारण ऋषभदेव, अन्य समस्त राजाओं में भगवान के अवतार के रूप में विशेष रूप से स्मरणीय हुए — इसी जिज्ञासा के उत्तर में मैत्रेय ने ऋषभदेव के जन्म की कथा आरम्भ की।

इस अध्याय की शिक्षा

एक आदर्श जीवन वह है जो कर्तव्य को पूर्ण निष्ठा से निभाकर, समय आने पर बिना मोह के त्याग की ओर बढ़े — प्रियव्रत का जीवन इसी संतुलन का उदाहरण है।

3

ऋषभदेव का जन्म

राजा नाभि, प्रियव्रत के वंशज और अग्नीध्र के पौत्र, दीर्घकाल तक संतानहीन रहने के कारण अत्यंत चिंतित थे। धर्म और वंश की निरंतरता के लिए उन्होंने ऋषियों के परामर्श से एक महान पुत्रेष्टि यज्ञ का आयोजन किया, जिसमें उन्होंने और उनकी पत्नी मेरुदेवी ने अत्यंत श्रद्धा के साथ यज्ञ-भाग अर्पित किया।

इस यज्ञ से प्रसन्न होकर, उपस्थित ऋषियों ने स्वयं भगवान विष्णु से यह प्रार्थना की कि वे स्वयं नाभि के पुत्र रूप में अवतरित हों, क्योंकि किसी सामान्य पुत्र से उनकी अपेक्षाओं की पूर्ति असंभव प्रतीत होती थी। भगवान ने ऋषियों की इस प्रार्थना को सहर्ष स्वीकार किया और वचन दिया कि वे स्वयं मेरुदेवी के गर्भ से जन्म लेंगे।

समय की पूर्णता में, मेरुदेवी ने एक ऐसे पुत्र को जन्म दिया जो जन्म से ही असाधारण तेज, बल और दिव्य लक्षणों से युक्त था — उसकी देह से ऐसी कांति निकलती थी कि सम्पूर्ण राजमहल प्रकाशित हो उठा। इस बालक का नाम ऋषभ रखा गया, क्योंकि वह गुणों में सर्वश्रेष्ठ, वृषभ अर्थात् सबसे उत्तम था।

ऋषभदेव बाल्यकाल से ही अद्भुत बल, बुद्धि और सौंदर्य से सम्पन्न थे, और बड़े होने पर उन्होंने इंद्र की पुत्री जयंती से विवाह किया। अपने पिता से राज्य प्राप्त कर, उन्होंने ऐसा शासन किया कि प्रजा उन्हें साक्षात् भगवान के रूप में पूजने लगी, क्योंकि उनके शासनकाल में सम्पूर्ण राज्य समृद्धि, न्याय और धर्म से परिपूर्ण हुआ।

ऋषभदेव और जयंती को सौ पुत्र प्राप्त हुए, जिनमें सबसे बड़े भरत थे — वही भरत जिनके नाम पर आगे चलकर यह सम्पूर्ण भूखंड भारतवर्ष कहलाया, तथा जिनकी अपनी कथा इस स्कन्ध के आगामी अध्यायों में विशेष रूप से वर्णित होगी।

इस अध्याय की शिक्षा

जब भक्तों की पुकार सच्ची हो, भगवान स्वयं उस परिवार में पुत्र-रूप में अवतरित होने में संकोच नहीं करते।

4

ऋषभदेव का शासन और उनके पुत्रों को उपदेश

ऋषभदेव ने अपने शासनकाल में प्रजा को धर्म, सदाचार और वेदोक्त कर्तव्यों का आदर्श उदाहरण प्रस्तुत किया। उनके राज्य में कोई भी दुखी, रोगी या असंतुष्ट नहीं था, क्योंकि स्वयं राजा का जीवन ही समस्त शुभ गुणों का साक्षात् प्रतिबिंब था।

दीर्घकाल तक इस प्रकार शासन करने के पश्चात्, जब ऋषभदेव को आभास हुआ कि उनका सांसारिक कर्तव्य पूर्ण हो चुका है, उन्होंने अपने समस्त पुत्रों को एकत्रित किया और उन्हें भागवत पुराण के सर्वाधिक उद्धृत उपदेशों में से एक दिया। उन्होंने समझाया कि यह मानव शरीर पशुओं की भाँति केवल भोजन, निद्रा, भय और मैथुन की खोज के लिए नहीं है — क्योंकि ये कार्य तो कुत्ते और शूकर भी करते हैं — अपितु यह तपस्या के माध्यम से आत्म-साक्षात्कार और भगवद्-प्राप्ति के लिए मिला एक दुर्लभ अवसर है।

उन्होंने अपने पुत्रों को स्मरण कराया कि जिस प्रकार एक पतंगा अंधकार में प्रकाश की चमक देखकर स्वयं को अग्नि में झोंक देता है, उसी प्रकार अज्ञानी मनुष्य क्षणिक इंद्रिय-सुखों के पीछे भागते हुए स्वयं को दुःख की अग्नि में झोंक देते हैं, बिना यह समझे कि सच्चा सुख केवल भगवद्भक्ति और तपस्या से ही प्राप्त होता है।

उन्होंने अपने ज्येष्ठ पुत्र भरत को राज्य सौंपा, और शेष निन्यानवे पुत्रों को विभिन्न क्षेत्रों का शासन प्रदान किया, कुछ को धार्मिक और तपस्वी जीवन के लिए विशेष रूप से प्रोत्साहित करते हुए, तथा नौ पुत्रों को द्रविड़ देश में भागवत-धर्म के प्रचार हेतु भेजा।

यह गहन उपदेश देने के पश्चात्, ऋषभदेव ने स्वयं राजसी जीवन और सम्पूर्ण भौतिक वैभव का पूर्णतः त्याग कर दिया, यह प्रदर्शित करते हुए कि एक राजा के लिए भी, चाहे वह कितना भी शक्तिशाली और सम्पन्न क्यों न हो, अंततः त्याग ही जीवन का सर्वोच्च और अनिवार्य लक्ष्य होना चाहिए।

इस अध्याय की शिक्षा

मानव जीवन पशुओं की भाँति केवल भोग के लिए नहीं, अपितु तपस्या और आत्म-साक्षात्कार के लिए मिला एक दुर्लभ अवसर है — ऋषभदेव का उपदेश यही सिखाता है।

5

ऋषभदेव का अवधूत जीवन और शरीर-त्याग

राज्य त्यागने के पश्चात्, ऋषभदेव ने एक अत्यंत असाधारण और विलक्षण मार्ग अपनाया। उन्होंने बाह्य रूप से एक उन्मत्त, जड़, मूक और अंधे व्यक्ति के समान आचरण करना आरम्भ किया — मौन रहते हुए, अस्वच्छ और अस्त-व्यस्त प्रतीत होते हुए, नग्न अवस्था में वन-वन भ्रमण करते हुए, और संसार के प्रति पूर्णतः उदासीन रहते हुए।

उन्होंने यह वेश जान-बूझकर धारण किया, ठीक इसलिए ताकि कोई भी उनकी बाह्य स्थिति देखकर उनकी आंतरिक पूर्णता और परमहंस-अवस्था का अनुमान न लगा सके, और लोग उन्हें एक चमत्कारी सिद्ध पुरुष मानकर पूजने-सम्मानित करने के बजाय, उनकी वास्तविक शिक्षा — कि सच्ची महानता बाह्य आडंबर में नहीं — को समझ सकें।

वे इस प्रकार भारतवर्ष के विभिन्न भागों में भ्रमण करते रहे, प्रशंसा और अपमान, सम्मान और तिरस्कार दोनों के प्रति पूर्णतः अनासक्त और समभाव रहते हुए, कभी-कभी अज्ञानी लोगों द्वारा पत्थर मारे जाने, थूके जाने या अपमानित किए जाने पर भी बिना किसी प्रतिक्रिया के आगे बढ़ते रहे, मानो वे एक चलती हुई मूर्ति हों।

अंततः, कोंकण, वेंकट और कुटक (आधुनिक कर्नाटक क्षेत्र) के वनों में भ्रमण करते हुए, उन्होंने अपने शरीर को इस प्रकार त्यागने का निश्चय किया जिससे कोई भी उनकी दिव्यता को न पहचान सके — उन्होंने अपने मुख में एक बाँस का टुकड़ा दबाकर उसे तीव्र वेग से घुमाया, जिससे वन में दावाग्नि प्रज्वलित हुई, और उसी अग्नि में उनका शरीर भस्म हो गया, बिना उन्हें किसी पीड़ा का अनुभव हुए, क्योंकि उन्होंने पहले ही वह सब कुछ प्राप्त कर लिया था जिसके लिए एक शरीर का उपयोग किया जा सकता है।

मैत्रेय ने विदुर को समझाया कि ऋषभदेव द्वारा स्थापित यह आदर्श — कि पूर्ण ज्ञान प्राप्त कर लेने पर भी शरीर के प्रति कोई गर्व या आसक्ति नहीं रखनी चाहिए — आगे चलकर अनेक सिद्ध पुरुषों द्वारा अनुसरण किया गया, और उनके पुत्र भरत के नाम पर, यह सम्पूर्ण भूखंड आज भी भारतवर्ष कहलाता है — यही यह उपमहाद्वीप, जहाँ हम सब निवास करते हैं।

इस अध्याय की शिक्षा

पूर्ण ज्ञान प्राप्त कर लेने पर भी शरीर या सम्मान के प्रति कोई आसक्ति नहीं रखनी चाहिए — सच्ची महानता बाह्य आडंबर में नहीं, आंतरिक पूर्णता में है।

6

राजा भरत का शासन और वन-गमन

भरत ने अपने पिता ऋषभदेव के आदर्शों का पूर्ण अनुसरण करते हुए महान भक्ति, न्याय और धर्मपरायणता के साथ शासन किया। उनका राज्य समृद्धि से परिपूर्ण रहा, और प्रजा उन्हें एक आदर्श, धर्मपरायण राजा के रूप में गहरा सम्मान देती थी। उनका विवाह विश्वरूप की पुत्री पंचजनी से हुआ, जिनसे उन्हें पाँच पुत्र प्राप्त हुए।

दीर्घकाल तक शासन करने के पश्चात्, अपने पिता की भाँति ही, भरत ने भी अनुभव किया कि राज्य के प्रति उनकी आसक्ति उन्हें आध्यात्मिक प्रगति से रोक रही है। उन्होंने अपने पुत्रों को राज्य सौंपकर सिंहासन त्याग दिया और गंडकी नदी के तट पर स्थित पुलह ऋषि के आश्रम में जाकर एकांत वन-तपस्या करने का निश्चय किया।

वहाँ, भरत प्रतिदिन नदी में स्नान कर, तुलसी और शालग्राम की पूजा कर, तथा भगवद्-मंत्रों का जप करते हुए, गहन ध्यान में लीन रहने लगे। उनकी दिनचर्या इतनी नियमित और अनुशासित थी कि निकटवर्ती पशु-पक्षी भी उनसे भयभीत न होकर उनके निकट स्वच्छंद विचरण करते थे, ऐसी शांति उनकी उपस्थिति में व्याप्त थी।

एक दिन, गहन ध्यान में लीन रहते हुए, भरत ने एक गर्भवती हिरणी को नदी-तट पर जल पीते देखा, जो अचानक निकट ही किसी सिंह की भयंकर दहाड़ सुनकर अत्यंत भयभीत हो उठी और भागते हुए नदी में कूद गई, जिससे उसका बच्चा समय से पूर्व ही जन्म ले बैठा, और वह स्वयं, इस आकस्मिक सदमे और थकान से, वहीं मृत्यु को प्राप्त हो गई।

करुणा से अभिभूत होकर, भरत ने उस अनाथ, असहाय हिरण के नवजात बच्चे को अपनी गोद में उठाया और उसे आश्रम में लाकर उसका पालन-पोषण करने लगे — एक निर्णय जो, अनजाने में ही, इस महान तपस्वी की सम्पूर्ण आध्यात्मिक साधना की दिशा को पूर्णतः बदल देने वाला था, जैसा कि अगले अध्याय में विस्तार से वर्णित है।

इस अध्याय की शिक्षा

करुणा से उत्पन्न आसक्ति भी, यदि असंयमित रहे, तो वर्षों की तपस्या को भटका सकती है — दयालुता में भी संतुलन और सजगता आवश्यक है।

7

भरत की मृगासक्ति

भरत ने उस हिरण के बच्चे को इतने वात्सल्य और स्नेह से पाला कि वह शीघ्र ही उनके साथ इतना घुल-मिल गया कि उनके साथ ही सोता, उनके साथ ही चरता, और उनकी अनुपस्थिति में व्याकुल होकर उन्हें ढूँढता फिरता। भरत भी उससे इतना स्नेह करने लगे कि पूजा, ध्यान, या भोजन के समय भी उनका मन उस मृग की सुरक्षा और भलाई की चिंता में ही उलझा रहता।

धीरे-धीरे, स्वयं भी न जानते हुए, उनका सम्पूर्ण ध्यान भगवद्-ध्यान से हटकर उस मृग के इर्द-गिर्द केंद्रित हो गया। जब कभी वह मृग वन में थोड़ी देर के लिए भी दिखाई न देता, भरत बेचैन होकर उसे खोजने निकल पड़ते, यह भूलते हुए कि उनका मूल उद्देश्य यहाँ आकर तपस्या और आत्म-साक्षात्कार करना था, न कि एक पशु का पालन-पोषण।

अन्य ऋषि भी इस परिवर्तन को देखकर चिंतित हुए और उन्होंने भरत को सचेत करने का प्रयास किया कि यह आसक्ति, चाहे करुणा से उत्पन्न हो, उनकी साधना के लिए हानिकारक सिद्ध हो सकती है — किंतु भरत, अपने स्नेह में इतने डूबे हुए थे कि इस चेतावनी को गंभीरता से न ले सके।

समय बीतने पर, जब वह मृग वृद्धावस्था के निकट, एक दिन वन में विचरण करते हुए कहीं खो गया या किसी दुर्घटना का शिकार हो गया, भरत का शोक असीम था — वे उसे पुकारते हुए, विलाप करते हुए, सम्पूर्ण वन में भटकते रहे, ठीक वैसे ही जैसे कोई पिता अपने खोए हुए पुत्र के लिए भटकता है।

इस शोक में इतने डूबे हुए कि उनकी अपनी मृत्यु के अंतिम क्षण में भी उनका विचार उसी मृग पर ही केंद्रित रहा — और चूँकि भगवद्गीता के सिद्धांत के अनुसार मृत्यु के समय के विचार के अनुसार ही अगला जन्म निर्धारित होता है, महान ऋषि-राजा भरत स्वयं अपने अगले जन्म में एक मृग के रूप में जन्मे। यह कथा इस गहन शिक्षा का एक अत्यंत शक्तिशाली उदाहरण है कि कितनी सूक्ष्म आसक्ति भी, यहाँ तक कि करुणा और वात्सल्य से उत्पन्न निर्दोष प्रतीत होने वाली आसक्ति भी, यदि असंयमित रहे, तो वर्षों की तपस्या को भी भटका सकती है।

इस अध्याय की शिक्षा

सूक्ष्म से सूक्ष्म आसक्ति भी, चाहे वह कितनी निर्दोष प्रतीत हो, मृत्यु के समय के विचार को प्रभावित कर अगले जन्म की दिशा निर्धारित कर सकती है।

8

भरत का मृग-योनि में जन्म

मृग रूप में जन्म लेने पर भी, भरत की पूर्व साधना का पुण्य पूर्णतः नष्ट नहीं हुआ था — भगवान की कृपा से उन्हें अपने पूर्व मानव-जीवन की स्पष्ट स्मृति बनी रही, जो एक साधारण मृग के लिए असंभव होता। इस मृग-योनि में भी उन्होंने अपनी माता (जो पुनः उसी हिरणी-कुल की थी) का त्याग कर, पुनः उसी पुलहाश्रम में जाकर ऋषियों की संगति में अपना समय व्यतीत किया, वेद-पाठ और स्तुतियाँ सुनते हुए।

वे अपनी पूर्व की भूल को स्पष्ट रूप से स्मरण रखते हुए, इस बार अत्यंत सावधानीपूर्वक किसी भी नई आसक्ति से बचते रहे, अपने मृग-शरीर का उपयोग भी भगवद्-चिंतन के लिए ही करते हुए, और मृत्यु के समय भी अपने मन को पूर्णतः भगवद्-स्मरण में स्थिर रखा, जिससे उनकी आगे की गति में सुधार हुआ।

अंततः इस मृग-जीवन के समाप्त होने पर, भरत तीसरी बार मनुष्य योनि में जन्मे, इस बार एक अत्यंत विद्वान और धर्मनिष्ठ अंगिरा-वंशीय ब्राह्मण परिवार में। इस जन्म में, अपनी पूर्व दो जन्मों की भूलों से पूर्णतः शिक्षा प्राप्त कर चुके होने के कारण, उन्होंने एक अत्यंत साहसिक निर्णय लिया।

उन्होंने अपने ही असाधारण ज्ञान, वेद-पांडित्य और आध्यात्मिक उन्नति को पूर्णतः छिपाने का निश्चय किया, स्वयं को एक मूर्ख, अनाड़ी, अस्वच्छ और असंस्कारी बालक के रूप में प्रस्तुत करते हुए, ताकि उनके परिवार वाले या समाज उन्हें कोई विवाह, राज्य-कार्य या सामाजिक जिम्मेदारी न सौंपे जो पुनः उनके मन को भटका सके — क्योंकि उन्होंने सीख लिया था कि सम्बन्ध और उत्तरदायित्व, चाहे कितने भी निर्दोष प्रतीत हों, आसक्ति का कारण बन सकते हैं।

अपने पिता की मृत्यु के पश्चात्, उनकी सौतेली माँ और भाइयों ने उन्हें एक भार-सम मूर्ख समझकर उनकी पूर्ण उपेक्षा की, उन्हें केवल पशुओं जैसा खाना देकर खेतों में काम पर लगा दिया — किंतु भरत, बिना किसी शिकायत या प्रतिरोध के, यह सब सहन करते रहे, अपने भीतर की दिव्यता को पूर्णतः गुप्त रखते हुए। इसी वेश और स्वभाव में वे इतिहास में जड़ भरत के नाम से विख्यात हुए, जिनकी कथा अगले अध्याय में जारी रहती है।

इस अध्याय की शिक्षा

अपनी पूर्व भूलों से सीख लेने वाली आत्मा, अगले अवसर पर संबंधों और उत्तरदायित्वों से भी सावधान रहकर, अपनी साधना को सुरक्षित रख सकती है।

9

जड़ भरत और राजा रहूगण

एक बार, स्थानीय राजा को अपनी माता के लिए एक बलि हेतु उपयुक्त पुरुष की तलाश करने वाले सैनिकों ने, हृष्ट-पुष्ट किंतु मूर्ख प्रतीत होने वाले जड़ भरत को खेत में काम करते देखकर बलपूर्वक पकड़ लिया — यद्यपि यह प्रसंग स्वयं एक और घटना का भाग है जिसमें भगवती काली स्वयं इस अधर्मी बलि को रोकती हैं और जड़ भरत को सुरक्षित छोड़ देती हैं।

इसके पश्चात्, एक दिन राजा रहूगण, जो कपिल मुनि के आश्रम की यात्रा पर जा रहे थे, को अपनी पालकी उठाने के लिए अतिरिक्त वाहकों की आवश्यकता पड़ी, और उनके सेवकों ने मार्ग में मिले जड़ भरत को, उनकी हृष्ट-पुष्ट देह देखकर, बलपूर्वक इस कार्य में लगा दिया।

चूँकि जड़ भरत सम्पूर्ण ब्रह्मांड को भगवान के शरीर के रूप में देखते थे और अपने पैरों के नीचे आने वाली किसी भी चींटी या जीव को कुचलने से बचना चाहते थे, वे शेष वाहकों की तुलना में असमान और मंद गति से चल रहे थे, जिससे पालकी हिचकोले खा रही थी। राजा रहूगण, यह न जानते हुए कि उनका यह नया पालकी-वाहक वास्तव में कौन है, इस असुविधा से क्रोधित हो उठे और उन्हें अत्यंत कठोर, अपमानजनक शब्दों में डाँटा, उसे आलसी और अकुशल कहते हुए।

जड़ भरत ने, बिना किसी क्रोध, प्रतिरोध या आत्म-सफाई के, राजा के इस अपमान का उत्तर अत्यंत शांत, गंभीर स्वर में शरीर और आत्मा की प्रकृति पर इतने गहन, दार्शनिक प्रवचन के साथ दिया कि राजा रहूगण, यह प्रवचन सुनते ही स्तब्ध रह गए। उन्होंने तुरन्त अपनी पालकी से नीचे उतरकर अपने ही सेवक के चरणों में गिरकर क्षमा माँगनी आरम्भ की।

राजा रहूगण ने पहचाना कि वे किसी सामान्य व्यक्ति के समक्ष नहीं, अपितु एक महान ज्ञानी, सिद्ध आत्मा के समक्ष खड़े थे, जिन्होंने केवल मूर्खता का आवरण धारण कर रखा था — यह कथा इस शिक्षा का सुंदर और चिरस्थायी उदाहरण है कि सच्ची महानता सबसे विनम्र, उपेक्षित और तिरस्कृत रूप में भी छिपी हो सकती है, और बाह्य रूप-रंग से किसी की आध्यात्मिक स्थिति का आकलन कभी नहीं करना चाहिए।

इस अध्याय की शिक्षा

सच्ची महानता सबसे विनम्र, उपेक्षित रूप में भी छिपी हो सकती है — बाह्य रूप-रंग से किसी की आध्यात्मिक स्थिति का आकलन कभी नहीं करना चाहिए।

10

जड़ भरत का रहूगण को उपदेश

राजा रहूगण के बार-बार, अत्यंत विनम्रतापूर्वक आग्रह करने पर कि वे अपना उपदेश जारी रखें और उन्हें क्षमा करें, जड़ भरत ने कहा कि क्रोध करने या क्षमा माँगने, दोनों का ही यहाँ कोई अर्थ नहीं, क्योंकि जिस शरीर को "तुम" ढो रहे थे, वह भी और जिसने "मुझे" डाँटा, वह भी — दोनों ही नश्वर पदार्थ मात्र हैं, आत्मा नहीं।

उन्होंने विस्तार से समझाया कि जिस प्रकार पालकी ढोने वाले सेवक, स्वयं पालकी, और उसमें बैठा राजा — ये तीनों वास्तव में परस्पर पूर्णतः भिन्न वस्तुएँ हैं, फिर भी सामान्य भाषा में लोग कह देते हैं कि "राजा जा रहे हैं", मानो पालकी और वाहक भी राजा का ही अंग हों — उसी प्रकार शरीर, मन, इंद्रियाँ, और आत्मा भी परस्पर पूर्णतः भिन्न तत्त्व हैं, फिर भी अज्ञानवश मनुष्य इन्हें एक ही मान बैठता है और कहता है "मैं मोटा हूँ", "मैं दुःखी हूँ", जबकि ये सभी अवस्थाएँ केवल शरीर और मन की हैं, आत्मा की नहीं।

उन्होंने समझाया कि जो व्यक्ति इस सूक्ष्म किंतु आधारभूत भेद को स्पष्ट रूप से समझ लेता है, वह न तो प्रशंसा से फूलकर प्रसन्न होता है, न ही निंदा और अपमान से दुःखी होता है, क्योंकि वह जानता है कि ये सभी अनुभव केवल शरीर और मन के धरातल पर घटित होते हैं, उसकी शाश्वत, निर्विकार आत्मा को वे स्पर्श तक नहीं कर पाते।

जड़ भरत ने रहूगण को यह भी सिखाया कि एक राजा, चाहे वह कितनी भी शक्ति और सम्मान का स्वामी क्यों न हो, यदि वह इस सत्य को नहीं समझता, तो वह अपने ही अहंकार का दास बना रहता है, तथा उन्होंने भक्तियोग को ही इस ज्ञान को स्थिर रूप से आत्मसात् करने का सरलतम और सुदृढ़तम साधन बताया।

राजा रहूगण, इस गहन शिक्षा से गहराई से आलोड़ित होकर और आत्मसाक्षात्कार की एक झलक पाकर, जड़ भरत के चरणों में पुनः साष्टांग प्रणाम करते हुए उनसे विनम्रतापूर्वक आगे के मार्गदर्शन की प्रार्थना की, यह स्वीकार करते हुए कि उनका सम्पूर्ण राजसी अहंकार इस साधारण दिखने वाले वृद्ध पालकी-वाहक के समक्ष चूर-चूर हो गया था।

इस अध्याय की शिक्षा

शरीर, मन और आत्मा के भेद को समझ लेने वाला व्यक्ति न प्रशंसा से फूलता है, न निंदा से दुःखी होता है, क्योंकि ये अनुभव उसकी शाश्वत आत्मा को स्पर्श ही नहीं करते।

11

रहूगण को आगे का उपदेश

जड़ भरत ने राजा रहूगण की इस विनम्र प्रार्थना को स्वीकार करते हुए आगे समझाया कि संसार एक ऐसे घने, भयावह वन के समान है जिसमें आत्मा अपने ही पूर्वकृत कर्मों के कारण भटकती रहती है, विभिन्न योनियों में बार-बार जन्म लेते हुए, कभी सुख तो कभी दुःख का अनुभव करते हुए, बिना यह समझे कि यह भटकन उसकी अपनी ही अज्ञानता का परिणाम है।

उन्होंने इस भव-वन के विभिन्न प्रतीकों का वर्णन किया — इसमें डाकुओं के समान इंद्रियाँ हैं जो निरंतर आत्मा को लूटती रहती हैं, जंगली पशुओं के समान काम-क्रोध हैं जो उसे भयभीत करते रहते हैं, और भ्रामक जल-स्रोतों के समान क्षणिक सुख हैं जो प्यास बुझाने के बजाय उसे और अधिक तीव्र कर देते हैं।

यह भटकन तभी समाप्त होती है, उन्होंने कहा, जब आत्मा एक सच्चे गुरु की शरण लेकर, भगवद्-भक्ति और सम्यक् ज्ञान के माध्यम से अपनी वास्तविक, शाश्वत, आनंदमय प्रकृति को पहचान लेती है, और यह पहचान ही मोक्ष है — किसी नए लोक में जाना नहीं, अपितु अपने वास्तविक स्वरूप में स्थिर हो जाना।

उन्होंने रहूगण को यह भी सिखाया कि एक राजा का कर्तव्य भी, यदि उचित, अनासक्त भावना से निभाया जाए, आध्यात्मिक साधना में बाधा नहीं अपितु सहायक बन सकता है — प्रजा का न्यायपूर्ण पालन करना स्वयं में एक यज्ञ के समान पुण्यकारी कर्म है, बशर्ते वह अहंकार-रहित होकर किया जाए।

रहूगण, इस समग्र उपदेश से गहराई से प्रभावित और रूपांतरित होकर, अपने शेष जीवन में इसी शिक्षा के अनुरूप, विनम्रता और अनासक्ति के साथ शासन करने का दृढ़ संकल्प लिया, और जड़ भरत, अपना उपदेश पूर्ण कर, बिना किसी पहचान या प्रशंसा की अपेक्षा के, पुनः अपने मौन, एकांत और तपस्वी जीवन में लौट गए।

इस अध्याय की शिक्षा

संसार एक घने वन के समान है जिसमें आत्मा अपने ही कर्मों के कारण भटकती है — इससे मुक्ति केवल सच्चे गुरु की शरण और भगवद्-भक्ति से ही मिलती है।

12

जम्बूद्वीप का वर्णन

जड़ भरत की कथा पूर्ण करने के पश्चात्, मैत्रेय ने कथा की दिशा को व्यक्तिगत कथाओं से हटाकर ब्रह्मांड की विशाल भौगोलिक संरचना के विस्तृत वर्णन की ओर मोड़ा, यह बताते हुए कि यह वर्णन स्वयं शुकदेव द्वारा राजा परीक्षित को इसी क्रम में सुनाया गया था।

उन्होंने विदुर को जम्बूद्वीप का वर्णन किया — पृथ्वी के सात संकेंद्रित द्वीपों में से केंद्रीय और सबसे महत्त्वपूर्ण द्वीप, जिसका आकार कमल की पंखुड़ियों के समान है और जिसके ठीक मध्य में स्वर्णिम, एक लाख योजन ऊँचा मेरु पर्वत स्थित है, जो ब्रह्मांड की धुरी के समान कार्य करता है, जिसके शिखर पर स्वयं ब्रह्माजी की दिव्य नगरी है।

मैत्रेय ने जम्बूद्वीप के नौ वर्षों (क्षेत्रों) का वर्णन किया — इलावृत (केंद्र में), भद्राश्व, हरि, केतुमाल, रम्यक, हिरण्मय, कुरु, किम्पुरुष, और भारतवर्ष — जिनमें भारतवर्ष, जहाँ मनुष्य कर्म, यज्ञ और भक्ति के माध्यम से मुक्ति प्राप्त कर सकते हैं, को विशेष महत्त्व दिया गया है।

उन्होंने स्पष्ट किया कि अन्य क्षेत्रों में, यद्यपि वे भौतिक सुख-समृद्धि, दीर्घायु और स्वर्गोपम सुविधाओं से परिपूर्ण हैं, वहाँ के निवासी केवल भोग में इतने लीन रहते हैं कि उन्हें वह विवेक और प्रेरणा प्राप्त नहीं होती जो मुक्ति की खोज के लिए आवश्यक है, जबकि भारतवर्ष में जन्म लेने वाली आत्मा को ही, कष्ट और सुख के मिश्रण के कारण, सच्चे वैराग्य और भक्ति का अवसर सर्वाधिक सुलभता से प्राप्त होता है।

इसीलिए, मैत्रेय ने बल देकर कहा, देवता भी भारतवर्ष में मनुष्य-जन्म पाने की कामना करते हैं, क्योंकि यहीं से भगवद्भक्ति के माध्यम से शाश्वत मुक्ति का द्वार सर्वाधिक खुला हुआ है — स्वर्ग के भोग भी अंततः समाप्त हो जाते हैं, किंतु भक्ति से प्राप्त मुक्ति शाश्वत है।

इस अध्याय की शिक्षा

इस विशाल, विविधतापूर्ण ब्रह्मांड में मानव जन्म, विशेषतः भारतवर्ष में जन्म, एक दुर्लभ अवसर है जिसे आत्म-साक्षात्कार की खोज में समर्पित करना चाहिए।

13

भू-मंडल का माप और अन्य वर्षों का वर्णन

मैत्रेय ने आगे भू-मंडल के विस्तृत माप — जम्बूद्वीप का व्यास एक लाख योजन — तथा इसके विभिन्न सीमांत पर्वतों, जैसे निषध, हेमकूट, हिमालय, नील, श्वेत और शृंगवान, तथा नदियों का वर्णन किया, विशेषतः इलावृत-वर्ष का, जो मेरु पर्वत को घेरे हुए है और जहाँ भगवान शिव, अपनी पत्नी पार्वती के साथ, स्वयं निवास करते हैं।

उन्होंने बताया कि इलावृत-वर्ष की स्त्रियाँ इतनी तेजस्वी और मोहक हैं कि वहाँ स्वयं चंद्रमा भी, कहा जाता है, पुरुष रूप धारण कर उनके साथ विचरण करने की कामना करते हैं। इसके पश्चात् उन्होंने अन्य वर्षों — हरिवर्ष (जहाँ भगवान नृसिंह की पूजा होती है), केतुमाल (जहाँ कामदेव-रूप भगवान की पूजा होती है), रम्यक, कुरु, हिरण्मय, और किम्पुरुष (जहाँ स्वयं हनुमानजी निरंतर भगवान राम की कथा और नाम-स्मरण में लीन रहते हैं) — का भी संक्षिप्त किंतु सुंदर वर्णन किया, प्रत्येक की अपनी विशिष्ट प्राकृतिक सुंदरता, वहाँ निवास करने वाले प्राणियों की दीर्घायु, और उनकी विशिष्ट भगवद्-आराधना पद्धति के साथ।

इस विस्तृत भौगोलिक और आध्यात्मिक वर्णन के माध्यम से, मैत्रेय ने विदुर को यह समझाने का प्रयास किया कि सृष्टि कितनी विशाल, विविधतापूर्ण और भगवान की उपस्थिति से परिपूर्ण है — प्रत्येक क्षेत्र में, किसी न किसी रूप में, भगवद्-भक्ति की धारा प्रवाहित हो रही है, यद्यपि भिन्न-भिन्न रूपों और तीव्रताओं में।

उन्होंने पुनः इस बात पर बल दिया कि इस विशाल, विविध ब्रह्मांड में मानव जन्म, विशेष रूप से भारतवर्ष में जन्म, अपने आप में एक अत्यंत दुर्लभ, मूल्यवान और क्षणभंगुर अवसर है जिसे आत्म-साक्षात्कार और भगवद्-प्राप्ति की खोज में पूर्णतः समर्पित कर देना चाहिए, बजाय इसे सांसारिक विषयों में व्यर्थ गँवाने के, क्योंकि ऐसा अवसर बार-बार सहज उपलब्ध नहीं होता।

भाग १ समाप्त (अध्याय १-१३) — अगली फ़ाइल में अध्याय १४-२६ जारी रहेगा

इस अध्याय की शिक्षा

सृष्टि की अपार विशालता के समक्ष मानव जीवन कितना क्षणिक है, यह स्मरण रखना ही व्यक्ति को इस दुर्लभ अवसर का सदुपयोग करने के लिए प्रेरित करता है।

14

भवाटवी: संसार-वन में आत्मा की भटकन

मैत्रेय ने विदुर को एक अत्यंत गहन और मार्मिक रूपक के माध्यम से समझाया कि कैसे एक आत्मा, भौतिक इच्छाओं और अज्ञान के वशीभूत होकर, संसार-रूपी एक घने, भयावह वन में निरंतर भटकती रहती है, जिसे शास्त्रों में "भवाटवी" कहा गया है — यह रूपक राजा पुरंजन की कथा (चतुर्थ स्कन्ध) के समान ही, आत्मा की दशा का चित्रण करता है, इस बार एक भिन्न, संक्षिप्त प्रतीकात्मकता के साथ।

इस वन में आत्मा अनेक प्रकार के भय, कष्ट और क्षणिक, भ्रामक सुखों का सामना करती है — डाकुओं के समान इंद्रियों द्वारा निरंतर लूटी जाती हुई, हिंसक पशुओं के समान काम-क्रोध-लोभ द्वारा भयभीत की जाती हुई, कभी इस दिशा में तो कभी उस दिशा में भागती हुई, बिना यह समझे कि सच्ची शांति केवल इस वन से पूर्णतः बाहर निकलने में है, न कि इसकी गहराइयों में और अधिक भटकने या छिपने के स्थान खोजने में।

उन्होंने समझाया कि इस वन में कहीं-कहीं मरीचिका के समान मिथ्या जल-स्रोत भी दिखाई देते हैं — यह सांसारिक सुखों का प्रतीक है, जो दूर से सच्चे और तृप्तिदायक प्रतीत होते हैं, किंतु निकट पहुँचने पर केवल और अधिक प्यास तथा निराशा ही देते हैं।

यह भटकन तभी समाप्त होती है, मैत्रेय ने पुनः बल देते हुए कहा, जब आत्मा एक सच्चे, आत्म-साक्षात्कार प्राप्त गुरु की शरण लेती है और भगवद्-भक्ति के मार्ग को दृढ़ता से अपनाती है, ठीक वैसे ही जैसे जड़ भरत ने स्वयं राजा रहूगण को सिखाया था — गुरु ही वह प्रकाश-स्तंभ है जो इस अंधकारमय वन में मार्ग दिखाता है।

यह रूपक भारतवर्ष में मानव जीवन के महत्त्व को और अधिक स्पष्ट करता है, क्योंकि यहीं यह अवसर — कि आत्मा इस वन से बाहर निकलने का मार्ग खोज सके — सर्वाधिक सुलभ रूप से उपलब्ध है, क्योंकि यहाँ सन्त, शास्त्र और सत्संग सहज ही प्राप्त हो सकते हैं।

इस अध्याय की शिक्षा

संसार-रूपी वन में आत्मा तभी तक भटकती है जब तक वह एक सच्चे गुरु की शरण लेकर भगवद्-भक्ति के मार्ग को दृढ़ता से नहीं अपनाती।

15

गंगा का अवतरण

मैत्रेय ने आगे पवित्र गंगा नदी के दिव्य अवतरण की अत्यंत सुंदर कथा सुनाई, जो भगवान वामन के उस चरण को धोने वाले जल से उत्पन्न हुई जिससे उन्होंने ब्रह्मांड के आवरण को भेदा था, जब वे बलि से तीन पग भूमि माँगकर तीनों लोक नाप रहे थे। यह पवित्र जल पहले ब्रह्मलोक में एकत्रित हुआ, जहाँ ब्रह्माजी ने इसे अपने कमंडल में सहेजा।

वहाँ से यह जल स्वर्ग में बहा, फिर मेरु पर्वत के शिखर पर उतरा, और वहाँ से चार विशाल धाराओं — सीता, अलकनंदा, चक्षु और भद्रा — में विभाजित होकर पृथ्वी के चारों दिशाओं में प्रवाहित हुआ। अंततः, राजा भगीरथ के अपने पूर्वजों की मुक्ति हेतु की गई दीर्घकालिक, कठोर तपस्या के फलस्वरूप, यह पवित्र नदी मृत्युलोक में उतरने को तैयार हुई।

किंतु गंगा का वेग इतना प्रचंड था कि वह सीधे पृथ्वी पर गिरने से समस्त सृष्टि को नष्ट कर देती, अतः स्वयं भगवान शिव ने अपनी विशाल जटाओं में इसके वेग को धारण कर नियंत्रित किया, और फिर धीरे-धीरे इसे अपनी जटाओं से मुक्त कर भगीरथ के पीछे-पीछे प्रवाहित होने दिया, जिससे यह सगर के पुत्रों की भस्म राशि को स्पर्श कर उन्हें मुक्ति प्रदान कर सकी।

मैत्रेय ने समझाया कि गंगा का यह जल इतना पवित्र और शक्तिशाली है कि इसमें श्रद्धापूर्वक स्नान करने मात्र से, चाहे व्यक्ति कितना भी पापी क्यों न हो, उसके संचित पाप उसी प्रकार धुल जाते हैं जैसे स्वयं भगवान के पावन नामों का श्रवण और कीर्तन मात्र हृदय के गहनतम पापों को शुद्ध कर देता है — यह सिद्धांत पूर्व स्कन्धों में पहले ही बारंबार स्थापित किया जा चुका है।

उन्होंने यह भी बताया कि गंगा, चूँकि साक्षात् भगवान के चरण-कमलों से उत्पन्न हुई है, इसीलिए इसे "विष्णुपदी" भी कहा जाता है, और यह तीनों लोकों — स्वर्ग, मृत्युलोक और पाताल — में प्रवाहित होने वाली एकमात्र नदी है, जो इसकी असाधारण, त्रिलोक-व्यापी पवित्रता को दर्शाती है।

इस अध्याय की शिक्षा

गंगा जैसी पवित्र वस्तुएँ स्वयं भगवान के चरण-स्पर्श से उत्पन्न होकर संसार को शुद्ध करती हैं — भगवद्-सम्बन्ध ही किसी वस्तु को सबसे पवित्र बनाता है।

16

अन्य द्वीपों का वर्णन

मैत्रेय ने अब जम्बूद्वीप के परे, संकेंद्रित वलयों में स्थित अन्य छह द्वीपों का वर्णन किया — प्लक्ष, शाल्मलि, कुश, क्रौंच, शाक, और पुष्कर — प्रत्येक द्वीप अपने से पूर्ववर्ती द्वीप के आकार से दोगुना, और एक विशाल, विशिष्ट समुद्र से घिरा हुआ।

जम्बूद्वीप लवण (नमक) के समुद्र से घिरा है; प्लक्षद्वीप इक्षुरस (गन्ने के रस) के समुद्र से; शाल्मलिद्वीप सुरा (मदिरा) के समुद्र से; कुशद्वीप घृत (शुद्ध घी) के समुद्र से; क्रौंचद्वीप दधि (दही) के समुद्र से; शाकद्वीप दुग्ध (दूध) के समुद्र से; और सबसे बाह्य पुष्करद्वीप शुद्ध, मीठे जल के समुद्र से घिरा हुआ है — यह विवरण सृष्टि की अद्भुत, कल्पनातीत विविधता को दर्शाता है।

उन्होंने प्रत्येक द्वीप में निवास करने वाले प्राणियों की असाधारण दीर्घायु, उनकी विशिष्ट पूजा-पद्धतियों, तथा वहाँ के प्रमुख पर्वतों और नदियों का भी संक्षिप्त वर्णन किया, यह स्पष्ट करते हुए कि प्रत्येक द्वीप में, किसी न किसी देवता या भगवान के अवतार की पूजा किसी न किसी रूप में अवश्य प्रचलित है।

इस विस्तृत वर्णन के माध्यम से, मैत्रेय ने विदुर के समक्ष सृष्टि की अपार विविधता, विशालता और उसकी अद्भुत, सुव्यवस्थित संरचना को प्रस्तुत किया, यह दर्शाते हुए कि भगवान की सृजन-शक्ति की कोई सीमा नहीं है।

उन्होंने पुनः विदुर को स्मरण कराया कि इस विशाल, अनंत ब्रह्मांड की तुलना में मानव जीवन कितना क्षणिक और सूक्ष्म है, फिर भी यह अपने आप में इतना दुर्लभ और मूल्यवान अवसर है, क्योंकि केवल इसी के माध्यम से आत्मा इस सम्पूर्ण भौतिक विस्तार से सदा के लिए मुक्त होने का मार्ग खोज सकती है।

इस अध्याय की शिक्षा

सृष्टि की अपार विविधता को देखकर मनुष्य को अपने दुर्लभ जीवन के मूल्य और उसके सदुपयोग की आवश्यकता का बोध होना चाहिए।

17

लोकालोक पर्वत का वर्णन

मैत्रेय ने अब भू-मंडल की बाह्यतम सीमा पर स्थित लोकालोक पर्वत का वर्णन किया, जो स्वर्ण के समान चमकीला, अत्यंत विशाल और पुष्करद्वीप के परे स्थित है, तथा प्रकाशित, दृश्य लोकों और उसके परे स्थित अंधकारमय, अदृश्य क्षेत्रों के बीच एक स्पष्ट, अलंघनीय सीमा का कार्य करता है।

उन्होंने समझाया कि इस पर्वत के परे सूर्य, चंद्रमा या किसी भी नक्षत्र का प्रकाश नहीं पहुँच पाता, और इसके आगे का क्षेत्र पूर्णतः अंधकार में डूबा हुआ है, जो इस बात का प्रतीक है कि भौतिक सृष्टि, चाहे कितनी भी विशाल क्यों न प्रतीत हो, अंततः एक सीमित, परिमित संरचना है, जिसके परे केवल अनंत, अव्यक्त तत्त्व विद्यमान है।

उन्होंने यह भी बताया कि इस पर्वत पर चार विशाल हाथी अपनी-अपनी दिशा में खड़े होकर सम्पूर्ण भू-मंडल को धारण करते हैं, और यह पर्वत ब्रह्मांड की संरचना में एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण सीमा-चिह्न के रूप में कार्य करता है, आगे के अध्यायों में वर्णित होने वाले सूर्य और अन्य ग्रहों की गति के लिए एक महत्त्वपूर्ण संदर्भ-बिंदु प्रदान करते हुए।

इस अध्याय की शिक्षा

भौतिक सृष्टि, चाहे कितनी भी विशाल प्रतीत हो, अंततः एक सीमित, परिमित संरचना है, जिसके परे केवल अनंत, अव्यक्त तत्त्व विद्यमान है।

18

सूर्य की गति का वर्णन

मैत्रेय ने अब सूर्य के दिव्य रथ और उसकी गति का अत्यंत विस्तृत वर्णन किया, यह समझाते हुए कि कैसे सूर्यदेव, गायत्री-छंद में निबद्ध सात अश्वों द्वारा खींचे गए एक विशाल रथ पर सवार होकर, अरुण को अपना सारथी बनाकर, निरंतर मेरु पर्वत की परिक्रमा करते रहते हैं, जिससे विभिन्न ऋतुओं, तथा दिन-रात्रि के अनवरत चक्र की उत्पत्ति होती है।

उन्होंने बताया कि सूर्य की गति के साथ ही विभिन्न ऋषिगण, गंधर्व, अप्सराएँ, नाग और यक्ष, बारी-बारी से, प्रत्येक मास में सूर्य के रथ के साथ यात्रा करते हुए उनकी स्तुति करते हैं, जिससे सृष्टि का संतुलन और व्यवस्था बनी रहती है।

मैत्रेय ने सूर्य को ब्रह्मांड की आत्मा, नेत्र और जीवनदायी शक्ति के रूप में वर्णित किया, जिसकी निरंतर गति समस्त प्राणियों के जीवन-चक्र, फसलों की वृद्धि, और यहाँ तक कि यज्ञों के उचित काल-निर्धारण को भी नियंत्रित करती है, और जिसकी पूजा वेदों में गायत्री मंत्र के माध्यम से विशेष रूप से विहित है।

इस अध्याय की शिक्षा

सृष्टि की सुव्यवस्थित गति — सूर्य का नियमित भ्रमण — यह दर्शाती है कि ब्रह्मांड किसी अंधी दुर्घटना का नहीं, अपितु भगवान की सुसंगत व्यवस्था का परिणाम है।

19

अन्य ग्रहों की गति

मैत्रेय ने आगे चंद्रमा, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, और शनि सहित अन्य ग्रहों की गति, उनकी कक्षाओं और उनके द्वारा उत्पन्न प्रभावों का वर्णन किया, यह बताते हुए कि प्रत्येक ग्रह अपनी विशिष्ट गति और तेज के साथ मेरु पर्वत की परिक्रमा करता है, कुछ शीघ्रता से तो कुछ अत्यंत मंद गति से।

उन्होंने चंद्रमा का विशेष उल्लेख किया, जो अपनी कलाओं के माध्यम से मन और वनस्पतियों को पोषण प्रदान करता है, तथा जिसकी घटती-बढ़ती कलाएँ स्वयं समय के चक्र और पितरों को अर्पित होने वाले सोमरस के क्षय-वृद्धि का प्रतीक हैं।

उन्होंने राहु और केतु का भी उल्लेख किया, जो मूलतः असुर स्वरभानु के दो भाग हैं, जिन्हें भगवान विष्णु ने मोहिनी अवतार के समय अमृत-पान करते हुए पकड़े जाने पर सुदर्शन चक्र से काट डाला था, और जो अब भी, अपने पुराने वैर के कारण, समय-समय पर सूर्य और चंद्रमा को ग्रस लेते हैं, जिसे ग्रहण कहा जाता है — यह कथा अष्टम स्कन्ध में क्षीरसागर-मंथन के प्रसंग में पहले ही विस्तार से वर्णित की जा चुकी है।

इस अध्याय की शिक्षा

ग्रहों की गति और ग्रहण जैसी घटनाएँ भी पूर्वजन्म के वैर और कर्मों से जुड़ी हैं — सृष्टि की प्रत्येक घटना के पीछे एक गहरा कारण होता है।

20

पाताल और उसके नीचे के लोकों का वर्णन

मैत्रेय ने अब पृथ्वी के नीचे स्थित सात पाताल लोकों का क्रमिक वर्णन किया — अतल, वितल, सुतल, तलातल, महातल, रसातल, और पाताल — प्रत्येक एक-दूसरे के नीचे स्थित, और प्रत्येक विभिन्न प्रकार के नाग, दैत्य, दानव तथा असुर प्राणियों द्वारा आबाद, जो अत्यंत वैभवशाली, सुंदर और सुखी जीवन व्यतीत करते हैं।

उन्होंने बताया कि इन लोकों की स्त्रियाँ इतनी मोहक हैं, भवन इतने स्वर्ण-जटित हैं, और भोग-विलास इतने प्रचुर हैं कि वहाँ के निवासी यह भी भूल जाते हैं कि यह रात्रि है या दिन — यहाँ तक कि स्वर्ग के सुख भी इनके समक्ष कभी-कभी फीके प्रतीत होते हैं, यद्यपि यहाँ आध्यात्मिक उन्नति के अवसर से पूर्णतः वंचित रहना पड़ता है, क्योंकि भोग की अधिकता विवेक को कुंठित कर देती है।

उन्होंने विशेष रूप से सुतल लोक का उल्लेख किया, जहाँ महाराज बलि, भगवान वामन द्वारा तीन पगों में तीनों लोक जीत लिए जाने और उन्हें पाताल भेजे जाने के पश्चात्, भगवान की विशेष कृपा से एक भव्य, सुरक्षित निवास प्राप्त कर निवास करते हैं, जहाँ स्वयं भगवान विष्णु, अपने वचन के अनुसार, दिन-रात उनके द्वारपाल के रूप में शस्त्र लिए खड़े रहकर सेवा करते हैं — यह कथा अष्टम स्कन्ध में विस्तार से वर्णित है, और भक्ति की महिमा का एक अद्वितीय उदाहरण प्रस्तुत करती है।

मैत्रेय ने यह भी बताया कि तलातल लोक में असुर मय दानव निवास करते हैं, जिन्हें शिव से त्रिपुर नामक तीन दुर्ग प्राप्त हुए थे, और महातल में कद्रू के सर्प-पुत्र, अनेक फणों वाले, निवास करते हैं, प्रत्येक लोक की अपनी विशिष्ट प्रकृति और निवासियों के साथ, जो सृष्टि की अद्भुत बहुस्तरीय संरचना को प्रकट करते हैं।

इस अध्याय की शिक्षा

भौतिक सुख-सुविधा, चाहे कितनी भी प्रचुर क्यों न हो, यदि आध्यात्मिक उन्नति के अवसर से रहित हो, तो अंततः अपूर्ण ही रहती है।

21

शेषनाग का वर्णन

मैत्रेय ने पाताल के भी नीचे स्थित, गर्भोदक सागर में शयन करने वाले शेषनाग का वर्णन किया, जो अपने हजार फणों पर सम्पूर्ण ब्रह्मांड और पृथ्वी को, एक छत्र के समान, धारण करते हैं, बिना किसी थकान, भार या पीड़ा का अनुभव किए, क्योंकि वे स्वयं भगवान के अनन्य, शुद्ध भक्त हैं और उनकी सेवा में ही पूर्णतः लीन रहते हैं।

उन्होंने समझाया कि शेषनाग अपने प्रत्येक फण पर, अत्यंत नम्रता और श्रद्धा के साथ, इस विशाल ब्रह्मांड-भार को इस प्रकार धारण करते हैं मानो वह एक सरसों का दाना मात्र हो, और भगवान की महिमा का निरंतर, अश्रांत गान करते रहते हैं, स्वयं भगवान के शय्या और आसन दोनों के रूप में सेवारत रहते हुए।

उन्होंने विशेष बल देकर कहा कि शेषनाग की यह सेवा भक्ति के उस उच्चतम, आदर्श स्वरूप का प्रतीक है जिसमें सेवक अपने स्वामी के अत्यंत भारी उत्तरदायित्व को भी अपने ऊपर सहर्ष लेते हुए किसी प्रकार का कष्ट, बोझ या थकान अनुभव नहीं करता, क्योंकि उसके लिए सेवा स्वयं ही सर्वोच्च आनंद और परम लक्ष्य है, न कि कोई विवशता।

इस अध्याय की शिक्षा

सेवा का सर्वोच्च आदर्श वह है जिसमें सेवक अपने स्वामी के अत्यंत भारी भार को भी बिना कष्ट के, आनंदपूर्वक वहन करे — शेषनाग इसी भक्ति का प्रतीक हैं।

22

नरकों का वर्णन (भाग १)

मैत्रेय ने अब उन विभिन्न अट्ठाईस नरकों का विस्तृत वर्णन आरम्भ किया जो विशिष्ट पापों के लिए विशिष्ट, सुनिश्चित दंड प्रदान करते हैं — तामिस्र (धोखे से दूसरे की सम्पत्ति या पत्नी हड़पने वालों के लिए), अंधतामिस्र (और भी गंभीर छल के लिए), रौरव (निर्दोषों को सताने वालों के लिए, जहाँ 'रुरु' नामक भयंकर सर्प काटते हैं), और महारौरव।

उन्होंने बताया कि प्रत्येक नरक एक विशेष प्रकार के पाप — जैसे छल, हिंसा, लोभ, अभिमान, या दूसरों के प्रति क्रूरता — के अनुरूप एक अत्यंत सटीक, न्यायपूर्ण ढंग से कैलिब्रेट किया गया दंड प्रदान करता है, जो किसी अंधे प्रतिशोध का परिणाम नहीं, अपितु स्वयं यमराज के न्यायालय में, चित्रगुप्त द्वारा रखे गए कर्मों के लेखे-जोखे के आधार पर, अत्यंत सूक्ष्मता से निर्धारित होता है।

उन्होंने विदुर को स्पष्ट किया कि ये दंड मनमाने या क्रूर नहीं हैं, अपितु पाप के स्वभाव के अनुरूप एक न्यायपूर्ण, गणितीय रूप से सटीक परिणाम हैं, जो आत्मा को उसके संचित दोषों और वासनाओं से क्रमिक रूप से शुद्ध करने का कार्य करते हैं, इससे पूर्व कि वह पुनः एक नए जन्म में आगे की आध्यात्मिक प्रगति का अवसर प्राप्त करे — ठीक वैसे ही जैसे एक कठोर औषधि रोग को जड़ से समाप्त करने के लिए आवश्यक हो सकती है।

इस अध्याय की शिक्षा

पापों के दंड, चाहे कितने भी भयंकर प्रतीत हों, मनमाने नहीं अपितु न्यायपूर्ण और शुद्धिकारी हैं, जो आत्मा को आगे की प्रगति के योग्य बनाते हैं।

23

नरकों का वर्णन (भाग २)

मैत्रेय ने नरकों के इस विस्तृत वर्णन को जारी रखा, कुम्भीपाक (जहाँ पशुओं को पकाकर खाने वाले उबलते तेल में पकाए जाते हैं), कालसूत्र (कर्ज न चुकाने वालों तथा माता-पिता व गुरु का अनादर करने वालों के लिए), असिपत्रवन (जहाँ तलवार के समान तीक्ष्ण पत्तों वाले वृक्षों के बीच अपराधियों को कोड़ों से हांका जाता है), तथा तप्तसूर्मि, वज्रकंटक-शाल्मली और अन्य कई नरकों का वर्णन करते हुए, प्रत्येक अपने विशिष्ट पाप के अनुरूप।

उन्होंने विशेष रूप से उन पापों पर बल दिया जो सामाजिक जीवन में सामान्य और मामूली प्रतीत होते हैं — जैसे असत्य बोलना, वचन से मुकर जाना, धोखा देना, वेद-निंदा करना, या दूसरों के प्रति निर्दयता दिखाना — यह गहराई से दर्शाते हुए कि ये भी, चाहे कितने भी साधारण या क्षम्य प्रतीत हों, अत्यंत गंभीर और दीर्घकालिक आध्यात्मिक परिणाम रखते हैं, और इन्हें कदापि तुच्छ नहीं समझना चाहिए।

इस विस्तृत और कभी-कभी अत्यंत भयावह वर्णन के माध्यम से, मैत्रेय ने विदुर के मन में यह स्पष्ट, अमिट संदेश स्थापित करने का प्रयास किया कि धर्मपूर्ण, सत्यनिष्ठ और भक्तिपूर्ण जीवन जीने का महत्त्व केवल आध्यात्मिक उन्नति के लिए ही नहीं, अपितु इन गंभीर, दीर्घकालिक और अत्यंत कष्टकारी परिणामों से बचने के लिए भी अत्यंत आवश्यक है, यही कारण है कि शास्त्रों में धर्म का इतना विस्तृत वर्णन किया गया है।

इस अध्याय की शिक्षा

सामाजिक जीवन में साधारण प्रतीत होने वाले पाप — असत्य, छल, क्रूरता — भी गंभीर, दीर्घकालिक आध्यात्मिक परिणाम रखते हैं, इन्हें तुच्छ नहीं समझना चाहिए।

24

जीव की स्थिति और नरक से मुक्ति का मार्ग

नरकों के इस विस्तृत, भयावह वर्णन को समाप्त करते हुए, मैत्रेय ने विदुर को यह महत्त्वपूर्ण आश्वासन देकर सांत्वना दी कि ये दंड, चाहे कितने भी भयंकर और दीर्घकालिक प्रतीत हों, सदैव अस्थायी और परिमित अवधि के ही होते हैं — कोई भी नरक शाश्वत नहीं है, और कोई भी आत्मा, चाहे उसने कितने भी गंभीर पाप क्यों न किए हों, अपने दंड की निर्धारित अवधि पूर्ण होने पर अनिवार्यतः पुनः एक नए जन्म और आगे की प्रगति का अवसर प्राप्त करती है।

उन्होंने पुनः दृढ़तापूर्वक बल दिया कि इस सम्पूर्ण जन्म-मृत्यु और स्वर्ग-नरक के अंतहीन चक्र से पूर्णतः बाहर निकलने का सबसे सुनिश्चित, सरलतम और सर्वसुलभ मार्ग भगवद्-भक्ति ही है — जैसा कि कपिल मुनि ने अपनी माता देवहूति को, और शुकदेव ने स्वयं परीक्षित को, क्रमशः तृतीय और द्वितीय स्कन्ध में पहले ही विस्तार से सिखाया था।

उन्होंने स्पष्ट किया कि एक सच्चा भक्त इन नरकों के भय से भी पूर्णतः मुक्त रहता है, चाहे वह जाने-अनजाने कुछ पाप-कर्म कर भी बैठे, क्योंकि उसका हृदय पहले से ही निरंतर भगवद्-नाम स्मरण और कीर्तन से इतना शुद्ध हो चुका होता है कि पाप उसे स्पर्श ही नहीं कर पाते, ठीक वैसे ही जैसे सूर्य के प्रकाश में अंधकार टिक नहीं सकता।

इस अध्याय की शिक्षा

कोई भी दंड शाश्वत नहीं है, और भगवद्-भक्ति ही नरक सहित समस्त भय और बंधन से मुक्ति का सबसे सुनिश्चित, सरल मार्ग है।

25

अनंत शेष की महिमा

मैत्रेय ने पुनः शेषनाग की महिमा का विस्तृत वर्णन किया, इस बार उनकी अनंत, अकल्पनीय शक्ति और भगवान के प्रति उनकी अटूट, नैसर्गिक भक्ति पर विशेष बल देते हुए। उन्होंने समझाया कि शेषनाग, जिन्हें "अनंत" भी कहा जाता है क्योंकि उनके गुणों और शक्ति का कोई अंत नहीं, अपने हजार मुखों से निरंतर, अविराम भगवान की महिमा, लीलाओं और गुणों का गान करते हैं।

उन्होंने बताया कि यह निरंतर स्तुति और भगवद्-स्मरण ही उनकी उस अपार शक्ति और अटूट स्थिरता का वास्तविक स्रोत है, जिससे वे सम्पूर्ण ब्रह्मांड को अपने फणों पर धारण करने में समर्थ होते हैं — यह शक्ति उनकी अपनी नहीं, अपितु भगवद्-भक्ति से प्राप्त एक दिव्य वरदान है।

उन्होंने विदुर को यह महत्त्वपूर्ण शिक्षा दी कि जो आत्मा निरंतर भगवद्-नाम और महिमा के स्मरण में लीन रहती है, वह चाहे कितना भी बड़ा भार, उत्तरदायित्व या कठिनाई क्यों न वहन करे — चाहे वह एक राज्य का शासन हो या एक परिवार का पालन — वह कभी भी वास्तविक थकान, तनाव या पीड़ा का अनुभव नहीं करती, क्योंकि भगवद्-स्मरण स्वयं ही सबसे बड़ी शक्ति, शांति और सामर्थ्य का अक्षय स्रोत है।

इस अध्याय की शिक्षा

जो आत्मा निरंतर भगवद्-नाम स्मरण में लीन रहती है, वह चाहे कितना भी बड़ा भार वहन करे, कभी थकान या पीड़ा का अनुभव नहीं करती।

26

पंचम स्कन्ध का समापन: जीव की दशाओं का सारांश

पंचम स्कन्ध के इस अंतिम अध्याय में, मैत्रेय ने विदुर के समक्ष उन सभी विषयों का एक संक्षिप्त, सुसंगत सारांश प्रस्तुत किया जो उन्होंने इस सम्पूर्ण स्कन्ध में विस्तार से वर्णित किए थे — प्रियव्रत और ऋषभदेव के त्याग और आदर्श शासन का संतुलित जीवन, भरत की सूक्ष्म आसक्ति और उनकी तीन जन्मों की यात्रा जो अंततः मुक्ति में परिणत हुई, ब्रह्मांड की विशाल भौगोलिक तथा खगोलीय संरचना, और अंत में स्वर्ग-सम पातालों तथा भयावह किंतु शिक्षाप्रद नरकों का सम्पूर्ण वर्णन।

उन्होंने विदुर को स्मरण कराया कि इस सम्पूर्ण, विविधतापूर्ण वर्णन का केंद्रीय, अपरिवर्तनीय संदेश एक ही है: कि आत्मा, चाहे वह कितने भी विविध रूपों, लोकों और परिस्थितियों से क्यों न गुज़रे — राजा हो या साधु, मनुष्य हो या पशु, स्वर्ग में हो या पाताल या नरक में — उसका वास्तविक, स्थायी कल्याण केवल और केवल भगवद्-भक्ति में ही निहित है, अन्य कहीं नहीं।

भरत की कथा यह गहराई से दर्शाती है कि सूक्ष्म से सूक्ष्म आसक्ति भी, चाहे वह करुणा से ही उत्पन्न क्यों न हो, दीर्घकालिक साधना को भी भटका सकती है और तीन जन्मों तक चक्कर लगवा सकती है, जबकि ऋषभदेव और शेषनाग की कथाएँ यह दर्शाती हैं कि पूर्ण, निष्कपट समर्पण और निरंतर भगवद्-स्मरण ही सच्ची शांति, शक्ति और अंततः मुक्ति का एकमात्र, अचूक स्रोत है।

इस प्रकार पंचम स्कन्ध, जो प्रियव्रत के त्याग और शासन के अद्भुत संतुलन से आरम्भ हुआ, ऋषभदेव और भरत की गहन कथाओं से होते हुए, ब्रह्मांड की विशाल भौगोलिक तथा नारकीय संरचना के विस्तृत वर्णन के माध्यम से आगे बढ़ा, इस स्पष्ट, हृदयस्पर्शी शिक्षा के साथ समाप्त होता है कि सृष्टि चाहे कितनी भी विशाल, जटिल और विस्मयकारी क्यों न हो, प्रत्येक आत्मा के लिए वास्तविक कल्याण का मार्ग सदैव एक ही रहता है — भगवान के प्रति सच्ची, निश्छल, अटूट भक्ति। मैत्रेय ने विदुर को बताया कि आगामी षष्ठ स्कन्ध में वे अजामिल की कथा सुनेंगे, जो इसी भक्ति और भगवद्-नाम की अपार शक्ति का एक और भी अधिक हृदयस्पर्शी, आशाजनक उदाहरण प्रस्तुत करेगी।

पंचम स्कन्ध (पुस्तक ५) का सम्पूर्ण हिंदी अनुवाद समाप्त — कुल २६ अध्याय (भाग १: अध्याय १-१३, भाग २: अध्याय १४-२६)

इस अध्याय की शिक्षा

चाहे आत्मा कितने भी विविध रूपों से गुज़रे, उसका वास्तविक कल्याण केवल भगवद्-भक्ति में ही निहित है — यही इस सम्पूर्ण स्कन्ध का केंद्रीय संदेश है।